कश्मीर: इस साल नहीं खिले केसर के फूल, मुरझाए किसानों के चेहरे

केसर
MAJID JAHANGIR/BBC
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कश्मीर के केसर की खेती के किसान अपने खेतों को आज निराशा से देख रहे हैं. इस वर्ष उनके खेतों में बेशुमार केसर के फूल नहीं खिले हैं जो हर वर्ष खिला करते थे.

केसर के खेत में दूर-दूर तक कोई फूल नज़र नहीं आते.

कारण, पांच महीनों से यहां बारिश नहीं हुई. केसर की खेती से जुड़े किसानों का कहना है कि इस बार केसर की पैदावार केवल पांच फ़ीसदी हो पायी है.

क्यों उड़ा हुआ है कश्मीर के केसर का रंग

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केसर पर निर्भर पंपोर

पंपोर में केसर की खेती से जुड़े लोगों की तादाद क़रीब बीस हज़ार है, जिनकी कमाई ज्यादातर केसर की पैदावार पर निर्भर होती है.

पंपोर के केसर के खेतों में मुझे कुछ लड़कियां केसर के फूल तलाश करती नज़र आईं, लेकिन वो उगे ही नहीं थे.

उनमें से एक लड़की रेहाना महमूद कहती हैं कि हम यहां फूल उठाने आए थे लेकिन यहां कुछ भी नहीं है. वो कहती हैं कि इस बार केसर की ज़रा भी पैदावार नहीं हुई है.

केसर सितम्बर-अक्टूबर के महीने में तैयार होता है.

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सरकार हमारी मदद करे

सईद खुर्शीद अहमद की कई नस्लें केसर की खेती करते आई हैं. उनसे जब केसर की बात करते हैं तो वो मायूस हो जाते हैं.

वो कहते हैं, "हर साल अब केसर के पैदावार में कमी आ रही है. 2013 में मेरी ज़मीन में 200 तोला से ज्यादा केसर उगा था. 2014 में क़रीब साठ तोले कम हो गए. 2015 में नब्बे तोला केसर उगा. फिर 2016 में साठ तोले की पैदावार हुई. 2017 में सिफ़र पैदावार हुई है."

वह कहते हैं कि जिसके यहां 100 तोले पैदावार होती थी, उसके यहां एक या दो तोले ही केसर उगा है.

खुर्शीद अहमद कहते हैं, "इसका सबसे बड़ा कारण पानी का है. अब तो बारिश भी खुदा ने बंद कर दी. मेरा परिवार केसर की पैदावार पर निर्भर करता है. घर के सभी लोग इससे जुड़े हैं. सरकार को कुछ मुआवजा देना चाहिए."

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किसानों को भारी नुकसान

जम्मू और कश्मीर केसर एसोसिएशन के अध्यक्ष अब्दुल मजीद कहते हैं कि 2017 कश्मीर के केसर उद्योग के लिए बहुत ही बुरा रहा. उनका कहना है कि चार महीने के लगातार सूखे ने किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया है.

वो कहते हैं, "इस बार एक या दो प्रतिशत केसर की पैदावार हो पाई है. किसी जगह तो यह शून्य है. सूखे के कारण इस साल केसर की खेती करने वालों को दो अरब का नुकसान हुआ है."

केसर की बेहतर पैदावार के लिए 2010 में सरकार ने 400.11 करोड़ की लागत से नेशनल सैफ़रन शुरू किया था. लेकिन केसर उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि सात वर्षों के बाद भी ये मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है. इस मिशन को चार सालों में पूरा होना था, जिसके तहत 128 ट्यूबवेल्स लगाये जाने थे.

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पानी नहीं मिल रहा

अब्दुल मजीद कहते हैं, "सैफ़रन मिशन का मकसद मरते हुए केसर उद्योग को बचाना था. इसकी अच्छी पैदावार के लिए सिंचाई बेहद ज़रूरी है. किसानों की हालत बेहद ख़राब है. जो खर्च किया थो वो भी वापस नहीं आया. खुदकुशी करने की नौबत आ गई है. बारिश नहीं होने की वजह से केसर का काम पूरी तरह से ख़त्म हो गया है. कई जगहों पर पानी पहुंचाने के लिए ट्यूबवेल्स लगाए गए थे लेकिन अभी तक वो पानी नहीं दे पाए हैं."

मजीद कहते हैं, "एक ज़माना था, जब हमारे इलाके में नौकरी करने की कोई सोचता भी नहीं था. पैदावार बहुत होती थी. अब पैदावार कम हो रही है, जिसकी वजह से नई पीढ़ी अब इस उद्योग से बाहर निकल रही है."

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दो अरब का नुकसान

मजीद के मुताबिक़ पंपोर इलाके में क़रीब सत्रह टन केसर की पैदावार होती रही है. वो ये भी कहते हैं कि इस साल केसर की खेती में क़रीब दो अरब का नुकसान हुआ है.

मजीद कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान का केसर उद्योग अब हमसे भी आगे निकल गया है. वो कहते हैं कि उनके पास सिंचाई का बेहतर इंतजाम है, अगर यहां भी ऐसा किया जाता तो हम किसी से पीछे नहीं रहते.

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आंकड़े इक्ट्ठा कर रहे

कश्मीर ज़ोन के एग्रीकल्चर डायरेक्टर अल्ताफ़ अजाज़ अंद्राबी कहते हैं, "अभी हम इस वर्ष हुए नुकसान के आंकड़े इकट्ठा कर रहे हैं."

उन्होने कहा, "ये भी हो सकता है कि मेरे अंदाजे से ज्यादा गिरावट दर्ज हो. इसकी वजह बारिश का न होना है. इस बार तो हमको एक बूंद भी बारिश नहीं मिली, जो इसकी अच्छी पैदावार के लिए ज़रूरी है. फूल तभी निकलते हैं जब उसकी ज़मीन में नमी हो, जब नमी न हो तो फूल कहां से निकलेंगे."

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ बीते साल कश्मीर में 17.64 मीट्रिक टन की पैदावार दर्ज की गई थी.

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