Kerala: 2024 के लोकसभा चुनाव में I.N.D.I.A.के लिए दुखती रग क्यों साबित हो सकता है केरल?
बीजेपी के खिलाफ बने विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक के लिए आने वाला लोकसभा चुनाव केरल में दुखती रग साबित हो सकता है। क्योंकि, यहां उसकी राजनीति दो धाराओं में बंटी हुई है। हालांकि, बीजेपी ने अपने लिए यहां जमीनी आधार तो तैयार किया है, लेकिन सीटों के मामले में अभी तक दिल्ली दूर है।
अगर 2019 के लोकसभा चुनावों को देखेंगे तो केरल के वोटरों ने कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट (यूडीएफ) के पक्ष में एकतरफा वोटिंग की थी। उसे 20 में से 19 सीटें मिली थी। जबकि, राज्य में सत्ताधारी सीपीएम की अगुवाई वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) सिर्फ 1 सीट ही जीत सका था।

2019 में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ ने जीती थी बाजी
यूडीएफ में शामिल मुख्य दलों को 46% से भी ज्यादा वोट मिले थे। 2014 के मुकाबले कांग्रेस ने देश में अपनी कुल सीटें बढ़ाई थीं, तो उसमें केरल की 15 सीटों का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण रहा था। जबकि, एलडीएफ में शामिल प्रमुख पार्टियां 33% से थोड़े ज्यादा वोट जुटा पाई थीं। जहां तक बीजेपी की बात है तो वह एक भी सीट जीती तो नहीं लेकिन उसे करीब 26.5 लाख वोट मिले जो कि 13% के बराबर है। पिछले लोकसभा चुनाव के परिणाम को एलडीएफ के लिए 3 दशकों में सबसे बुरा माना गया था।
2021 में निकल गई यूडीएफ की हवा
2021 में जब केरल विधानसभा के चुनाव हो रहे थे तो लग रहा था कि यूडीएफ की सत्ता में वापसी तय ही है। वहां सत्ता बदलने का ट्रेंड भी था। लेकिन, जब चुनाव परिणाम आए तो 140 विधानसभा सीटों में से सीपीएम की अगुवाई वाला एलडीएफ 99 सीटें जीत गया और कांग्रेस की अगुवाई वाले एलडीएफ को सिर्फ 41 सीटें ही मिल पाईं। बीजेपी को भी इस मायने में मायूसी हाथ लगी कि लोकसभा की तुलना में उसके वोट कम हो गए और वह सिर्फ 23.5 लाख के करीब ही वोट जुटा सकी।
केरल में सीटों के बंटवारे का आधार क्या होगा?
इंडिया ब्लॉक में शामिल पार्टियों की अबतक देश में तीन बड़ी और एक समन्वय समिति की बैठक हो चुकी है। सीटों के बंटवारे का मामला अभी तक टलता ही रहा है। ऐसे में केरल में जब उस गठबंधन में शामिल दल ही आमने-सामने हैं, तो सीटों के बंटवारे का आधार क्या होगा?
क्या कांग्रेस की अगुवाई वाला यूडीएफ, एलडीएफ के लिए आधी सीटें छोड़ने के लिए तैयार होगा? या क्या एलडीएफ 50-50 की डील के लिए राजी होगा? जबकि, यह लगभग तय है कि इस तरह के तालमेल के बाद लोकसभा की सभी 20 सीटें इंडिया ब्लॉक के खाते में जाने की संभावना करीब-करीब तय हो सकती है।
जमीनी स्तर पर आमने-सामने हैं यूडीएफ-एलडीएफ
लेकिन, केरल में इंडिया ब्लॉक के दलों में इस तरह सीटों का तालमेल हो पाएगा, यह जमीनी हालातों से तो मुमकिन नहीं लग रहा है। राज्य में विपक्षी यूडीएफ ने सरकारी गठबंधन पर भ्रष्टाचार को लेकर मोर्चा खोल रखा है तो एलडीएफ कांग्रेस और मुस्लिम लीग पर उसे हराने के लिए बीजेपी से हाथ मिलाने तक का आरोप लगा रहा है।
एलडीएफ, यूडीएफ पर लगा चुका है बीजेपी से तालमेल का आरोप
कुछ समय पहले केरल के वित्त मंत्री केएल बालागोपाल यह दावा कर चुके हैं कि आने वाले लोकसभा चुनावों में सीपीएम को हराने के लिए ऐसा गठबंधन हो सकता है। इसके लिए उन्होंने 1991 के आम चुनाव के दौरान कोझिकोड के वाडाकारा लोकसभा सीट के चुनाव का उदाहरण दिया था। उन्होंने कांग्रेस पर बीजेपी के सहयोग से ग्राम पंचायत का चुनाव जीतने का भी आरोप लगाया था।
I.N.D.I.A.के लिए दुखती रग क्यों साबित हो सकता है केरल?
उन्होंने कहा था, 'अब जब लोकसभा का चुनाव करीब आ रहा है, कांग्रेस और बीजेपी 'Co-Le-B एलायंस (कांग्रेस-लीग-बीजेपी)' की तैयारी कर रही है।' राज्य में कोई भी ऐसा राजनीतिक मसला नहीं है, जब दोनों ही गठबंधनों के कार्यकर्ता आपस में किसी भी स्तर पर लड़ने के लिए तैयार नहीं रहते हैं। यही वजह है कि बीजेपी के खिलाफ आए इंडिया ब्लॉक में शामिल दलों के लिए केरल में सीटों का मामला सुलझाना दुखती रग से कम नहीं है।
वहीं बीजेपी के भी कुछ समय पहले तक चर्च से मिले आश्वसानों के बाद लोकसभा चुनावों को लेकर हौसले बुलंद लग रहे थे और वह इस बार केरल में सीटें जीतने तक के दावे कर रही थी। लेकिन, मणिपुर की घटना के बाद समीकरण में बदलाव की आशंका पैदा हुई है, जिससे भाजपा के मंसूबे पर पानी भी फिर सकता है।












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