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कश्मीरः हिंसा, हत्या, रेप, राजनीति- कैसे बीता 2018?

By Bbc Hindi

कश्मीर के लिए कैसा कहा साल 2018
EPA
कश्मीर के लिए कैसा कहा साल 2018

चरमपंथ से जुड़ी 587 घटनाएं, सुरक्षाबलों से मुठभेड़ में 250 चरमपंथियों की मौत. इनके अलावा मरने वालों में 52 आम नागरिक और 86 सुरक्षाबल.

गृह मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़ साल 2018 कुछ ऐसा रहा जम्मू और कश्मीर के लिए. ये आंकड़े दो दिसंबर, साल 2018 तक के हैं.

हालांकि स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस साल जम्मू कश्मीर में इससे कहीं ज़्यादा लोग हताहत हुए हैं.

चरमपंथी हिंसा के लिहाज़ से 2018 जम्मू और कश्मीर के लिए न सिर्फ़ उथल-पुथल भरा रहा बल्कि सियासी मोर्चे पर भी ये सूबा राजनीतिक स्थिरता की तलाश करता रहा.

कश्मीर की हलचल पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों की राय में बीते एक दशक में इस साल घाटी ने सबसे ज़्यादा हिंसक घटनाएं देखीं.

राजनीतिक उथलपुथल, चरमपंथ से जुड़ी परिस्थितियों में भड़की हिंसा के अलावा कठुआ रेप, वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुख़ारी की हत्या जैसी घटनाओं ने भी जम्मू और कश्मीर में माहौल को अशांत किया.

बकरवाल समुदाय
Majid Jahangir/BBC
बकरवाल समुदाय

कठुआ रेप केस

साल 2018 की शुरुआत में ही जनवरी में जम्मू के कुठआ में बकरवाल समुदाय की एक आठ साल की बच्ची को अगवा कर गैंग रेप के बाद उसकी हत्या कर दी गई. इस घटना को लेकर जम्मू और कश्मीर में हालात कई दिनों तक तनावपूर्ण रहे.

राज्य विधानसभा से लेकर नेशनल और इंटरनेशनल मीडिया तक इस मामले की गूंज सुनी गई. इस घटना ने सांप्रदायिक रंग ले लिया. कई दिनों तक कश्मीर में बच्ची को इंसाफ़ दिलाने के लिए प्रदर्शन होते रहे.

जबकि जम्मू में अभियुक्तों के समर्थन में हिंदू एकता मंच के साथ मिलकर बीजेपी के नेताओं ने रैली निकाली थी.

बकरवाल समुदाय
Majid Jahangir/BBC
बकरवाल समुदाय

अभियुक्तों के समर्थन में रैली निकालने के बाद और रैली में बीजेपी के नेताओं के शामिल होने पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के दबाव की वजह से दो मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा.

हिंदू एकता मंच और बीजेपी के नेता घटना की सीबीआई जाँच की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए.

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जाँच की मांग ख़ारिज करते हुए केस की सुनवाई राज्य से बाहर पंजाब शिफ्ट कर दी , जहां 31 मई 2018 से केस का ट्रायल चल रहा है.



पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या

इस साल जून में वरिष्ठ पत्रकार और राइज़िंग कश्मीर नाम के अख़बार के संपादक शुजात बुखारी की श्रीनगर में अनजान बंदूक धारियों ने गोली मार कर हत्या कर दी.

पुलिस ने इस हत्या लिए चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा को ज़िम्मेदार ठहराया.

बाद में पुलिस ने दावा किया कि शुजात की हत्या के दो अभियुक्तों को मुठभेड़ में मार दिया गया है.

शुजात बुखारी
FACEBOOK/SHUJAAT.BUKHARI
शुजात बुखारी

महबूबा सरकार का गिरना

राज्य में जारी हिंसा के बीच 19 जून को अचानक बीजेपी ने अपनी सहयोगी पीडीपी से समर्थन वापस ले लिया.

