उत्तर प्रदेश चुनावः दंगों से आगे बढ़ चुके कासगंज में क्या होगा उलटफेर? - ग्राउंड रिपोर्ट

अदालत के आदेश के बाद अल्ताफ की लाश को तीन महीने बाद क़ब्र से निकालकर दोबारा पोस्टमार्टम किया गया
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अदालत के आदेश के बाद अल्ताफ की लाश को तीन महीने बाद क़ब्र से निकालकर दोबारा पोस्टमार्टम किया गया
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क़ब्रिस्तान में ख़ामोश खड़े लोग भारी पुलिस बल की मौजूदगी में अल्ताफ़ की लाश को क़ब्र में उतरते देख रहे हैं. हाई कोर्ट के आदेश पर अल्ताफ़ का दोबारा पोस्टमार्टम दिल्ली के एम्स अस्पताल में किया गया है. उसके बीमार पिता चांद मिया बमुश्किल अपने आंसुओं को थामते हुए बस इतना ही कह पाते हैं, "मुझे उम्मीद है मेरे बेटे को इंसाफ मिलेगा."

दोबारा अपने बेटे की लाश को दफ़ना रहे चांद मियां की आंखों में इंसाफ़ की उम्मीद को ख़ामोशी ने छुपा लिया है.

उत्तर प्रदेश के कासगंज में अल्ताफ की तीन महीने पहले संदिग्ध परिस्थितियों में पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी. कासगंज पुलिस ने दावा किया था कि अल्ताफ़ ने अपनी हुडी के नाड़े से थाने के बाथरूम में ढाई फ़ीट ऊंची टोटी से फंदा कसकर आत्महत्या कर ली थी.

विरोध प्रदर्शनों और कई कोशिशों के बाद अल्ताफ के पिता पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा दर्ज कराने में कामयाब रहे. लेकिन अभी तक इस मामले में किसी पुलिसकर्मी को गिरफ़्तार नहीं किया गया है.

अल्ताफ़ को पुलिस ने एक हिंदू युवती से प्रेम प्रसंग के शक में हिरासत में लिया था. बाद में जांच में सामने आया था कि किसी और युवक के साथ चली गई थी.

जांच अधिकारी राम कृष्ण तिवारी कहते हैं, "मामले की अभी जांच चल रही है. इसके सिवा इस बारे में जांच पूरी होने तक हम कुछ नहीं कहेंगे."

अल्ताफ़ की हिरासत में हत्या का आरोप पुलिस पर है और अधिकारी कुछ भी बोलने से बच रहे हैं
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अल्ताफ़ की हिरासत में हत्या का आरोप पुलिस पर है और अधिकारी कुछ भी बोलने से बच रहे हैं

अल्ताफ़ की मौत ने उत्तर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ये दावा करते हैं कि उनके शासन में अपराध कम हुए हैं.

आदित्यनाथ के दावे के कई समर्थक आसानी से मिल जाते हैं. अपने खेत पर बैठे चंदेरीलाल सरकार की तारीफ़ करते हुए कहते हैं, "अब चोर-उचक्कों में खौफ़ है. हम रात-बेरात भी बेख़ौफ़ निकलते हैं."

कई और लोग उनकी हां में हां मिलाते हैं. लेकिन कासगंज के क़ब्रिस्तान में खड़े लोग सवाल करते हैं, "पुलिस पर नागरिकों की हत्या के आरोप लग रहे हैं, क्या ये कहा जा सकता है कि लोग सुरक्षित हैं? पहले बदमाश मारते थे, अब पुलिस मार रही है."

पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान लोहिया आवास योजना के तहत बने अपने पक्के मकान के बाहर बैठे चांद मियां कहते हैं, "हमें अब सिर्फ़ अदालत से और बाबा भीमराव अंबेडकर के बनाए संविधान से ही न्याय की उम्मीद है."

