लॉकडाउन में बच्चों से बातचीत कर लैंगिक संवेदनशीलता के प्रति ऐसे जागरूक करें

नई दिल्ली- आज पूरा विश्व मिल कर कोरोना से संघर्ष कर रहा है। ऐसे कठिन वक्त में घर की चाहरदीवारी ही इंसान की अपनी दुनिया बन गई है। लॉकडाउन मजबूरी और सुरक्षा की सीमा है। ऐसे में सुकून की एक किरण भी है कि लॉकडाउन में सारा परिवार स्वस्थ और एक साथ है। आज के समय में जब किसी के पास किसी के लिए वक्त नहीं, उस समय इतने बड़ी अवधि के लिए सभी का एक साथ होना कई तरह की पारिवारिक समस्याएं भी लेकर आया है। आंकड़े बता रहें है कि घरेलू हिंसा के मामले अचानक बढ़ गए हैं। महिलाओं पर काम का बोझ एकाएक बढ़ गया है। मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के कारण दवाब का स्तर बहुत बढ़ गया है। मनोवैज्ञानिक इसके पीछे लैंगिक संवेदनशीलता की कमी मानते हैं।

Lockdown: Interact with children and instill gender sensitivity in them

हिंसा की बढती शिकायत के बीच दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल कर दी गई है। याचिका में महिलाओं और बच्चों की भलाई के लिए हाई कोर्ट से मामले में दखल देने की मांग की गई। पीआईएल में कहा गया कि राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में काफी इजाफा हुआ है। इस याचिका में कोर्ट से हेल्पलाइन शुरू करने, नोडल अधिकारी को तैनात करने और महिलाओं और बच्चों की काउंसलिंग करने के लिए आदेश देने की भी मांग की गई है।

दरअसल, ऐसे मामलों के पीछे हमारा महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण छुपा होता है। पुरषवादी मानसिकता वाले समाज में कम या ज्यादा इस तरह की स्थितियां देखने को मिलती हैं। हम यदि बचपन से अपने बच्चों के मन में समानता के संस्कार डालेंगे तो इस तरह के मामले कम या खत्म किए जा सकते हैं। इसी समस्या को ध्यान में रख कर शिक्षाविद् डॉ राकेश सिंह ने "लॉकडाउन में बच्चों के साथ लैंगिक संवेदनशीलता पर बातचीत" शीर्षक पुस्तिका लिखी है। इस पुस्तिका को 15 दिन की बातचीत के रूप में रखा गया है। जिससे छोटी-छोटी गतिविधियों और बातचीत के जरिए घर में ही अपने परिवार और बच्चों के साथ बहुत सरलता से लैंगिक समानता की नींव रखी जा सकती है। 15 दिन की इस बातचीत से लॉकडाउन के समय को उपयोगी बनाया जा सकता है। इस पुस्तिका को ई-वर्जन के रूप में जारी किया गया है, ताकि अधिक से अधिक लोगों तक इसकी पहुंच हो सके।

डॉ राकेश सिंह दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में कार्यरत थे जहा से स्वैच्छिक सेवा निवृति लेने के बाद मंजरी फाउंडेशन के साथ शिक्षा,जेंडर और युवा मामलों के लिए कार्यरत हैं। आजकल लेखक चंबल के बीहड़ों में बच्चों के लिए लर्निंग लैब खोल कर शिक्षा की दूरदराज के क्षेत्रों में अलख जगाएं हैं। महिलाओं के लिए आदिवासी तथा पिछड़े क्षेत्रों में अधिक से अधिक वीमेन रिसोर्स सेंटर उनकी स्वप्निल परियोजना है।

पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं:- लॉकडाउन में बच्चों के साथ लैंगिक संवेदनशीलता की शिक्षा

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