हिजाब विवाद पर जानिए क्या कहते हैं कानून के जानकार, जिसपर कर्नाटक में मचा है घमासान
नई दिल्ली, फरवरी 09। कर्नाटक के हिजाब विवाद को लेकर हाईकोर्ट दोपहर ढाई बजे अहम सुनवाई करने वाली है। उडुपी में सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी महिला कॉलेज में पढ़ने वाली कुछ छात्राओं की ओर से ये याचिका दाखिल की गई है। अब हर किसी की नजर हाईकोर्ट के फैसले पर है कि कोर्ट इस विवाद को लेकर क्या फैसला सुनाती है। इस बीच हम इस पूरे विवाद पर कानून के जानकारों की राय बता रहे हैं। हिजाब विवाद को लेकर हर किसी के मन में ये सवाल है कि क्या शिक्षण संस्थान में धार्मिक वेशभूषा को पहनकर आने की आजादी है या नहीं? ऐसे ही सवालों को लेकर वन इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट की वकील और सोशल एक्टिविस्ट ज्योति शर्मा से बात की है।

क्या शैक्षणिक परिसर में धार्मिक वेशभूषा अनिवार्य है?
- इस सवाल का जवाब देते हुए ज्योति शर्मा का कहना है कि किसी भी शैक्षणिक परिसर में किसी व्यक्ति को उसकी अनिवार्य धार्मिक वेशभूषा के आधार पर नहीं रोका जा सकता। हालांकि उन्हें साबित करना होगा कि यह वेशभूषा धार्मिक रूप से अनिवार्य है।
- ज्योति शर्मा इसके पीछे संविधान के 2 आर्टिकल का हवाला देती हैं। उन्होंने बताया कि संविधान के आर्टिकल 25 के अनुसार, सभी को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। वहीं आर्टिकल 15 (1) के मुताबिक, राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान और वंश के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
- इसके अलावा अनुच्छेद 15 (2) के अनुसार, किसी भी भारतीय नागरिक को ऊपर वर्णित आधारों पर किसी भी सार्वजनिक स्थल यानी होटलों, भोजनालयों, सिनेमा हॉल, मनोरंजन स्थल, सड़कों, और पब्लिक रिजॉर्ट्स में जाने से नहीं रोका जा सकता। इसलिए इन दोनों आर्टिकल के आधार पर शैक्षणिक परिसर में किसी भी व्यक्ति को उसकी धार्मिक वेशभूषा के आधार पर रोका नहीं जा सकता। जैसे कोई हिन्दू महिला शादी के बाद बिंदी, सिंदूर आदि लगाना चाहती है या मंगल सूत्र पहनना चाहती है तो उसे नहीं रोका जा सकता। वैसे ही कोई सिख व्यक्ति पगड़ी, केश, कटार, कृपाण आदि रखना चाहे तो उस पर रोक नहीं लगाई जा सकती है।

हिजाब विवाद पर क्या फैसला सुना सकता है हाईकोर्ट?
- ज्योति शर्मा ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा है कि आर्टिकल 15 (3) के अनुसार, मुख्यधारा से कटे और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रावधान किया जा सकता है। ताकि वह सामाजिक रूप से अन्य लोगों की बराबरी पर आ सकें। इसी आधार पर दलितों और पिछड़े वर्ग को आरक्षण का प्रवधान दिया गया है। इस आर्टिकल के तहत अगर कोई मान्यता किसी की प्रगति में बाधक बन रही है तो उसे अपनी उस मान्यता के लिए इज़ाज़त दी जा सकती है। महिलाओं और बच्चों के लिए इसके तहत विशेष प्रावधान बनाया जा सकता है और उन्हें उससे छूट दी जा सकती है। बशर्ते वह यह बताने में कामयाब हों कि यह उनके समुदाय या विश्वास के लिए अनिवार्य है।
- इन सबके अलावा एक बात और, भारत में परिधान बहुत संवेदनशील मसला है, खासकर महिलाओं को लेकर। आपने इसकी कइयों मिसालें देखी होगी। अगर किसी लड़की के साथ कोई ऊंच-नीच हो जाए तो आम आदमी, राजनेता से लेकर धार्मिक गुरु तक यह बताने-समझाने में लगे रहते हैं कि उसके साथ जो हुआ, हो रहा है- उसमें खुद उसका दोष है। किसी व्यक्ति, समाज का नहीं, बल्कि उसने ऐसे आकर्षक, उत्तेजक कपड़े पहन रखे थे कि वह खुद अपने साथ बुरा होने के लिए आमंत्रित कर रही थी। कोर्ट अपने फैसले में इन सामाजिक तथ्यों का भी ध्यान रख सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में गया मामला तो क्या होगा?
इस सवाल का जवाब देते हुए ज्योति शर्मा ने कहा कि अगर बड़ी अदालत को ऐसा लगता है कि फैसले के किसी कानूनी आधार की विस्तृत व्याख्या करना उच्च न्यायालय भूल गया है तो वह ऐसा कर सकता है। इसके अलावा उसे किसी अन्य कानूनी पहलू पर बात करना है तो वह उस पर भी कर सकता है और उसी अनुरूप फैसले में बदलाव हो सकता है।












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