Lok Sabha Chunav 2024: बिहार में क्या सोच रहे हैं मतदाता? इस बार कहीं झटका न खा जाएं पार्टियां!
Bihar Lok Sabha Chunav 2024: बिहार में पिछले साल जब जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी हुए तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पूरे देश में इसे मुद्दा बना दिया। लेकिन, बिहार में हो रहे लोकसभा चुनावों में अब इस मुद्दे की चर्चा नहीं हो रही। बल्कि, मतदाताओं के पास जो मुद्दे हैं, वह कई दलों के लिए बड़ा झटका साबित हो सकते हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार इस साल जबसे फिर पलटी मारकर एनडीए में आए हैं, वह भी जातिगत जनगणना पर अपनी पीठ थपथपाना बंद कर चुके हैं। एक समय लग रहा था कि राज्य में इस बार यही सबसे बड़ा मुद्दा होगा। वैसे बिहार में जाति की राजनीति हमेशा से हावी रही है और इस बार भी वह मौजूद है।

जातिगत सर्वे से ऊपर उठ चुके हैं बिहार के वोटर
बिहार में जातिगत सर्वे की जगह जिस बात की ज्यादा चर्चा हो रही है, उसमें कल्याणकारी योजनाएं,लाभार्थी, राज्य के इंफ्रास्ट्रक्चर में पिछले करीब दो दशकों में हुए बदलाव, कानून-व्यवस्था, देश का चुनाव, भारत की दुनिया में छवि, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों का अधिक प्रभाव दिख रहा है।
बदल रही है बिहार के लोगों की सोच?
मसलन, इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक भागलपुर जिले के सुल्तानगंज में ऑटोरिक्शा चलाने वाले अमरेंद्र मंडल का कहना है, 'मैं रोज ऑटो रिक्शा चलाकर 400 से 500 रुपए कमा लेता हूं तो सिर्फ सड़कों के चलते, यहां तक कि गांवों में भी अच्छी सड़के हैं। मैं स्वरोजगार कर रहा हूं, सिर्फ इस वजह से कि राज्य का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित हुआ है।'
हालांकि, कुछ लोग ऐसे हैं, जो अभी भी जातिगत सर्वे का जिक्र कर रहे हैं। मसलन, भागलपुर के ही मुकेश राम का कहना है, 'क्या गरीब परिवारों को सालाना 2 लाख रुपए मिलेंगे, जातिगत सर्वे जारी करते हुए जिसकी घोषणा नीतीश कुमार की ओर से की गई थी।'
'सिर्फ मोदी फैक्टर ही काम करता है'
लेकिन, मुजफ्फरपुर में 35 वर्षीय स्कूल टीचर राजेश सहनी का नजरिया अलग है। वे कहते हैं, 'नीतीश कुमार तब जातिगत जनगणना की बात करते थे, जब वह इंडिया में थे। लेकिन, अब वह एनडीए में आ चुके हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि सिर्फ मोदी फैक्टर ही काम करता है।'
बिहार में एक और दिलचस्प बात देखने को मिल रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पूरे देश में घूम-घूम कर जातियों का 'एक्स-रे' करवाने की बात कह रहे हैं। वहीं, कांग्रेस की सहयोगी राजद के नेता तेजस्वी यादव यह याद दिलाने में लगे हुए है कि जब वह नीतीश सरकार में थे तो कैसे नौकरियां दे रहे थे।
'जाति...जनगणना पर कुछ चर्चा नहीं है'
वैसे बिहार में कहीं भी बात कर लीजिए जाति, मतदाताओं की सोच का एक मुख्य आधार रहता है; और इस बार भी यह स्थिति अलग नहीं है। अलबत्ता, जाति जनगणना की कोई चर्चा नहीं कर रहा। जैसे आरा लोकसभा क्षेत्र में यादवों और पासवान जाति के कुछ लोगों से जब इसको लेकर सवाल किया गया तो उनमें से एक केशव यादव ने कहा, 'जाति एक सच है, पर अबतक जनगणना पर कुछ चर्चा नहीं है यहां...'
बिहार में 'लाभार्थी' भी बन चुके हैं बड़ा वोट बैंक
बिहार में अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) अब एक बहुत बड़ा वोट बैंक बनकर उभरा है। इनमें एक बहुत बड़ी तादाद केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की है। अति-पिछड़ों के बीच जेडीयू ने भी अपना एक जनाधार तैयार किया है और लगता है कि इस चुनाव में भी लाभार्थी चुनाव परिणाम पर असर डाल सकते हैं।
जैसे पटना के एक वोटर प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले 45 साल के अशोक बिंद कहते हैं, '2014 से ईबीसी ने एनडीए को बड़े पैमाने पर वोट दिया है। नीतीश कुमार का भी इस वर्ग पर अपना एक प्रभाव है, लेकिन मुकेश सहनी (विकासशील इंसान पार्टी) जैसे नेताओं को यह भ्रम में है कि अति-पिछड़े उनके साथ हैं। सच्चाई ये है कि ईबीसी में करीब 130 जातियां हैं और उनमें से अधिकतर एनडीए की लाभार्थी योजनाओं की ओर आकर्षित हैं।'
पटना से करीब 300 किलोमीटर दूर पूर्णिया में रोजाना कमाने-खाने वाले चुल्हाई पासवान का कहना है, 'मुफ्त राशन जिताउ योजना है। जो खाना दे रहा है, उसको तो समर्थन करना ही चाहिए।'












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