• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

लोकसभा चुनाव 2019: मोदी की जीत में उनकी योजनाओं का कितना हाथ – कितना साथ?

By सरोज सिंह

TWITTER

23 मई 2019... यह तारीख़ अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है.

ऐसा इसलिए क्योंकि लगातार दो बार, पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करने वाली नरेन्द्र मोदी सरकार, पहली ऐसी बीजेपी सरकार बनी गई है.

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद हर तरफ विश्लेषण का दौर जारी है.

कहीं राहुल गांधी की हार के कारण गिनाए जा रहे हैं, कहीं महागठबंधन के हारने की वजहें बताई जा रही हैं तो कहीं वंशवाद का गढ़ टूटने की बात चल रही है.

वहीं राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भी चर्चा जारी है पर इस जीत का अंदाज़ा बीजेपी को हमेशा से था.

17 मई को चुनाव प्रचार ख़त्म होने के बाद पार्टी दफ़्तर में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की प्रेस कांफ्रेंस की और कार्यकर्ताओं और संगठन को धन्यवाद दिया.

इसी प्रेस कांफ्रेंस में अमित शाह ने कहा, "संगठन ने, नरेन्द्र मोदी सरकार ने जो काम को किया उसको हम सब ने मिलकर नीचे तक पहुंचाने का काम किया. मोदी सरकार हर 15 दिन में एक नई योजना लेकर आई. ये योजनाएं हर वर्ग को छूने वाली योजनाएं है. हर वर्ग के जीवन स्तर को उठाने वाली योजनाएं हैं. हमने योजनाओं को नीचे तक पहुंचाने का प्रयास किया और प्रधानमंत्री ने स्वयं और उनके मंत्रालय इन योजनाओं के क्रियान्वयन को देखा है."

TWITTER

तब बहुत कम जगहों पर उनकी इन बातों ने सुर्खियां बटोरीं. न तो ये किसी चैनल की हेडलाइन थी और न ही यह ख़बर अख़बारों में छाई.

मोदी सरकार का दावा है कि उन्होंने पिछले पांच साल के कार्यकाल में समाज के हर वर्ग के लिए कुल 133 योजनाएं लॉन्च की हैं.

उनके मुताबिक़ इन योजनाओं से 50 करोड़ लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने का काम किया गया है.

अमित शाह ने अपनी इसी प्रेस कांफ्रेंस कहा, "घर, बिजली, गैस, शौचालय - इन योजनाओं को लोगों तक पहुंचाकर हमने लाभार्थियों को ये अहसास दिलाया है कि देश के विकास की योजना में उनकी भी हिस्सेदारी है."

तो क्या मोदी सरकार की ये योजनाएं उनके लिए गेम चेंजर साबित हुईं?

ग़रीब लोगों को घर दिलाने के लिए मोदी सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना लॉन्च किया, बिजली के लिए सौभाग्य योजना, गैस कनेक्शन के लिए उज्जवला योजना और शौचालय के लिए स्वच्छ भारत योजना लेकर आई.

सरकारी आंकड़ो के मुताबिक केवल उज्जवला योजना के तहत 7 लाख लोगों तक उन्होंने गैस कनेक्शन पहुंचाया है.

सौभाग्य योजना 2017 में लॉंच किया था. तब चार करोड़ घरों में बिजली नहीं थी. आज सरकार का दावा है कि उन्होंने हर घर में बिजली पहुंचा दिया है.

इसी तरह से स्वच्छ भारत अभियान के आंकड़े हैं. प्रधानमंत्री मोदी का दावा है कि अब भारत के 90 फ़ीसदी घरों में शौचालय है, जिनमें से तक़रीबन 40 फ़ीसदी 2014 में नई सरकार के आने के बाद बने हैं.

और इसका लाभ ग्रामीण इलाकों में 9 करोड़ परिवारों को मिला है.

आंकड़ों की बात करें तो इस बार के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 12 से अधिक राज्यों में 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट शेयर मिले हैं.

और ख़ुद अमित शाह के मुताबिक़ उनकी योजनाओं का 50 करोड़ लोगों को फायदा पहुंचा है.

राजनीतिक जानकारों ने इसके अलग-अलग विश्लेषण किए हैं.

मोदी शाह
Reuters
मोदी शाह

ज़्यादातर को लगता है कि राष्ट्रवाद ही इस बार का एकमात्र मुद्दा रहा. लेकिन इस बात को कोई सिरे से नहीं नकार रहा है कि मोदी सरकार की योजनाएं जिन जिन घरों में पहुंची वहां उनके पक्ष में माहौल जरूर बना होगा.

वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह के मुताबिक, "इतनी भारी जीत केवल राष्ट्रवाद के नाम पर नहीं मिल सकती और न ही कुछ महीनों में राष्ट्रवाद के नरेटीव को तैयार किया जा सकता है. इतनी भारी जीत के लिए एक संगठन की ज़रूरत होती है जो प्लान तरीक़े से लहर बनाने और लोगों को बूथ तक पहुंचाने में मदद करे. मोदी और शाह की जोड़ी ने केवल छह महीने और साल भर में ये काम नहीं किया."

अमित शाह ने 17 मई की प्रेस कांफ्रेंस में इसी बात पर ज़ोर दिया था. उन्होंने कहा, "पिछला चुनाव 2 करोड़ कार्यकर्ताओं के साथ लड़ा था, इस बार हमारे साथ 11 करोड़ कार्यकर्ता के साथ लड़ा. "

लेकिन इतने कार्यकर्ता आखिर पार्टी के पास जुड़े कैसे?