समर्थन वापस लेने के बाद राज्य में महबूबा मुफ़्ती के नेतृत्व वाली बीजेपी-पीडीपी की गठबंधन सरकार गिर गई.

सरकार गिरने के बाद राज्य में राज्यपाल शासन लगा दिया गया. राज्य में आए नए राज्यपाल सत्यपाल मालिक को एनएन वोहरा की जगह राज्यपाल बनाया गया. जून में एनएन वोहरा के दस साल पूरे चुके थे.

राज्य में छह महीने तक चलने वाला राज्यपाल शासन 20 दिसंबर को समाप्त हो गया. 20 दिसंबर को राज्य में क़रीब 21 साल के बाद एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया है.

महबूबा मुफ्ती, राजनाथ सिंह
JK Information
महबूबा मुफ्ती, राजनाथ सिंह

21 नवंबर को दोबारा राज्य में पीडीपी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश की थी, जो नाकाम रही. पीडीपी के सरकार बनाने के दावे के साथ ही पीपल्स कॉन्फ्रेंस के मुखिया सज्जाद ग़नी लोन ने भी बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश किया था. दोनों के सरकार बनाने के दावे के चंद मिनटों बाद ही राज्यपाल ने राज्य की विधानसभा को भंग कर दिया.

विधानसभा भंग किए जाने के कई दिनों बाद तक राज्य में राजनीतिक बयानबाज़ियों का बाज़ार गर्म रहा.

महबूबा मुफ्ती, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
JK Information
महबूबा मुफ्ती, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

वरिष्ठ पत्रकार बशीर मंज़र कहते हैं, "जहां तक जम्मू- कश्मीर में 2018 की राजनीतिक गतिविधियों की बात है तो इस साल राज्य में राजनीतिक माहौल हंगामे भरा रहा. बीजेपी और पीडीपी ने बहुत तैयारियों के साथ सरकार बनाई थी और एक सन्देश दिया गया था कि जम्मू और कश्मीर को मिलाने के लिए बीजेपी-पीडीपी के गठबंधन को वजूद में लाया गया है."

"लेकिन 2018 में हमने ये गठबंधन पूरी तरह टूटते हुए देखा. सरकार टूटने के बाद कई महीनों तक ये क़यास लगाए जाते रहे कि पीडीपी टूट रही है और कोई और सरकार बना रहा है. लेकिन आखिरकार राज्यपाल ने विधानसभा को भंग कर दिया. ये कहा जा सकता है कि अपने आप में ये एक बहुत बड़ा राजनीतिक बदलाव था."


बकरवाल समुदाय
Majid Jahangir/BBC
बकरवाल समुदाय

दर्जनों जवानों ने दिए इस्तीफे

जुलाई 2018 में कश्मीर में देखा गया कि चरमपंथियों की धमकियों के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस में काम करने वाले स्पेशल पुलिस ऑफिसर्स या एसपीओज़ के दर्जनों जवानों ने अपनी नौकरियों से इस्तीफे दे दिए.

क़रीब तीस हज़ार एसपीओज़ जम्मू-कश्मीर पुलिस में महज़ महीने की छह हज़ार की पगार पर काम करते थे. लेकिन अब पगार का ये पैमाना बारह और पंद्रह हज़ार कर दिया गया है.

चरमपंथियों ने पुलिस के जवानों से भी अपील की कि वो चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियानों में हिंसा न लें.

कश्मीर में चुनाव
Bilal Bahadur/BBC
कश्मीर में चुनाव

निकाय चुनाव

जम्मू -कश्मीर के लिए ये साल इस लिहाज़ से भी अहम रहा कि इस साल सितंबर-अक्तूबर में यहां भारत सरकार ने निकाय चुनाव और पंचायती चुनाव करवाए. राज्य में निकाय चुनाव क़रीब तेरह साल के बाद कराए गए हैं, जबकि पंचायती चुनाव सात साल में करवाए गए हैं.

