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अनुच्छेद 35 A: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले फारुख अब्दुल्ला को क्यों लगी मिर्ची?

By प्रेम कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
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अनुच्छेद 35ए पर 63 साल बाद ये हंगामा बरपा है। कारण ये है कि इस पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है और केन्द्र सरकार अपना नया रुख पेश कर रही है, जो केन्द्र में बदली हुई राजनीतिक नेतृत्व की सोच के मुताबिक है। फारुख अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 35ए को बचाने के नाम पर बगावत तक की चेतावनी दे डाली है। यानी स्थिति गम्भीर हो गयी है।

    Farooq Abdullah says article 35(A) can’t be abrogated | वनइंडिया हिंदी

    हिन्दू शरणार्थी कैसे हो सकते हैं जम्मू-कश्मीर के नागरिक?

    फारुख अब्दुल्ला अनुच्छेद 35ए में बदलाव इसलिए नहीं होने देना चाहते क्योंकि इससे जम्मू-कश्मीर की डेमोग्राफी बदल जाएगी। वाकई इस तर्क में दम है। पाकिस्तान से आए 20 लाख हिन्दू शरणार्थियों को अगर जम्मू-कश्मीर में एक नागरिक के तौर पर फारुख अब्दुल्ला जैसी हैसियत मिल गयी, तो राज्य में मुसलमानों का प्रतिशत कम हो जाएगा। इन हिन्दुओं को स्थानीय निकाय तक के लिए वोट देने का अधिकार मिल जाएगा। फिर वोट की राजनीति में इन्हें भी अहमियत देने की ज़रूरत पैदा हो जाएगी। इन 'काफिरों' को जम्मू-कश्मीर सरकार में नौकरियां मिलने लगेंगी। ये व्यावसायिक शिक्षा हासिल करने लग जाएंगे। ये लोग ज़मीन खरीदने लगेंगे। बाप रे बाप! ये तो उल्टी गंगा बहने लगेगी। जम्मू-कश्मीर के मुसलमान इस उल्टी गंगा में बहते हुए कहीं चेनाव-रावी की दिशा में न बह जाएं!

    शरणार्थी होना, हिन्दू होना है क्या उनका गुनाह?

    बिल्कुल फारुख अब्दुल्लाजी, इन 20 लाख हिन्दू शरणार्थियों को जीने का हक नहीं है। इनसे पूछा जाना चाहिए कि तुम शरणार्थी क्यों हो? पाकिस्तान छोड़ने के लिए तुम्हारे पूर्वजों को किसने कहा? तुम हिन्दू क्यों हो? तुम्हें जो कुछ मांगना है हिन्दुस्तान की सरकार से मांगो। जम्मू-कश्मीर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है।

    एक थे राजा हरि सिंह, एक हैं अब्दुल्ला फारुख

    ये है फारुख अब्दुल्ला की सोच, जिनकी तीन पीढ़ियां जम्मू-कश्मीर में शासन कर चुकी हैं। याद करना जरूरी है उस राजा हरि सिंह को भी, जिन्होंने अपनी प्रजा के लिए (जिसमें ज्यादातर मुसलमान थे) आखिरी दम तक चिंता की और जिनके साथ साइन हुए Instrument of Accession (IoA) की वजह से अनुच्छेद 370 अस्तित्व में आया। कितना फर्क है फारुख अब्दुल्ला और हरि सिंह की सोच में! अकारण हरि सिंह मुस्लिम बहुल राज्य के राजा नहीं थे। न वे मुसलमानों के लिए हिन्दू थे और न उनके लिए प्रजा मुसलमान। लेकिन, फारुख अब्दुल्ला को देखिए, जो खुद को मुसलमान से अलग कर कुछ सोचने तक को तैयार नहीं। कोई शरणार्थी हिन्दू है इसलिए उसे नागरिक का अधिकार देने तक को तैयार नहीं! डेमोग्राफी बदल जाएगी!

    कोई है जो भड़का रहा है हिन्दू शरणार्थियों को !

