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जानिए भारत के किस प्रदेश में अब तक सबसे अधिक सुनाई गई फांसी की सजा

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बेंगलुरु। निर्भया कांड के दोषियों की फांसी की घड़ी नजदीक आ रही हैं। निर्भया कांड के 9 महीने के बाद ही फास्‍ट ट्रैक कोर्ट ने निर्भया के आरोपियों को फांसी की सजा सुना दी थी। लेकिन उसके बावजूद पिछले सात सालों में फांसी को उम्रकैद में बदलने की कवायदें चलती रही। हैदराबाद डाक्‍टर मर्डर केस के बाद निर्भया केस ने एक बार फिर तूल पकड़ा, जिसके बाद अब निर्भया के चार दोषियों को अब फांसी की सजा देने की तैयारी चल रही है। दुनिया के अन्‍य देशों में जहां दुष्‍कर्म जैसे जघन्‍य अपराध करने वाले को जल्‍द से जल्‍द दर्दनाक मौत दे दी जाती है, वहीं भारत में बलात्कार लड़की का जीवन तबाह करने वाले दंरिदों के लिए भारत में फांसी सुनाई तो सैकड़ों लोगों को जाती है लेकिन फंदे तक गिने-चुने लोग ही पहुंच पाते हैं।

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भारत में राज्यवार आंकड़ों को देखें तो सबसे ज्यादा फांसी की सजा उत्तर प्रदेश में सुनाई गईं। उत्तर प्रदेश में कुल 395 लोगों को फांसी की सजा हुई। ये अलग बात है कि अभी तक किसी भी अपराधी पर फांसी की सजा अमल में नहीं लाई गई। उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में 144, महाराष्ट्र में 129, तमिलनाडु में 106 और कर्नाटक में 103 लोगों को मौत की सजा दी जा चुकी हैं। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश में पॉक्सो के तहत 42379 मामले लंबित, देश में ये सबसे ज्यादा हैं। दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र है। यहां पॉक्सो के 19968 मामले लंबित हैं।

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बता दें अभी तक भारत में 426 कैदी ऐसे हैं, जो फांसी की सजा पा चुके हैं, लेकिन अभी तक उन्हें फंदे तक नहीं पहुंचाया जा सका है। इनमें बड़ी संख्या में दुष्कर्म-हत्या के दोषी भी हैं। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट य द डेथ पेनल्टी इन इंडिया, एनुअल स्टेटिक्स 2018 के आंकड़ो पर नजर डाले तो मध्य प्रदेश, उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र में 66-66 ऐसे कैदी हैं, जिन्हें फांसी दी जानी है। मामलों को तेजी से निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए थे, लेकिन यही कोर्ट भी धीमी र फ्तार से ही काम कर रहे हैं। बिहार, तेलंगाना, उत्तरप्रदेश और केरल में इनके न्याय की रफ्तार बहुत धीमी है।

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पिछले कई सालों में धनंजय चटर्जी(2004), अफजल गुरु(2013) और 26/11 मुंबई हमले के आरोपी पाकिस्तानी नागरिक आमिर अजमल कसाब(2012) को फांसी पर लटकाया गया। भारत में इस तरह से हर साल कई दोषियों को सजा तो सुनाई जाती है लेकिन अमल में नहीं लाई जाती। इसकी वजह भारत में सजा माफी की लंबी प्रक्रिया है। 2012 के निर्भया केस के बाद दुष्कर्म के 4 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए। वहीं 15 साल में एक भी बलात्कारी को फांसी पर नहीं लटकाया गया। देश में न सिर्फ न्याय की यह रफ्तार धीमी है, वहीं रिकॉर्ड संख्या में फांसी की सजा सुनाए जाने के बावजूद दोषी फांसी के फंदे तक पहुंच नहीं पा रहे हैं। बार-बार अपील और सुनवाई में लगने वाला समय इतना ज्यादा है कि पीड़ित पक्ष इंसाफ मिलने के बाद भी उसे महसूस नहीं कर पाता।

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फास्ट ट्रैक कोर्ट्स में 6 लाख से ज्यादा मामले लंबित पड़े हुए है। लोकसभा में एक प्रश्‍न के जवाब के मुताबिक, 31 मार्च, 2019 तक देशभर में 581 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स हैं। जिनमें 426 कैदी ऐसे, जिन्हें फांसी दी जानी है। 2018 में 162 दोषियों को ट्रायल कोर्ट ने फांसी सुनाई। 2000 के बाद से अब तक यह सबसे बड़ी संख्या है। 24 आरोपी 2016 में रेप-मर्डर के लिए फांसी सुनाई। 43 आरोपी ऐसे जिन्हें 2017 में रेप-मर्डर के लिए फांसी की सजा सुनाई गई। 2018 में जहां ट्रायल कोर्ट्स ने दोषियों पर सख्ती दिखाई। वहीं सुप्रीम कोर्ट में फांसी की सजा से जुड़े 12 मामलों में सुनवाई हुई। 11 में कोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।

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साल 2017 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में हर रोज औसतन 90 से अधिक रेप के मामले दर्ज किए जाते हैं। हालांकि इनमें से बहुत ही कम रेप पीड़िता अपने साथ दुष्कर्म करने वाले दोषियों को सजा पाते हुए देख पाती हैं। सरकारी आंकड़े ही बता रहे हैं की रेप के मामलों में न्यायिक रफ्तार काफी धीमी है।

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संविधान के अनुच्छेद 72 में राष्ट्रपति और अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को सजा कम करने या रद्द करने का अधिकार है। लेकिन मृत्युदंड के मामलों में सिर्फ राष्ट्रपति को ही विशेष अधिकार हासिल हैं। संवैधानिक व्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार राष्ट्रपति और राज्यपाल दया याचिका के मामलों में मंत्रिमंडल की अनुशंसा के आधार पर निर्णय लेते हैं। सीआरपीसी कानून से यह स्पष्ट है कि उम्र कैद के मामलों में क्षमा मिलने के बावजूद 14 साल की न्यूनतम सजा भुगतना होगा।

मृत्युदंड मामलों में भी दया याचिका के स्वीकार के बावजूद अपराधी को आजीवन कारावास की सजा भुगतनी होती है। नाबालिग के खिलाफ अपराध के पॉक्सो मामलों में दया याचिका की व्यवस्था खत्म करने के लिए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के दिए गए सुझावों पर अमल के लिए संविधान में संशोधन करना होगा। पॉक्सो मामलों में दया याचिका के तुरंत डिस्मिसल की व्यवस्था बन जाए तो संविधान संशोधन करने की जरूरत ही क्यों पड़े? मृत्युदंड के मामले सबसे गंभीर होते हैं, जिनमे सीआरपीसी की धरा 366 के अनुसार हाईकोर्ट का फैसला अंतिम हो जाता है।

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English summary
In India, there are 426 prisoners who have been sentenced to be hanged in the last several years but they have not been hanged till now.
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