हालाँकि, दोनों ही चुनावों में ये देखा गया कि कश्मीर के आम लोग चुनाव में उम्मीदवार के तौर पर खड़े हुए लोगों के नाम तक नहीं जानते थे. निकाय चुनाव में भाग लेने वाली एक महिला उम्मीदवार ने मुझे बताया था कि उन्होंने अपना चुनाव प्रचार रात के अंधेरे में किया था.

डर, ख़ौफ और बिगड़ते हालात में इन चुनावों में कश्मीर के आम इंसान की दिलचस्पी बिलकुल भी दिखाई नहीं दे रही थी. इस चुनावों को संपन्न कराने के लिए चार सौ सुरक्षाबलों को काम में लाया गया.

राजनीतिक उथलपुथल के अलावा साल 2018 के कश्मीर में ये भी देखा गया कि बंदूक उठाने की तरफ़ यहां के नौजवानों का रूझान बढ़ा है.



पुलिस के जवानों के रिश्तेदारों का अपहरण

दक्षिणी कश्मीर में ही एक दूसरी तस्वीर सितंबर, 2018 को सामने आई, जब चरमपंथियों ने पुलिस के जवानों के क़रीब 12 रिश्तेदारों का अपहरण कर लिया.

पुलिस के ख़िलाफ़ चरमपंथियों ने ये कदम तब उठाया जब पुलिस ने चरमपंथियों के कुछ रिश्तेदारों को हिरासत में लिया था.

विश्लेषक कहते हैं कि कश्मीर में चरमपंथ की तहरीक में ये एक नई बात थी.

कश्मीर में सेना के एक जवान
Getty Images
कश्मीर में सेना के एक जवान

पत्रकार गौहर गिलानी की राय में, "बीते तीन दशकों में हमने कश्मीर में ये भी देखा कि जिस किसी के पास हथियार नहीं हैं, उनको कोई हाथ नहीं लगा सकता है."

"एक अलिखित क़ानून था कि जिसके पास हथियार नहीं है या पुलिस वाले के किसी रिश्तेदार को चरमपंथी कभी निशाना नहीं बनाते थे."

"लेकिन जब क़ानून व्यवस्था बिगड़ी तो उस समय के डीजीपी एसपी वैद ने पुलिस के लिए एक एडवाइजरी भी जारी की थी कि घर जाते समय खास ख्याल रखा जाए."

"ये सब दक्षिणी कश्मीर के चार ज़िलों में हुआ. बीते तीस सालों में इस तरह की ये एक बहुत बड़ी घटना थी."

पुलिस जवानों के रिश्तेदारों के अपहरण के बाद जम्मू और कश्मीर पुलिस के डीजीपी एसपी वैद को पद से हटा दिया गया था.

पूर्व डीजीपी एसपी वैद और नए डीजीपी दिलबाग सिंह
Majid Jahangir/BBC
पूर्व डीजीपी एसपी वैद और नए डीजीपी दिलबाग सिंह

वायरल वीडियो

इसी साल नवंबर में एक विचलित कर देने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया.

इस वीडियो में किसी चरमपंथी को एक व्यक्ति का गला रेत कर हत्या करते हुए दिखाया गया था. वीडियो दक्षिणी कश्मीर के शोपियां का बताया गया.

वीडियो में जिस व्यक्ति की हत्या की गई थी उस पर चरमपंथियों ने पुलिस और सेना के लिए मुखबीरी करने का इलज़ाम लगाया था.

विश्लेषक और पत्रकार बशीर मंज़र कहते हैं, "कश्मीर में आज जो चरमपंथ दिख रहा है, वो पहले जैसा नहीं है. अब चरमपंथी ट्रेनिंग लेने पाकिस्तान नहीं जाते हैं."