    बात सच है फारुख अब्दुल्ला साहब! 63 साल तक जो जम्मू-कश्मीर में बिना अधिकार के रह गये, तो अब उन्हें नागरिक अधिकार की जरूरत क्यों पड़ रही है? कोई है, जो इन्हें भड़का रहा है। संभवत: अंग्रेज भी ऐसा ही सोचा करते थे कि जो भारतीय दो सौ साल से उनकी गुलामी कर रहा था, अचानक 'करो या मरो' कैसे चीखने लगा? कोई है जिसने भारतीय जनता को भड़काया है।

    शरणार्थियों के पूर्वजों ने भी लड़ी थी आज़ादी की लड़ाई

    शरणार्थियों के पूर्वजों ने भी लड़ी थी आज़ादी की लड़ाई

    याद आता है लोकप्रिय साहित्यकार और क्रान्तिकारी मन्मथनाथ गुप्त की पंक्तियां- "आज़ादी किसे नहीं अच्छी लगती। चाहे पिंजड़े में बंद पक्षी हो या जंजीरों में बंधा हुआ पशु। सभी परतंत्रता के बंधनों को उखाड़ फेंकना चाहते हैं।" तब भारतीयों ने अंग्रेजी परतंत्रता के बंधनों को उखाड़ फेंका था। फारुख अब्दुल्ला साहब, आपके पूर्वज भी उस लड़ाई में शामिल थे और उन हिन्दुओं के भी, जिन्हें आप शरणार्थी मानते हैं, जो 63 साल से आपकी ओर उम्मीद भरी हसरत से देखते रहे हैं लेकिन जिनको एक नागरिक का अधिकार देने की ज़रूरत आप नहीं समझते। ज़रा सोचिए जो आज़ादी आपको हासिल है, इन लाखों हिन्दू शरणार्थियों को क्यों नहीं होना चाहिए? सिर्फ इसलिए कि आपके राज्य की डेमोग्रेफी बदल जाएगी? आप जैसी सोच ने ही हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर रखा है। क्या कभी हिन्दुस्तान की बदलती डेमोग्राफी पर फारुख अब्दुल्ला बोलेंगे? क्या वे कभी केरल, बंगाल, बिहार, यूपी, आंध्र में बदलती डेमोग्राफी पर बोलना चाहेंगे? अगर उनकी तरह की सोच हो, तो इन राज्यों में भी अनुच्छेद 35ए लगा दिया जाएगा।

    संविधान को ताक पर थोपा गया था अनुच्छेद 35ए

    संविधान को ताक पर थोपा गया था अनुच्छेद 35ए

    फारुख अब्दुल्ला साहब! जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35ए लगाने के लिए भारतीय संविधान तक को ताक पर रख दिया गया था! संसद की उपेक्षा कर दी गयी। राष्ट्रपति के अध्यादेश से इसे संविधान के एपेन्डिक्स के तौर पर जोड़ दिया गया। जम्मू-कश्मीर की विधानसभा की इस ‘अलोकतांत्रिक' इच्छा को सम्मान देने के लिए अलोकतांत्रिक तरीका अपनाने वाला भी कोई मुसलमान नहीं था। ऐसा करने वाला भी हिन्दू था। अगर आप ये मानते हैं कि केन्द्र में हिन्दूवादी सरकार है, तो आप ये भी मानते होंगे कि इन हिन्दूवादियों के हाथों में इन दिनों 18 राज्यों की सरकारें भी हैं। ये चाहें तो गुपचुप तरीके से या फिर खुलेआम भी, देश के बाकी राज्यों में भी अनुच्छेद 35ए की तर्ज पर एपेन्डिक्स भी जोड़ सकते हैं और संविधान की धारा भी बना सकते हैं। लेकिन अगर अब तक ऐसा नहीं हुआ है, तो इसकी वजह ये है कि केन्द्र में कोई फारुख अब्दुल्ला जैसा हिन्दू राजनीतिज्ञ नहीं बैठा है।

    महिलाओं पर सितम ढा रहा है धारा 35ए

    महिलाओं पर सितम ढा रहा है धारा 35ए

    धारा 35ए का सितम तो देखिए। जम्मू-कश्मीर की स्थायी नागरिक लड़की अगर किसी ऐसे शख्स से शादी कर ले, जो जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक नहीं है तो उसकी नागरिकता भी रद्दी की टोकरी में चली जाती है। या अल्लाह! ये नागरिकता है या महिलाओं के लिए दौलत में हिस्सेदारी की हिन्दू परंपरा! यह हिन्दू परंपरा भी कानून की नज़र में मान्य नहीं है। कोई बेटी चुनौती दे, तो उसे बाप के खेत में हिस्सा मिल जाता है।