चांद मिया
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चांद मिया

जवान बेटे की मौत ने चांद मियां को तोड़ दिया है. प्रशासन ने उन्हें पांच लाख रुपए की आर्थिक मदद दी थी. कई संगठन भी क़ानूनी लड़ाई में उनकी मदद कर रहे हैं. लेकिन वो सवाल करते हैं कि जिस तरह पुलिस हिरासत में मारे गए दूसरे लोगों की सरकार ने मदद की, उस तरह उनकी मदद नहीं की.

एक स्थानीय पत्रकार कहते हैं, "कानपुर के कारोबारी की पुलिस ने हत्या की. उनके परिवार को सरकारी नौकरी, एक करोड़ की आर्थिक मदद और कई तरह की अन्य मदद दी गई. लेकिन चांद मियां को ऐसी मदद नहीं दी गई. सरकार के रवैये में फर्क साफ दिखता है."

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चुनाव और नेताओं के दौरे

कासगंज में 20 फ़रवरी को वोट डाले जाएंगे. चुनावी शोर में अल्ताफ़ की मौत का मुद्दा भी शामिल हो गया है. स्थानीय नेता बारी-बारी से अल्ताफ़ के घर आ रहे हैं और उन्हें न्याय की लड़ाई में साथ देने का भरोसा दे रहे हैं.

चांद मियां को भरोसा है कि उन्हें न्याय मिलेगा और वो ये भी जानते हैं कि इसमें लंबा वक़्त लगेगा. बीमार चांद मियां नहीं जानते कि वो अपने बेटे को इंसाफ़ मिलता देख पाएंगे या नहीं. लेकिन उनकी उम्मीद नहीं टूटी है.

तीन महीने पहले दफ़न किए गए अल्ताफ़ का दोबारा पोस्टमार्टम हआ है
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तीन महीने पहले दफ़न किए गए अल्ताफ़ का दोबारा पोस्टमार्टम हआ है

कासगंज में चुनाव प्रचार अपने चरम पर हैं. कहीं आएंगे तो योगी जी ही का शोर है तो कहीं जय अखिलेश नारा बज रहा है. इससे इतर बसपा कार्यकर्ता खामोश से चुनाव प्रचार करते नजर आते हैं.

कासगंज एक छोटा जिला है जो अस्पताल में डॉक्टर ना होने की बुनियादी समस्या से जूझ रहा है. यहां तीन विधानसभा सीटें हैं जिन पर बारी-बारी से सभी दलों का कब्ज़ा रहा है.

2007 के विधानसभा चुनावों में तीनों सीटों पर बहुजन समाज पार्टी ने जीत दर्ज की थी. 2012 के चुनावों में यहां दो पर सपा और एक पर बसपा जीती थी. 2017 में तीनों सीटें बीजेपी के पास चली गईं थीं.

जाति सब पर हावी?

इस बार यहां त्रिकोणीय मुक़ाबला है और सभी दलों को अपनी जीत की उम्मीद है. लेकिन चुनावों पर नज़र रख रहे स्थानीय पत्रकार मानते हैं कि इस बार मुद्दों पर जातीय और धार्मिक गणित अधिक हावी है.

वरिष्ठ पत्रकार अजय झँवर कहते हैं, "यहां जाति अधिक प्रभावी है. ये लोधी बाहुल्य क्षेत्र है. कासगंज सदर सीट पर यहां 17 चुनावों में 14 बार लोधी उम्मीवार जीता है. इस बार भी सपा और भाजपा दोनों ने लोधी उम्मीदवार दिए हैं."

अजय झँवर कहते हैं, "स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क यहां की बुनियादी ज़रूरते हैं लेकिन चुनाव में ये मुद्दे पीछे छूटे नज़र आते हैं. बड़ी तादाद में मतदाताओं का जातिगत रुझान है लेकिन शहरी मतदाता मुद्दों को भी अहमियत दे रहे हैं. दलगत निष्ठा भी हावी नज़र आती है."

