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बिहार का कोसी रेल महासेतु कई वजहों से ऐतिहासिक क्यों है

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज बिहार में एक ऐतिहासिक रेल पुल का उद्घाटन किया है। ऐतिहासिक इसलिए कि इस पुल का अपना एक लंबा इतिहास भी रहा है और यह कई मायनों में बहुत ज्यादा अहमियत भी रखता है। इस पुल ने ना सिर्फ बिहार के एक इलाके के दो हिस्सों की दशकों की दूरियां मिटा दी हैं, बल्कि बंगाल समेत देश के सारे उत्तर-पूर्वी राज्यों को भी बिहार के बड़े हिस्से के नजदीक ला दिया है। इस पुल के राजनीतिक मायने भी इसलिए हैं कि यह सियासी तौर पर बहुत ही सक्रिय इलाके में बना है और इसका कनेक्शन पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी जुड़ा हुआ है और दोनों ही दौर में नीतीश कुमार के किरदार की भी अपनी खास अहमियत है।

    PM Modi का Bihar को एक और की सौगात, Kosi Mahasetu का उद्घाटन | Bihar Election 2020 | वनइंडिया हिंदी
    कोसी रेल महासेतु प्रोजेक्ट की शुरुआत

    कोसी रेल महासेतु प्रोजेक्ट की शुरुआत

    बिहार की कुख्यात कोसी नदी पर करीब 2 किलोमीटर लंबे पुल की आधारशिला 6 जून, 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रखी थी। उस समय बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रेलमंत्री थी और बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर राबड़ी देवी थीं। तब निर्मली (मधुबनी जिला) स्टेशन से सरायगढ़ (सुपौल जिला) को जोड़ने वाले इस पुल के निर्माण पर करीब 323 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान था। इस प्रोजेक्ट को अगले 6 वर्षों, यानी 2009-10 तक पूरा कर लिया जाना था। यह रेल पुल प्रोजेक्ट वाजपेयी सरकार की राष्ट्रीय रेल विकास योजना के तहत बनने वाले चार मेगा रेलवे ब्रिज में से एक था, जिसकी घोषणा उन्होंने 15 अगस्त, 2002 को लालकिले की प्राचीर से की थी। इस प्रोजेक्ट को अगले साल के बजट यानी 2003-2004 में भी शामिल किया गया।

    कोसी रेल पुल का इतिहास

    कोसी रेल पुल का इतिहास

    बिहार में कोसी नदी पर मीटर गेज लाइन के पहले पुल का निर्माण 1887 में निर्मली (मधुबनी जिला) और भपतियाही (सरायगढ़- सुपौल जिला) के बीच किया गया था। लेकिन, बाढ़ और 1934 में भारत और नेपाल में आए भयंकर भूकंप में यह पुल पूरी तरह खत्म हो गया। इसके बाद दशकों तक इस पुल के निर्माण के लिए कोई गंभीर पहल नहीं हो पाया। इसकी एक बड़ी वजह कोसी नदी की धारा बदलने वाली प्राकृतिक प्रवृत्ति मानी जा सकती है।

    एक पुल टूटने से मिथिलांचल के दो हिस्से रहे 86 साल तक दूर

    एक पुल टूटने से मिथिलांचल के दो हिस्से रहे 86 साल तक दूर

    बिहार की कोसी नदी बाढ़ और अपनी जलधारा बदलने के लिए कुख्यात रही है। इसके चलते इलाके ने हमेशा भारी तबाही झेली है। इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि एक आंकड़े के मुताबिक 1921 से लेकर 1954 तक कोसी नदी लगभग 50 किलोमीटर पश्चिम की ओर खिसकर गई। 1934 में भूकंप के बाद आई बाढ़ के चलते नदी की मुख्यधारा और शिफ्ट हो गई, जिससे ट्रेन सेवा पूरी तरह से ठप हो गई। इसके बाद ट्रेन सेवा निर्मली स्टेशन तक ही खत्म होती रही। कहा जाता है कि लगातार नदी की धारा बदलते रहने से पानी में बह गई रेलवे लाइन और पुल को फिर से शुरू करने की कोई योजना नहीं बनाई जा सकी। निर्मली (मधुबनी जिला) और भपतियाही (सरायगढ़- सुपौल जिला) स्टेशनों के बीच की दूरी महज 22 किलोमीटर थी। लेकिन, पुल टूट जाने के चलते 86 साल तक इलाके के लोग मजबूरन दरभंगा-समस्तीपुर-खगड़िया-मानसी-सहरसा होकर करीब 300 किलोमीटर की दूरी तय करते रहे।

    इसलिए ऐतिहासिक है कोसी रेल महासेतु

    इसलिए ऐतिहासिक है कोसी रेल महासेतु

    86 साल बाद कोसी रेल महासेतु बन जाने से मिथिलांचल के दोनों हिस्सों मधुबनी और कोसी क्षेत्र (सुपौल) के बीच रेल सेवा बहाल हो पा रही है। यही नहीं ये पुल भारत-नेपाल सीमा के नजदीक है और इसलिए सामरिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। करीब एक दशक तक इस मेगा रेलवे ब्रिज पर काम लगभग ठप रहने का नतीजा ये हुआ है कि 1.9 किलोमीटर लंबे जिस पुल को 6 साल में 323 करोड़ रुपये की लागत से बनना था, उसपर 516 करोड़ रुपये की लागत आई है। इसके उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "2003 में अटल जी द्वारा इस परियोजना का शिलान्यास किया गया था। लेकिन, अगले वर्ष अटल जी की सरकार चली गई और उसके बाद कोसी रेल लाइन परियोजना की रफ्तार भी उतनी ही धीमे हो गई।" उन्होंने ये भी कहा है कि "अब वो दिन ज्यादा दूर नहीं जब बिहार के लोगों को 300 किलोमीटर की ये यात्रा नहीं करनी पड़ेगी। 300 किलोमीटर की ये दूरी सिर्फ 22 किलोमीटर में सिमट जाएगी। 8 घंटे की रेल यात्रा सिर्फ आधे घंटे में ही पूरी हो जाया करेगी। यानी सफर भी कम, समय की भी बचत और बिहार के लोगों के धन की भी बचत होगी।"

    कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य

    कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य

    कोसी रेल महासेतु सिर्फ बिहार के मिथिलांचल के दो हिस्सों को ही नहीं जोड़ने जा रहा है, इसके तैयार होने से उत्तर बिहार के इस क्षेत्र से पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी भारत की दूरी भी उतनी ही घट गई है। सरकार की ओर से सामने आई जानकारी के मुताबिक यह पुल कोविड-19 के वक्त में तैयार हुआ है, इसलिए इसके निर्माण में देश के दूर-दराज से वापस लौटे प्रवासी मजदूरों ने भी अपना योगदान दिया है।

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    English summary
    Kosi Rail Mahasetu Project of Bihar is historical for several reasons
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