"मैं ये नहीं कहूंगा कि ये पहली बार कश्मीर में हुआ है. इससे पहले भी कश्मीर में ऐसा हो चुका है, लेकिन अब सोशल मीडिया का ज़माना है. आज़ादी की तहरीक के लिए चरमपंथियों के पास अपनी दलीलें हैं लेकिन जो वीडियो सामने आया, वो कश्मीरी मिजाज़ के ख़िलाफ़ था."



कश्मीर में सरकार विरोधी प्रदर्शन
Bilal Bahadur
कश्मीर में सरकार विरोधी प्रदर्शन

चौदह साल का 'चरमपंथी'

एक दूसरी तस्वीर इसी महीने यानी दिसंबर 2018 में सामने आई. ये तस्वीर थी, चौदह साल के एक 'चरमपंथी' की सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मौत की.

चौदह साल के इस बच्चे की मौत को लेकर कश्मीर में काफी उथल-पुथल रही. जहां एक तरफ इसके लिए सुरक्षाबलों की आलोचना हुई, तो दूसरी तरफ़ ये सवाल भी उठने लगे कि चरमपंथियों ने उसे अपने साथ क्यों शामिल किया था?

ऐक्टिविस्ट और विश्लेषक गौहर गिलानी कहते हैं, "जिस तरह एक कम उम्र के लड़के को पुलिस या सेना मुखबीरी के लिए इस्तेमाल करती है, उस पर भी सवाल उठते हैं. दूसरा सवाल उन चरमपंथियों के लिए है जो चौदह साल के एक बच्चे को चरमपंथी बना रहे हैं.

"दोनों पर ही सवाल उठना लाज़िमी है. ये दोनों के लिए ही चुनौती है. एक और घटना में 17 साल के बच्चे का सुरक्षाबल या पुलिस ने मुखबीरी के लिए इस्तेमाल किया और दूसरे मामले में चौदह साल का बच्चा था जिसे चरमपंथी संगठनों ने शामिल किया. ऐसे मामलों में 14 साल के बच्चे के लिए सरेंडर करने की सरकारी पॉलिसी कहां गई?"

ऑपरेशन ऑल आउट

कश्मीर में चरमपंथ के ख़िलाफ़ सुरक्षाबलों ने साल 2017 में 'ऑपरेशन ऑल आउट' शुरू किया था जो अभी तक जारी है.

सुरक्षा एजेंसियों की तरफ़ से ये दावा किया गया कि चरमपंथ के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में बड़ी कामयाबी मिली है.

हालांकि पुलिस और सुरक्षा बलों को चरमपंथी हमलों और मुठभेड़ों में काफी नुक़सान भी उठाना पड़ा है.

जानकारों का कहना है कि कश्मीर में बीते दो सालों की तुलना में वर्ष 2018 चरमपंथी हिंसा के लिहाज से ज़्यादा अशांत रहा.

कश्मीर में सरकार विरोधी प्रदर्शन
Majid Jahangir/BBC
कश्मीर में सरकार विरोधी प्रदर्शन

पुलिस के पूर्व डीआईजी और लेखक अली मोहम्मद वटाली बताते हैं, "इस साल कश्मीर के हालात बहुत ज़्यादा परेशान करने वाले थे. कश्मीर में चरमपंथ की जो तस्वीर बनी वो ख़तरनाक थी. प्रोफेसर रैंक के नौजवानों को हम ने बंदूक उठाते देखा, उन्होंने अपनी जान को कैसे क़ुर्बान किया, वो भी हमने देखा. हुर्रियत के लीडरों के बच्चों ने भी बंदूक उठाई. पुलिस से हथियार छीनने का सिलसिला भी इसी साल सबसे ज़्यादा हुआ."