ऊपर से देखने पर भले ही यहां मुक़ाबला सपा-भाजपा के बीच नज़र आ रहा है लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि बसपा भी यहां अपनी खोई ज़मीन हासिल करने में पूरी मेहनत से जुटी है. अजय मदान कहते हैं, "बसपा ने मुसलमान उम्मीदवार देकर मुक़ाबले को त्रिकोणीय बना दिया है."

ज़िले की तीन सीटों में से कासगंज और अमापुर लोधी बाहुल्य हैं जबकि पटियाली में मुसलमान मतदाता असरदार संख्या में हैं. मदान कहते हैं, "सबसे रोचक मुक़ाबला पटियाली में नज़र आ रहा है. यहां बसपा ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारा है जो बहुत दमखम से चुनाव लड़ रहे हैं."

जातिगत और धार्मिक आधार पर बंटे मतदाताओं में कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्हें विकास और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों की फ़िक्र है.

शिक्षक विकास कुमार का कहना है कि स्थानीय मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है
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शिक्षक विकास कुमार का कहना है कि स्थानीय मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है

पेशे से शिक्षक विकास कुमार कहते हैं, "यहां सरकारी अस्पताल में 38 डॉक्टर होने चाहिए लेकिन बमुश्किल तीन डॉक्टर ही हैं. ना कोई न्यूरो सर्जन है और ना कार्डियो विशेषज्ञ. लेकिन किसी भी राजनीति दल के एजेंडे में अस्पताल या कॉलेज नज़र नहीं आते. पास के ज़िलों में मेडिकल कॉलेज हैं लेकिन कासगंज में नहीं है. हम चाहते हैं कि इस तरफ भी ध्यान दिया जाए."

सत्ताधारी बीजेपी क्या कह रही है?

चुनाव में जनता के मुद्दे पीछे छूट जाने के सवाल पर कासगंज के बीजेपी ज़िलाध्यक्ष केपी सिंह कहते हैं, "हमारी सरकार ने हर संभव विकास करने की कोशिश की है. कोविड की वजह से दो साल ख़राब हुए. अगली सरकार में हमारी योजना मेडिकल सुविधाओं को और भी मज़बूत करने की है."

डॉक्टर न होने के सवाल पर केपी सिंह कहते हैं, "ये एक छोटा ज़िला है. कई कारणों से कुछ डॉक्टर ने पद ग्रहण नहीं किया. हमने ये वादा किया है कि ज़िले में मेडिकल कॉलेज भी स्थापित किया जाएगा."

विकास को एक और फ़िक़्र है. शहर के जिस इलाक़े में वो रहते हैं वहां कच्ची शराब और ड्रग्स बेचे जाने लगे हैं. विकास कहते हैं, "मैंने कई बार ट्वीट करके पुलिस और प्रशासन क ध्यान स्मैक और कच्ची शराब की बिक्री की तरफ खींचने का प्रयास किया. लेकिन कभी कोई जवाब नहीं मिला. मुख्यमंत्री पोर्टल पर भी मेरी याचिका की अनदखी कर दी गई. सरकार क़ानून व्यवस्था सुधारने का दावा करती है. यदि क़ानून व्यवस्था सुधरी है तो फिर ड्रग्स और कच्ची शराब क्यों इतनी आसानी से बिक रही है?"

क़ानून व्यवस्था के सवाल पर केपी सिंह कहते हैं, "हमने सुधार किया है और आगे भी सुधार करेंगे. कच्ची शराब बेचने वालों का एनकाउंटर भी कासगंज में ही हुआ. ड्रग्स की बिक्री के आरोप गंभीर हैं, हम वादा करते हैं कि शहर में ड्रग्स नहीं बिकने दिए जाएंगे."