    मोहब्बत का भी दुश्मन है अनुच्छेद 35ए

    मोहब्बत का भी दुश्मन है अनुच्छेद 35ए

    अनुच्छेद 35ए उस इंसान का भी दुश्मन है जिसे उस लड़की से मोहब्बत हो जाए और फिर उससे शादी कर ले, जो जम्मू-कश्मीर की नागरिक है। पति के गुनाह की सज़ा पत्नी को मिलेगी, उसकी भी नागरिकता खत्म हो जाएगी। या अल्लाह! ये तो पाकिस्तान में धर्मांतरण से भी ख़तरनाक कानून है। वहां शादी-विवाह के लिए धर्मांतरण का मतलब होता है मुसलमान बनना। चाहे लड़का हो या लड़की, अगर गैर मुस्लिम है तो उसे किसी मुस्लिम से शादी करने के लिए मुसलमान ही बनना पड़ेगा। जम्मू-कश्मीर में नागरिकता का सच ये है कि चाहे लड़का हो या लड़की अगर गैर नागरिक से विवाह किया, तो उनकी भी नागरिकता गई तेल लेने।

    फारुख साहब! अमरनाथ यात्रा का उदाहरण क्यों?

    फारुख साहब! अमरनाथ यात्रा का उदाहरण क्यों?

    फारुख अब्दुल्ला साहब चेतावनी देते हैं कि अगर अनुच्छेद 35ए को हटाने की कोशिश हुई तो अमरनाथ यात्रा के लिए जम़ीन दिए जाने का जितना विरोध हुआ था, उससे भी बड़ा विरोध होगा। इस उदाहरण की जरूरत क्यों पड़ गयी फारुख साहब? हिन्दुओं की भावना को ललकारते हुए आप मुसलमानों का समर्थन हासिल करने की राजनीति करना चाहते हैं? आप भूल गये कि यूपी में कब्रिस्तान के लिए मुसलमानों को ज़मीन देने पर राजनीति तब तक नहीं हुई, जब तक कि श्मशान के लिए भी ऐसी सुविधा देने का सवाल चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी ने नहीं उठाया? फिर भी, उस घोषणा पर अमल में लाने की बेचैनी टीम मोदी में आज तक नहीं दिखी है।

    डेमोग्राफी की चिन्ता हिन्दूवादियों और फारुख दोनों को क्यों?

    डेमोग्राफी की चिन्ता हिन्दूवादियों और फारुख दोनों को क्यों?

    डेमोग्राफी में बदलाव का खतरा फारुख अब्दुल्ला साहब आपको क्यों लग रहा है? डेमोग्राफी में बदलाव का बुरा अंजाम तो हिन्दुस्तान के हिन्दू भुगत रहे हैं। आपकी चिन्ता और हिन्दुओं के नाम पर राजनीति करने वाली बीजेपी की चिन्ता डेमोग्राफी ही क्यों है? सियासत की आग बिना सांप्रदायिक भावना के नहीं सुलगती, क्या इसलिए?

    क्या है अनुच्छेद 35ए

    क्या है अनुच्छेद 35ए

    राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने एक आदेश के जरिए इस अनुच्छेद को भारत के संविधान में जोड़ा, जो जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को ये अधिकार देता है कि वो स्थायी नागरिक की परिभाषा तय कर सके और उनकी पहचान पर विभिन्न विशेषाधिकार भी दे।

    • अनुच्छेद 35 A, धारा 370 का ही हिस्सा है। इसके मुताबिक जम्मू कश्मीर का नागरिक तभी राज्य का हिस्सा माना जाएगा, जब वो वहां पैदा हुआ हो।
    • कोई भी दूसरा नागरिक जम्मू कश्मीर में ना तो संपत्ति खरीद सकता है और ना ही वहां का स्थायी नागरिक बनकर रह सकता है।
    • 1956 में जम्मू कश्मीर का संविधान बना, जिसमें स्थायी नागरिकता की बनी परिभाषा के मुताबिक स्थायी नागरिक वो व्यक्ति है जो 14 मई, 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो, और उसने वहां संपत्ति हासिल की हो।
    अनुच्छेद 35ए हटा तो क्या होगा

    अनुच्छेद 35ए हटा तो क्या होगा

    • नागरिकता की परिभाषा बदल जाएगी।
    • हिन्दू शरणार्थियों को भी जम्मू-कश्मीर में वही अधिकार प्राप्त हो सकेंगे जो बाकी नागरिकों को है।
    • जम्मू-कश्मीर के गैर नागरिक से विवाह के बाद नागरिकता ख़त्म हो जाने की वर्तमान स्थिति ख़त्म हो जाएगी।
    • कोई भी व्यक्ति किसी को भी ज़मीन खरीद या बेच सकता है- ऐसा अधिकार मिल जाएगा।

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    English summary
    know in depth about article 35 a, why farooq abdullah oppose its abrogation
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