जानिए क्या है QUAD, आखिर क्यों भारत के लिए यह काफी अहम है, ड्रैगन को सता रहा ये डर
नई दिल्ली, 23 मई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्वाड की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जापान पहुंचे हैं। इस बैठक में भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका हिस्सा लेंगे। क्वाड की बात करें तो इसे क्वाडिलेट्रल सिक्योरिटी डायलॉग के नाम से जाना जाता है। यह एक एक अनौपचारिक रणनीतिक मंच है। इस फोरम के चार देश सदस्य हैं। इस फोरम का मुख्य लक्ष्य इस पूरे क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को रोकने के लिए किया गया था। इस फोरम के जरिए इसके सदस्य देश आपस में अनौपचारिक वार्ता करते हैं। इस वार्ता की शुरुआत जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने 2007 में शुरू की थी जिसे ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जॉन हॉवर्ड और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमेरिका के उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने अपना समर्थन दिया था।
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क्वाड की टाइमलाइन
क्वाड की टाइमलाइन की बात करें तो इसकी सबसे पहले शुरुआत 2004 में हुई थी जब अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया ने एक कोर ग्रुप का गठन किया था। यह कोर ग्रुप सूनामी के बाद बना था। 2006 में टोक्यो की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऐलान किया था कि जापान और भारत एक जैसी सोच रखने वालों के साथ एशिया-पैसिफिक रीजन में वार्ता की शुरुआत करना चाहते हैं। जिसके बाद 2007 में क्वाड देशों ने पहली बैठक मनीला में की। इस बैठक में जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत के प्रधानमंत्री और अमेरिका के उपराष्ट्रपति शामिल हुए।

भारत के लिए क्वाड की महत्ता
वर्ष 2013 से सभी क्वाड के देशों ने चीन की बढ़ती उकसावे की नीति पर चिंता जाहिर की। भारत ने उसके बाद से सीमा पर चीन के साथ चार तनाव देखे हैं, जिसमे 2013, 2014, 2017 और 2020 शामिल हैं। इसके बाद 2019 में क्वाड देशों के बीच पहली मंत्री स्तर वार्ता हुई थी। नवंबर 2020 में सभी क्वाड देशों ने एक साथ पहली बार साझा ऑपरेशन किया था। मार्च 2021 में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने वर्चुअल बैठक में हिस्सा लिया। बैठक में पीएम मोदी, ऑस्ट्रेलिया के पीएम स्कॉट मोरिसन भी शामिल हुए। साथ ही जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा ने हिस्सा लिया। इस दौरान इन नेताओं ने कोविड वैक्सीन, पर्यावरण, तकनीकी अनुसंधान और सप्लाई चेने को लेकर एक वर्किंग ग्रुप का गठन किया।

क्वाड का लक्ष्य
क्वाड के लक्ष्य की बात करें तो इसका मुख्य उद्देश्य इंडो पैसिफिक क्षेत्र में एक दूसरे के हितों की रक्षा करना है। इंडो पैसिफिक क्षेत्र में जिस तरह से चीन लगातार अपनी ताकत बढ़ा रहा है उसे देखते हुए ही इस फोरम का गठन किया गया है। दक्षिण चीन सागर पर जिस तरह से चीन दावा करता है और इसे अपना क्षेत्र बताता है उसको लेकर काफी लंबे समय से विवाद चल रहा है। लेकिन इस क्षेत्र में दूसरे देश फिलिपींस, मलेशिया जैसे देशों का कहना है कि हमारी भी सीमा साउथ चायना सी से मिलती है, लिहाजा हमारा भी इसपर अधिकार है। इसी को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक ताकत का सामना करना भी इस फोरम के अहम लक्ष्यों में से एक है। चीन इस बात को लेकर भी चिंतित है कि भारत इस फोरम में अन्य देशों को शामिल करके इसकी ताकत बढ़ा सकता है और यह चीन के लिए चुनौती साबित हो सकता है।

चीन के खिलाफ भारत के लिए अहम फोरम
यूं तो इस फोरम का मुख्य उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सभी सदस्य देशों के हितों की रक्षा करना है। लेकिन भारत के लिहाज से यह फोरम काफी अहम है। यह फोरम मुख्य रूप से चीन की बढ़ती आर्थिक और सैन्य ताकत का सामना करने के लिए ही बनाया गया है। भारत क्वाड देशों की मदद से चीन की बढ़ती चुनौती का जवाब दे सकता है। इसके साथ ही भारत इन देशों की नौसेना की मदद के जरिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक रणनीतिक बढ़त हासिल कर सकता है।

24 जून की बैठक काफी अहम
24 मई को होने वाली बैठक की बात करें तो इसमे सभी सदस्य देश भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका हिस्सा लेंगे। पीएम मोदी, अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन, जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज शामिल होंगे। इस दौरान पीएम मोदी जो बाइडेन के साथ द्वीपक्षीय बैठक भी करेंगे। बता दें कि इससे पहले सितंबर 2021 में क्वाड की वर्चुअल बैठक हु थी। बैठक में भारत ने अमेरिका और अन्य देशों की तरह रूस-यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध की आलोचना नहीं की थी और ना ही रूस को लेकर खुलकर कोई बयान दिया था।

चीन का विरोध
चीन हमेशा से ही क्वाड का विरोध करता आया है और वह इसे अपने खिलाफ अमेरिका की एक चाल बताता है। चीन कहता है कि जिस तरह से यूरोप में नाटो है वैसे ही यहां पर क्वाड का गठन किया गया है। कई बार चीन ने क्वाड की तुलना नाटो से की है। हाल ही में चीन के विदेश मंत्री ने कहा क्वाड को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि यह शीत युद्ध और सैन्य टकराव की आशंका में डूबा है, लेकिन अब यह पुराने समय की बात है। चीन को इस बात की भी आशंका है कि इस फोरम में दक्षिण कोरिया भी शामिल हो सकता है। चीन कतई यह नहीं चाहता है कि भारत समेत उसके पड़ोसी देश उसके खिलाफ किसी भी तरह का गुट बनाएं।
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