वहीं इन्हीं सवालों पर बहुजन समाज पार्टी के ज़िलाध्यक्ष एसएस भारती का कहना था, "बहुजन समाज पार्टी ने सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की नीति के तहत सभी के विकास और सुरक्षा के लिए काम किया था. लेकिन पहले अखिलश और फिर बीजेपी की सरकार में स्थिति ख़राब होती चली गई. हम आगे भी 2007 जैसा शासन देने के वादे के साथ चुनाव में हैं और इसे पूरा करेंगे."

चुनावी शोर से बसपा की दूरी की वजह बताते हुए भारती कहते हैं, "हम अलग तरह से प्रचार कर रहे हैं. हमारे कार्यकर्ता मतदाताओं के घर-घर जाकर सीधा संपर्क कर रहे हैं. हम अपने काडर को मज़बूत करने में लगे हैं. हमारी कोशिशें भले ही मीडिया में ना दिख रही हैं लेकिन ज़मीन पर हमारा असर है और ये चुनावी नतीजों में दिखेगा."

एसएस भारती की बात का असर हमें बहुजन समाज पार्टी के कोर वोटर बैंक के इलाकों में नजर आया. यहां बसपा कार्यकर्ता एक-दो की संख्या में लोगों से बात करते नज़र आए.

बहुजन समाज पार्टी को वोट देते रहे एक मतदाता कहते हैं, "हम पहले से भी अधिक मज़बूती के साथ अपनी पार्टी के साथ हैं. दूसरे दलों की सरकारों में हमारे हितों की अनदेखी होती रही है. हम अपने वोट की अहमियत समझते हैं और अपनी नेता को मज़बूत करने में लगे हैं."

वहीं कासगंज के ही रहने वाले और समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हफ़ीज़ गांधी कहते हैं, "समाजवादी पार्टी बदलाव के लिए ये चुनाव लड़ रही है. उम्मीदवार चुनते हुए सभी समीकरणों का ध्यान रखा गया है. अखिलेश यादव की पिछली सरकार ने जो विकास शुरू किया था उसे पूरा करना ही हमारा सबसे बड़ा एजेंडा है."

धार्मिक और जातिगण ध्रवीकरण के सवाल पर गांधी कहते हैं, "हमें पूरा भरोसा है कि मतदाता अपने हितों का सबसे पहले ख्याल रखेंगे."

आम लोगों के मुद्दों की अनदेखी?

आम लोगों के बीच महंगाई के मुद्दे पर बहस होती भी नज़र आई. लोग तेल, गैस और खाद्य तेलों के दाम में बढ़ोत्तरी के आगे बेबस नज़र आए.

एक सब्ज़ी विक्रेता कहते हैं, "अब मैं पांच सौ रुपए रोज़ाना भी नहीं कमा पा रहा हूं. सब्जी इतनी महंगी है कि आम लोगों की पहुंच से दूर हो गई है. कई बार जितनी सब्ज़ी बिकती नहीं उससे ज़्यादा ख़राब हो जाती है."

युवा इसरार रोज़गार खोज रहे हैं लेकिन उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा है. वो कहते हैं, "मैं बिलकुल फालतू हूं, इधर उधर डोल रहा हूं. कोई भी काम कर सकता हूं लेकिन काम नहीं है."

बारहवीं तक पढ़े इसरार कहते हैं, "सरकार ये कहती है कि आटा-राशन तो मिल रहा है. ये सही बात है कि राशन मिल रहा है. लेकिन क्या सिर्फ़ राशन से ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं. लोगों पर क़र्ज़ बढ़ रहा है. घरों में बेटियां जवान हो रही हैं लेकिन पैसा ना होने की वजह से उनकी शादी नहीं हो पा रही है. सबसे बड़ा मुद्दा रोज़गार होना चाहिए लेकिन किसी भी राजनीतिक दल को इसकी परवाह नहीं है. सरकार चाहे जिसकी भी आए, हम जैसे मज़दूरों को काम मिलना चाहिए. बेरोज़गारी की वजह से हम डिप्रेशन में हैं, दिन भर इधर-उधर खाली डोलते हैं. कोई तो हमारे बारे में सोचे."

