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Lok sabha Chunav: चुनाव प्रक्रिया पर किसके इशारे पर खड़े किए जा रहे हैं प्रश्नचिन्ह? पैटर्न संदिग्ध है!

Lok sabha Election: हाल ही में अमेरिका के एक राजनीतिक वैज्ञानिक ने एक भारतीय टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में भारतीय चुनाव प्रक्रिया की जमकर तारीफ की है। उनके कहने का मतलब है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अब इस मामले में अपने आपको सुव्यवस्थित कर चुका है। लेकिन, हाल के वर्षों में देश के अंदर ही इसे 'संदिग्ध' साबित करने की कोशिशें देखने को मिली हैं।

यहां तक की देश की सर्वोच्च अदालत में भी लोकतंत्र के महापर्व के दौरान चुनाव प्रक्रिया को संदिग्ध बनाने वालों की मंशा पर सवाल उठ चुका है। लेकिन, कभी इस नाम पर तो कभी उस नाम देश के लोगों के मन में चुनाव प्रक्रिया को लेकर संदेह खड़े करने की कथित कोशिशें जारी ही रहीं।

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चुनावी डेटा के मसले पर चुनाव आयोग के साथ खड़ा हुआ सुप्रीम कोर्ट
ताजा मामला इस बार के लोकसभा चुनाव में हर चरण में पड़ने वाले कुल वोटों के डेटा को लेकर था। लेकिन, आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने अपने देश के चुनाव आयोग पर भरोसा किया और चुनावों के दौरान हर चरण के साथ चुनाव में डाले गए कुल वोटों का डेटा जारी करने के लिए आयोग को निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया।

चुनाव आयोग के खिलाफ किस तरह से एक के बाद एक संदेग पैदा किए गए?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टीओआई को दिए एक इंटरव्यू में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) राजीव कुमार ने कहा,'पहले देश की मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर प्रश्न खड़े किए गए, फिर ईवीएम को बदनाम करने की कोशिशें की गईं। अब चुनावों के दौरान टर्नआउट डेटा को लेकर संदेह पैदा किया जा रहा है।'

अगर देश की संवैधानिक संस्था को यह पीड़ा सार्वजनिक करनी पड़ रही है तो समझने वाली बात है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार संस्था को किस तरह की 'साजिशों' का सामना करते हुए अपनी जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं।

चुनाव आयोग के खिलाफ संदेह जताने का पैटर्न संदिग्ध है!
क्योंकि, सीईसी ने यहां तक कहा है कि 'सिर्फ तभी जब लोकसभा का आम चुनाव चल रहा हो, ठोस उदाहरणों के बगैर संदेह जताने के पैटर्न की स्टडी की जानी चाहिए।' मतलब, चुनाव आयोग पर उठाए जाने वाले सवाल ही संदेह के दायरे में हैं और सवाल उठता है कि अगर यह सब देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अव्यस्थित करने के लिए हो रहा है तो उसके पीछे कौन लोग हैं?

किसके इशारे पर चल रहा है चुनाव प्रक्रिया को बदनाम करने का खेल?
चुनाव आयोग बार-बार कह रहा है कि वह लगातार मतदान प्रतिशत के आंकड़े जारी कर रहा है। फिर जब कुल रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या पब्लिक डोमन में है तो उससे डाले गए कुल वोटों की संख्या का पता लगाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। फिर इस बात को इतना संदिग्ध बना देने के पीछे किसी की मंशा क्या हो सकती है!

राजीव कुमार का कहना है, 'यहां तक कि 6ठी क्लास का एक छात्र भी आयोग की ओर से जारी मतदान प्रतिशत और निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की कुल संख्या के साथ डाले गए वोटों की पूर्ण संख्या की गिनती कर सकता है।'

'हमारे कुछ संस्थानों पर विश्वास करें'
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि चुनाव आयोग का टर्नआउट ऐप्प अपनी ओर से उठाया गया कदम था, ताकि जनता को मतदान प्रतिशत का एक मोटा अनुमान मिल सके। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, 'चुनाव आयोग के लिए प्रारंभिक डेटा अपलोड करना वैधानिक रूप से आवश्यक नहीं है। कई बार एक अच्छी पहल 'आ बैल मुझे मार' की तरह हो जाती है।' सर्वोच्च अदालत ने कहा, 'हमारे कुछ संस्थानों पर विश्वास करें।'

इससे पहले चुनाव आयोग की ओर से पैरवी करने वाले वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि एडीआर का आवेदन 'संदेह, आशंकाओं और झूठ' पर आधारित है और 'कथित जनहित याचिका' को नहीं सुनने की गुजारिश करते हुए कहा कि इससे चुनावी प्रक्रिया को बहुत नुकसान हो रहा है।

संदेह की साजिश और गिर गया मतदान प्रतिशत?
आयोग के वकील ने तो अदालत में यह तक पक्ष रखा कि 'संभवतः कुछ तत्वों की ओर से चुनावी प्रक्रिया को लेकर संदेह का माहौल बनाने के निरंतर प्रयासों के कारण ही मतदान का प्रतिशत कम हो सकता है।'

तथ्यों के बिना ही चल रही है पीआईएल फैक्ट्री?
चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने 26 अप्रैल के ही अपने फैसले में एडीआर के सभी आरोपों की जांच करने के बाद इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए खारिज कर दिया था। 'लेकिन, पीआईएल फैक्ट्री ने फैसले की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर संदेह के आधार पर आशंकाओं का एक और सेट उठाकर यह आवेदन दायर किया। जबकि, आरोपों की पुष्टि के लिए कोई तथ्य प्रस्तुत नहीं किया गया है।'

हैरान करने वाली बात ये है कि कथित रूप से दावा यहां तक किया गया था कि टर्नआउट डेटा को लेकर चुनाव आयोग के शुरुआती आंकड़ों और फाइनल डेटा में 5-6% का अंतर है, जबकि आयोग के मुताबिक यह अंतर मात्र 1-2% का है।

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