श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के अनिर्बान गांगुली के मुताबिक़, "2017 में अमित शाह ने अलग अलग राज्यों में अपना प्रवास कार्यक्रम शुरू किया था. जिसके तहत हर जगह विस्तारक चुने गए थे. ये विस्तारक 15 दिन, 6 साल और 1 साल के लिए पार्टी से जुड़े और पार्टी के लिए काम करते रहे. ऐसे लाखों विस्तारकों को पार्टी के साथ जोड़ने का काम तीन साल पहले शुरू किया था."

राहुल गांधी
Reuters
राहुल गांधी

विस्तारकों के काम को विस्तार से समझाते हुए अनिर्बान आगे कहते हैं, "इन विस्तारकों का काम लोगों तक पंहुचना, मोदी सरकार की योजनाओं का प्रचार प्रसार करना और फिर उन लाभार्थियों को तैयार करना ताकि वो आगे चल कर योजनाओं के खुद ब्रांड एम्बेस्डर बनें"

उन्होंने बीबीसी को बताया कि इस अभियान की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमें घाटी में भी 18 विस्तारक मिले, कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर शहर, हर गांव में लोगों को जोड़ने का भाजपा का प्रयास ही उन्हें यहां तक लेकर आया है.

लेकिन पंचयात और नगर निगमों के साथ देश भर में काम करने वाले चन्द्रशेखर प्राण कहते हैं, "ऐसा नहीं कि मोदी सरकार की सारी योजनाएं 100 फ़ीसदी सफल रहीं. कई में बुनियादी दिक्क़तें थीं, कई में व्यावहारिक दिक्क़तें थीं. लेकिन जिन लोगों तक वो पहुंचीं उन लोगों को लगा कि पहले मौके में थोड़ा मिला, एक और मौका इस सरकार को मिलेगा तो शायद ज्यादा बेहतर होगा."

अपनी बात को समझाने के लिए उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान की मिसाल दी.

"ऐसा नहीं है कि जहां कहीं शौचालय बना है वहां 100 फ़ीसदी लोग उसका इस्तेमाल कर ही रहे हैं, लेकिन स्टेशन और ट्रेनों में आपको सफ़ाई बेहतर जरूर दिखती है. इससे आप भी इंकार नहीं कर सकते"

बोलते हुए वो थोड़ा रुके और आगे एक और बता जोड़ दी, लेकिन यही एक मात्र वजह नहीं थी. चन्द्रशेखर प्राण तीसरी सरकार नाम का अभियान पूरे देश भर में चलाते हैं.

बीबीसी ने भी चुनाव से पहले 'पोस्टर वुमन' नाम से एक सिरीज़ की थी. ये सिरीज़ चार योजनाएं - घर, उज्जवला, सफाईकर्मियों और आयुष्मान भारत योजनाओं के पहले लाभार्थियों की कहानी थी.

हर कहानी में हमने पाया कि लाभार्थियों को मोदी सरकार की योजना से फ़ायदा तो पहुंचा लेकिन मोदी सरकार से उनकी अपेक्षाएं अभी और भी बढ़ गई हैं.

उज्जवला की पोस्टर वुमन ने माना था कि उनके पास पैसे नहीं कि हर महीने गैस भरवा सकें, लेकिन 11 सिलेंडर उन्होंने भी भरवाए थे.

प्रधानमंत्री आवास योजना की पोस्टर वुमन आगरा की मीना देवी ने कहा, मोदी सरकार की शुक्रगुज़ार है कि उन्हें घर मिला, लेकिन 35 हजार का बिजली बिल बिना मीटर के उनके घर आ गया, इससे वो दुखी थीं.

आयुष्मान भारत की पहली लाभार्थी, करनाल की रहने वाली करिश्मा के माता-पिता को करिश्मा के पैदा होने पर पैसा नहीं देना पड़ा इसकी खुशी थी, लेकिन बाद में करिश्मा का इलाज मुफ़्त में नहीं होने पर दुख था.

इंडियन एक्सप्रेस की ओपीनियन एडिटर वंदिता मिश्रा के मुताबिक़ मोदी की जीत में योजनाओं की भूमिका बहुत अधिक नहीं थी.

उनके मुताबिक, "उन्होंने पूरा प्लान और रोड मैप पेपर पर तैयार किया. ऐसा लग रहा था कि ज्यादातर लोगों को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर उन्होंने अपने साथ जोड़ा और जो वोटर राष्ट्रवाद के मुद्दे पर साथ नहीं था, उसको अपने लीडरशीप के मुद्दे पर साथ देने के लिए तैयार किया गया, जो उस पर भी साथ नहीं आए उनको खंडित विपक्ष के मुद्दे पर जोड़ा गया. इस कड़ी में योजनाओं का लाभ दिला कर लोगों को जोड़ना आख़िरी विकल्प था. ज़्यादातर लोग कह रहे थे हमें योजनाओं का लाभ नहीं मिला, शौचालय नहीं मिला, गैस कनेक्शन नहीं मिला लेकिन ये बातें तो तब ज़रूरी होंगी जब देश रहेगा.

तमाम वादों और दावों के बीच ये बात भी उतनी ही सच है कि मोदी की इस प्रचंड जीत में कौन-कौन से फै़क्टर काम आए, इसका केवल अनुमान ही लगा जा सकता है. इसका कोई विज्ञान नहीं पूरी तरह सब ठीक ठीक बता सके.

जानकारों के मुताबिक इतनी बड़ी जीत केवल ज़मीन पर काम करके ही नहीं हासिल की जा सकती इसमें प्रत्याशी के भावनात्मक जुड़ाव भी जरूरी है.

BBC Hindi
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Lok Sabha Election 2019: How much supportive Modi's plans are in his victory?
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X