"दंगे को भूल चुका है" गंगा-यमुना के बीच बसा कासगंज

कासगं में 2018 में सांप्रदायिक दंगे हुए थे
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कासगं में 2018 में सांप्रदायिक दंगे हुए थे

ब्रज क्षेत्र के अंतिम छोर पर बसे कासगंज के एक तरफ गंगा नदी है और दूरसी तरफ यमुना नदी बहती है. यहां हिंदुओं और मुसलमानों के बीच आपसी भाईचारे का इतिहास रहा है.

कासगंज ज़िले में ही अमीर ख़ुसरो का जन्म हुआ था और तुलसीदास भी यहीं बढ़े हुए थे. कासगंज के लोग बात-बात में भारत की इन दो महान हस्तियों का ज़िक्र करते हैं.

यहां कई सूफी संतों की मज़ार ही हैं. कासगंज के समीप के ही मारहरा शरीफ़ में खानकाहे बरकतिया के सूफ़ी बुज़ुर्ग हजरत सैयद शाह बरकतुल्लाह की मज़ार है. उन्होंने मशहूर दोहा लिखा था-

"हिन्दू और तुर्क में रंग एक ही रहो समाए देवल और मसीद में दीप एक ही भाए."

लेकिन साल 2018 में हुए सांप्रदायिक दंगे ने यहां की फ़िज़ा में भी सांप्रदायिकता का ज़हर घोल दिया था. आम लोग अब उस दौर से आगे बढ़ गए हैं.

स्थानीय निवासी शादाब कहते हैं, "कासगंज उस दंगे को भूल गया है. अच्छी बात ये है कि इस बार चुनाव में भी दंगों का कोई असर नज़र नहीं आ रहा है."

2018 के दंगों को कवर करने वाले स्थानीय पत्रकार मोहम्मद आमिल कहते हैं, "26 जनवरी 2018 को कासगंज में दंगा हुआ. उस वक़्त ऐसा लगा कि शायद दो समुदायों के बीच खाई बहुत गहरी होने वाली है लेकिन इसे जल्दी ही भुला दिया गया."

2018 के सांप्रदायिक दंगे
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2018 के सांप्रदायिक दंगे

कासगंज में कई कारोबार हैं. यहां रेडीमेड गार्मेंट्स, सरिया उत्पादन, सर्राफ़ा और मसलों के कारोबार से बड़ी तादाद में लोग जुटे हैं. दंगों के दौरान व्यापारियों का भी काफ़ी नुक़सान हुआ था.

मोहम्मद आमिल कहते हैं, "कासगंज दंगा यहां के व्यापारियो के लिए बहुत नुकसान कर गया था. दंगो के बाद यहां के कपड़ा, सिया और मसाला कारोबार में लगे व्यापारियों का भारी नुकसान हुआ. यहां के व्यापारी संगठनों ने इस दंगे की आग को बुझाकर कासगंज के बाजार को फिर से गुलज़ार किया था."

इस बार चुनाव में न ही आम मतदाता और ना ही राजनीतिक दल उस दंगे को याद कर रहे हैं. मोहम्मद आमिल कहते हैं, "इस चुनाव में दंगा कोई मुद्दा नही है इसकी बानगी अभी हाल में ही में हुई राज राजनीतिक हस्तियों की जनसभाओं में भी देखने को मिली. देश के गृहमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की जनसभाओं में कासगंज दंगे का कही कोई ज़िक्र नही था. यहां तक कि कासगंज दंगे में मारे गए चंदन गुप्ता के साथियों ने जरूर ग्रहमंत्री अमित शाह की जनसभा में आवाज़ उठाई थी लेकिन उन आवाज़ों का शोर भी दबा दिया गया था."

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