वटाली कहते हैं कि इस साल के हालात बेहद गंभीर हद तक पहुंच गए हैं. वो कहते हैं, "जो हालात इस वक्त कश्मीर में हैं, ऐसा न हो जाए कि आम लोगों और फ़ौज के बीच ही हाथापाई शुरु हो जाए. 2018 में देखा गया कि कश्मीर इस ट्रेंड की तरफ बढ़ रहा है."



चरमपंथियों की गोली से मारे गए एक पुलिसकर्मी की मौत
JK Police
चरमपंथियों की गोली से मारे गए एक पुलिसकर्मी की मौत

बढ़ती हिंसा, बिगड़ते हालात

नवंबर 2018 में कुलगाम में एक मुठभेड़ खत्म होने के बाद उस जगह पर एक ज़ोरदार विस्फोट हुआ जिसमें सात आम लोगों की मौत हो गई थी. एक दूसरी घटना में दक्षिणी कश्मीर के ज़िला पुलवामा में हुई जहां मुठभेड़ की जगह के पास सेना की फायरिंग में सात आम नागरिकों की मौत हो गई.

पहले के सालों की तरह दक्षिणी कश्मीर इस साल भी चरमपंथ में जुड़ी हिंसा के केंद्र में रहा. सबसे ज़्यादा चरमपंथी, आम नागरिक, सुरक्षाकर्मी और पुलिस जवान दक्षिणी कश्मीर में ही मारे गए.

जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों को भी ज़्यादातर चरमपंथियों ने दक्षिणी कश्मीर में अपने हमलों का निशाना बनाया. यहां इस साल चरमपंथियों ने कई पुलिसवालों का और सेना के जवानों का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी. कई पुलिसवालों के घरों में जाकर पुलिसवालों पर हमले भी हुए.

कश्मीर के लिए कैसा कहा साल 2018
Bilal Bahadur/BBC
कश्मीर के लिए कैसा कहा साल 2018

कश्मीर में तेज़ हुई शांति की मांग

इस साल में ही भारत सरकार ने कश्मीर में एक महीने के लिए एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की थी. एक महीने के इस युद्धविराम के दौरान सुरक्षाबलों पर कई चरमपंथी हमले किए गए थे. जिसके बाद सरकार ने युद्धविराम की अवधि को बढ़ाने से इंकार कर दिया था.

इस पहल को कश्मीर में हालात सामान्य बनाने की ओर उठाए गए एक कदम की तरह देखा गया.लेकिन घाटी में बढ़ती हुई हिंसा को देखते हुए हर वर्ग से कश्मीर मामले में पड़ोसी पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने की आवाज़ें होती रहीं.

न सिर्फ अलगावादी नेता बल्कि कई राजनीतिक दलों ने भी कश्मीर में जारी हिंसा का दौर ख़त्म करने के लिए पाकिस्तान से बातचीत को फिर से बहाल करने पर ज़ोर दिया.

हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह गिलानी
Hurriyat Conference
हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह गिलानी

हाल में पीडीपी अध्यक्ष और पूर्व मख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने बीबीसी को एक इंटरव्यू दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि कश्मीर के हालात बेहद गंभीर हैं. उन्होंने कहा था, "इस साल आपने देखा होगा कि कश्मीर में उन छोटे-छोटे बच्चों ने भी बंदूक उठाई जिनको बंदूक पकड़नी भी नहीं आती. पुलिस और सुरक्षाबलों के लोग मारे गए हैं. बहुत ज़्यादा मारा-मारी हो रही है."

महबूबा मुफ़्ती ने ये भी कहा था कि पाकिस्तान के साथ बातचीत करके समस्या को सुलझाया जा सकता है. उन्होंने कहा था, "बीजेपी के साथ मेरे पिता मुफ़्ती मोहमद सईद ने जम्मू-कश्मीर में जो सरकार बनाई थी, उसका मक़सद था कि जिस तरह मुफ़्ती साब और अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते बेहतर करना शुरू किया था उस कोशिश को बीजेपी के साथ मिलकर और आगे बढ़ाया जाए."

