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Lockdown:बढ़ रही है बेसहारा बच्चों की मुसीबत, बचे हुए दिन काटना मुश्किल

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नई दिल्ली- युवाओं का एक ग्रुप यूट्यूब पर लॉकडाउन से पैदा हुए हालातों को लेकर रोजाना न्यूज वीडियो का एक सीरीज दिखा रहा है। करीब 10-10 मिनट के उस वीडियों में कई ऐसे बातें सामने आई हैं, जो हिला देने वाली हैं। ये सीरीज लॉकडाउन की वजह से पहले से ही मुसीबत झेलने वाले सड़कों पर घूमने और सड़कों पर ही कमाने-खाने वाले बेसहारा बच्चों पर बनाया जा रहा है। बाल अधिकार संगठनों से जुड़े लोगों का दावा है कि अकेले दिल्ली में ही ऐसे करीब दो लाख बच्चे हैं, जिनका लॉकडाउन के चलते निवाला छिन गया है। ऐसे संगठनों की मांग है कि सरकार ऐसे बच्चों तक मदद पहुंचाने के लिए उन्हें इजाजत दे नहीं तो उन बच्चों पर बहुत गहरा शारीरिक और मनोवैज्ञानिक असर पड़ेगा।

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'चारों तरफ अंधेरा है....'

'चारों तरफ अंधेरा है....'

न्यूज18 की एक खबर के मुताबिक 'सर्वाइविंग द स्ट्रीट' के अपने सबसे ताजा एपिसोड में उन युवा रिपोर्टरों ने देश के गरीब बच्चों पर ही पूरा फोकस किया है। मसलन, दिल्ली के सराय काले खां से शंभू बताते हैं कि बच्चों ने उनसे कहा है कि 'चारों तरफ अंधेरा है।' जबकि, उत्तर-पूर्वी दिल्ली की रिपोर्टर शन्नो से बच्चों ने कहा है कि 'उनकी इच्छाएं मर रही हैं।' उनका कहना है कि एक बच्चा तो उनसे बात करते हुए फोन पर ही फूट-फूट कर रोने लगा। उस बच्चे ने उनसे बताया कि जब सरकारी स्कूल चल रहे थे तो उन्हें मिडडे मील मिल जाता था। अब उसे दिन में एक बार रोटी का एक टुकड़ा मिलता है, जिसे वो अपने दो भाइयों के साथ बांटता है। कुछ तो पानी पर ही दिन काट रहे हैं। शंभू को एक बच्चे ने बताया, 'पानी पीके रहते हैं.....सोच रहे हैं पैदल निकल जाएं....अभी ना तो घर है ना पैसे हैं।'

शारीरिक और मनोवैज्ञानिक असर पड़ने का दावा

शारीरिक और मनोवैज्ञानिक असर पड़ने का दावा

इस सीरीज में उन बच्चों की दशा दिखाई जा रही है, जो बच्चे बस अड्डों और रेलवे प्लेटफॉर्म्स पर ही कमाते हैं और वहीं पर रहते हैं। लेकिन, अब देशव्यापी लॉकडाउन होने की वजह से ऐसे बच्चों की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति बिगड़ रही है। लॉकडाउन के दूसरे दिन पश्चिमी दिल्ली से विजय कुमार ने रिपोर्टिंग की थी, 'बच्चों ने हमसे कहा है कि वह बाहर नहीं निकल पा रहे और पार्कों में खेल नहीं पा रहे....अब ऐसा लगता है कि उन्हें 24 घंटे जेल में डाल दिया गया है। ' उसी दिन शन्नो ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था, 'बच्चे कह रहे हैं बस 6-7 दिन का राशन और बचा है। दूध की भी थोड़ी कमी है। इस सबके बीच वो चिड़िया उड़ खेल के समय व्यतीत कर रहे हैं।'

झुग्गियों में बंद रहना मुश्किल

झुग्गियों में बंद रहना मुश्किल

लॉकडाउन के तीसरे दिन आगरा से पूनम ने बताया था कि 'बच्चे कह रहे हैं कि वो काम के लिए बाहर नहीं निकल पा रहे। इससे वे बहुत ज्यादा परेशान हैं। उनकी झु्ग्गियों के पास बहुत ज्यादा गंदगी फैल रही है। लेकिन, वह बाहर निकल खुली हवा में सांस नहीं ले पा रहे हैं। बदबू बर्दाश्त नहीं हो रही है। उनके कपड़े और खाने के सामान गीले हो रहे हैं। बच्चों को चिंता है कि कुछ और दिन ऐसे रहे तो बीमार पड़ जाएंगे। ' सराय काले खां के शंभू ने बताया था कि जो बच्चे कचरा बीन कर कमाते थे, रोड पर घूमते रहते थे, अब उन्हें बंद रहना पड़ रहा है। कई बार उन्हें घरेलू हिंसा देखनी पड़ रही है। कुछ बच्चों ने दूसरे दिन की रिपोर्ट में ही कहा था कि, 'राशन खत्म हो रहे हैं। यहां तक कि रिश्तेदार भी मदद नहीं करते। किराने के दुकान पर सामान महंगे हो रहे हैं। लोगों में झगड़े हो रहे हैं......हमारे पास घर लौटने के पैसे नहीं हैं।'

अपराध की ओर बढ़ सकते हैं बच्चे- एक्सपर्ट

अपराध की ओर बढ़ सकते हैं बच्चे- एक्सपर्ट

बाल अधिकार संगठन 'चेतना' के अगुवा संजय गुप्ता का कहना है कि उन्हें चिंता है कि इस स्थिति में बच्चे मजबूरन अपराध की ओर न बढ़ जाएं। वे 'बालकनामा' और 'सर्वाइविंग दि स्ट्रीट' को भी सहयोग देते हैं। उनका कहना है कि कई बच्चे ऐसे हैं, जिनके परिवारों की स्थिति बहुत खराब है। अगर उन्हें खाना नहीं मिला या उन्हें संभाला नहीं गया तो उनमें से कई अपराधी बन सकते हैं। उनका कहना है कि ये बच्चे बहुत बुरे दौर से गुजर रहे हैं और उन्हें सरकारी राहत कैंपों से भी मदद नहीं मिल पा रही है। 25 साल से इस फिल्ड में काम कर रहे गुप्ता का दावा है कि अकेले दिल्ली में ही ऐसे करीब 2 लाख स्ट्रीट चाइल्ड हैं, जिनके जीने का सहारा रुक गया है और वे जीने के लिए पूरी तरह से सरकार पर निर्भर हो गए हैं। उनके पास न तो कोई पहचान पत्र है और न ही सरकार की नजर में ही हैं। उन्होंने इच्छा जताई है कि ऐसे बच्चों की मदद के लिए सरकार को बच्चों से जुड़े संगठनों की सहायता लेनी चाहिए, लेकिन अभी तो उन्हें बच्चों तक पहुंचने के लिए पास भी नहीं दिया जा रहा है। (सभी तस्वीरें प्रतीकात्मक)

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English summary
Lockdown: The problem of destitute child is increasing, difficult to cut the remaining days
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