दिल्ली में आयोजित इंटरनेशल ट्रेड फेयर में खूब पॉपुलर हो रहा ओडिशा का 'करुणा सिल्क', जानें क्यों है खास?
दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले (आईआईटीएफ) में आने वाले लोगों को ओडिशा सरकार द्वारा की गई 'करुणा सिल्क' की पहल बहुत आकर्षित कर रही है। श्रीमंदिर में भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहनों के 'खंडुआ पट्टा' खुर्दा जिले के रौतापाड़ा के बुनकर बनाते हैं वो ही दिल्ली में आयोजित ट्रेड फेयर में करुणा सिल्क' कैसे बनाते हैं, उसका प्रदर्शन कर रहे हैं।

आपको जानकर ताज्जुब होगा कि करुणा रेशम, रेशमी कीड़ों के मारे बिना तैयार किया जाता है। ये रेशम बनाने की सौम्य और अहिंसक विधि है। करुणा रेशम जिसे शांति, शाकाहारी या क्रूरता-मुक्त रेशम भी कहा जाता है ये एरी रेशमकीड़ों को मारे बिना बनाया जाता है।
बता दें ओडिशा में ये प्रोजेक्ट पिछले साल अक्टूबर में पांच जिलों - क्योंझर, अथागढ़, खुर्दा, नयागढ़ और सुंदरगढ़ में शुरू की गई थी, जिसमें लगभग 700 रेशम उत्पादक किसान शामिल थे। इस वर्ष विभाग 2,500 रेशम किसानों वाले 14 जिलों में इस पहल का विस्तार किया गया है।
आईएंड पीआर विभाग के प्रमुख सचिव संजय कुमार सिंह ने बताया करुणा सिल्क, हथकरघा, कपड़ा और हस्तशिल्प विभाग का एक नया उद्यम, इस साल आईआईटीएफ में ओडिशा पवेलियन में यूएसपी बन गया है। आगंतुक हमारी इस नवाचार के बारे में जानने में गहरी दिलचस्पी ले रहे हैं।
प्रमुख सचिव संजय कुमार ने बताया करूणा रेशम प्रोजेक्ट ये सुनिश्चित करता है कि रेशम बनाने में एक भी कीड़ की हत्या यानी मारा ना जाए। रेशम के कीड़ो को मारकर उससे रेशम का धागा बनाते की पारंपरिक विधि के ये बिलकुल उल्टा है। इस विधि से रेशम बनाने में कोकून को जीवित कीड़े के साथ उबालने के बाद इसे निकाला जाता है। इस उद्देश्य से विभाग ने अरंडी आधारित एरिकल्चर को अपनाया है।
सूत्रों के अनुसार सामान्य शहतूत रेशम की साड़ी 10,000 से 20,000 रेशम के कीड़ों को मारकर बनाई जाती है। इसी तरह पारंपरिक प्रक्रिया में एक टसर सिल्क साड़ी बनाने में 5,000 से 7,000 रेशम के कीड़ों की जान चली जाती है।












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