"बीजेपी के साथ जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने के समय जो 'एजेंडा ऑफ़अलायन्स' बना था, उसमें साफ़ साफ़ ये भी था कि पाकिस्तान के साथ-साथ जम्मू -कश्मीर के भीतर भी नेताओं और लोगों से बातचीत करनी है. इसके अलावा भी और भी मुद्दे थे जो 'एजेंडा ऑफ़ अलायन्स में थे'."

अली मोहम्मद वटाली कहते हैं कि जब तक कश्मीर में यहां के नेताओं औऱ लोगों से बातचीत नहीं होगी, जो आज हो रहा है ऐसा ही आगे भी होता रहेगा.

वो कहते हैं, "जब तक केंद्र सरकार हुर्रियत से, पाकिस्तान से और चरमपंथियों से बात नहीं करेगी कश्मीर के हालात बिगड़ेंगे नहीं तो और क्या होगा. साल 2018 में हमने देखा कि कश्मीर में एक भयानक तस्वीर उभरकर सामने आई है."

मुठभेड़ के बाद तबाह हुआ एक घर
Bilal Bahadur/BBC
मुठभेड़ के बाद तबाह हुआ एक घर

बड़े पैमाने पर हिंसा का गवाह बना कश्मीर

कश्मीर में रहने वाले 25 साल के नौजवान तौसीफ़ अहमद कहते हैं कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में पहली बार कश्मीर में इतने बड़े पैमाने पर हिंसा देखी है.

वो कहते हैं, "शायद ही बीते एक साल में कोई ऐसा दिन रहा होगा जब मैं ये खबर नहीं सुनता था कि कश्मीर में कोई मारा गया है- कभी चरमपंथी तो कभी पुलिसकर्मी या फिर कभी आम नागरिक. इन सबका अब अंत होना चाहिए."

बुरहान वानी
BBC
बुरहान वानी

2016 में कश्मीर में हिज़्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की एक मुठभेड़ में मौत हो गई थी. उसके बाद से कश्मीर क़रीब छह महीनों तक हिंसा की आग में उबलता रहा.

वानी की मौत के बाद छह महीने तक कश्मीर में भारत-विरोधी प्रदर्शनों की लहर चली. इस दौरान क़रीब नब्बे लोगों की सुरक्षाबलों के हाथों मौत हो गई.

वानी की मौत के बाद जो हिंसा भड़की उस कारण पैदा हुए हालात के कारण आज भी कश्मीर अशांत है.

कश्मीर में बीते तीस सालों से हथियारबंद आंदोलन चल रहा है. साल 1989 में कश्मीर के हज़ारों नौजवान सीमा पार कर हथियारों की ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान गए थे और फिर उन्होंने लौटकर जम्मू-कश्मीर में हुकूमत के ख़िलाफ़ बगावत शुरू कर दी थी.

तब से ले कर अब तक कश्मीर में हज़ारों लोग हिंसा में मारे गए हैं जिनमें हज़ारों भारतीय सुरक्षाबल और पुलिस के जवान शामिल हैं.

कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान ने अब तक तीन जंगें लड़ी हैं.



जम्मू कश्मीर
EPA
जम्मू कश्मीर

फ़िलहाल शीत लहर के चलते कश्मीर की डल झील बर्फ बन गई है और सर्द हवा ने वहां की पहाड़ियों को घेर लिया है.

लेकिन कुछ ही महीनों में बर्फ पिघलेगी और एक बार फिर सियासी हलचल तेज़ होगी. भारत में होने वाले आम चुनाव में जम्मू कश्मीर भी बेहद अहम किरदार अदा करेगा.

लेकिन साल 2019 में कश्मीर की ज़मीन पर किन बातों और मुद्दों की इबारत होगी, अभी इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल होगा.

BBC Hindi
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English summary
Kashmir Violence murder rap politics how 2018 is passed
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