'पंजे' वाले कमलनाथ की वो 5 बड़ी चिंता, जिसकी वजह से 'कमल' आ रहा पसंद?
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ ने भाजपा में शामिल होने की अटकलों पर अपनी चुप्पी से सियासी दिलचस्पी और बढ़ा रखी है।
उनके और एमपी के छिंदवाड़ा से उनके सांसद बेटे नकुलनाथ के बीजपी में शामिल होने की चर्चाओं के पीछे वो 5 वजहें हैं, जिसके चलते खुद को इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे बताने वाले इस कांग्रेसी दिग्गज के अपनी ही पार्टी से मोहभंग होने की चर्चाएं चल रही हैं।

बेटे नकुलनाथ का राजनीतिक भविष्य
खुद कमलनाथ 77 की उम्र को को पार कर चुके हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नजरिए पर चल रही भारतीय जनता पार्टी में खुद उनके लिए ज्यादा राजनीतिक भविष्य तो दिखाई नहीं दे रहा।
लेकिन, छिंदवाड़ा के अपने अजेय दुर्ग को बचाए रखने और बेटे नकुलनाथ की सियासी गारंटी उन्हें भाजपा की ओर देखने को मजबूर कर रहा हो, ये संभव है। मध्य प्रदेश की यही वह एकमात्र लोकसभा सीट है, जहां 2019 में भी कांग्रेस की लाज बच गई थी।
2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और पीएम मोदी की आंधी में राज्य में कांग्रेस की नीवें और हिल पड़ीं, लेकिन फिर भी कांग्रेस को छिंदवारा की सात सीटें मिल गईं।
लेकिन, कमलनाथ के हाथों में कांग्रेस की कमान होने के बावजूद कांग्रेस की जीत का अंतर यहां भी घट गया। ऐसे में अयोध्या में भव्य राम मंदिर में भगवान राम लला की प्राण प्रतिष्ठा और पीएम मोदी की लोकप्रियता के ग्राफ ने इस साल के लोकसभा चुनावों में चुनौती और बढ़ा रखी है।
ऊपर से भाजपा ने खासकर छिंदवाड़ा में ही कमलनाथ को घेरने के लिए अपने कैलाश विजयवर्गी जैसे दिग्गज को भी लगा दिया है।
ऐसे में सियासत के आखिरी पड़ाव पर पांच दशकों की अपनी राजनीति के गढ़ को बचाना कमलनाथ की पहली प्राथमिकता हो सकती है; और इसके लिए अभी उनके सामने भाजपा से बेहतर विकल्प नहीं है। क्योंकि, इसके बाद पांच साल का लंबा इंतजार उनकी सियासी फिजा को उलट-पुलट कर सकता है।
कांग्रेस में घटता रुतबा
शुरू से केंद्र की राजनीति करने वाले कमलनाथ को जब 2018 में कांग्रेस ने प्रदेश की कमान सौंपी तो राज्य में पार्टी के अंदर उनके सामने किसी की नहीं चली। उन्होंने पहले सरकार चलाई और फिर विपक्ष में आए तो पार्टी को विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के सामने खड़ा किया।
पार्टी पर ऐसी पकड़ बनाई कि भोपाल में घोषित इंडिया ब्लॉक की पहली रैली के आयोजन से इनकार कर दिया और अखिलेश-वखिलेश वाले बयान देखर गठबंधन को नकारा, तब भी आला कमान उनसे एक सवाल पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
पिछले साल नवंबर के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की अप्रत्याशित हार ने उनके सामने पूरा सियासी सीन ही बदल दिया। जो हाई कमान उनपर उंगली उठाने तक की हिम्मत नहीं कर पाता था, उसपर आलोक शर्मा जैसे कांग्रेसी प्रवक्ता ने भी बीजेपी से साठगांठ का आरोप लगाने की हिमाकत कर दी।
जिस कांग्रेस पार्टी में कमलनाथ की तरह गांधी परिवार से पुराने कनेक्शन वाला कोई दिग्गज नहीं बचा, उसपर सरेआम आरोप लगाने वाले प्रवक्ता पर पार्टी ने कोई कार्रवाई नहीं की।
ऐसे में शायद कमलनाथ को लग गया कि पार्टी में उनके दिन अब लद चुके हैं। कांग्रेस में बची-खुची इज्जत का और कबाड़ा करने से पहले बोरिया-बिस्तर समेट लेने में ही परिवार के सियासी भविष्य की भलाई है।
राहुल गांधी का बर्ताव
कांग्रेस के गांधी परिवार के करीबी अपने जैसे कद का कोई नेता नहीं होने की वजह से अगर कमलनाथ को पार्टी में फायदा मिला तो उन्होंने उस परिवार के प्रति खुद को समर्पित भी किए रखा। उनकी पांच दशकों की राजनीति में गांधी-नेहरू परिवार का हर विचार उन्होंने अपने सिर-माथे पर उठाया है।
इस वजह से उन्हें उम्मीद थी कि अगर अब मध्य प्रदेश की राजनीति में उनके लिए ज्यादा उम्मीदें नहीं रह गई है तो 10 जनपथ से उन्हें फिर से नई दिल्ली में पुनर्वास की व्यवस्था कर दी जाएगी। इसी भरोसे के दम पर उनकी राज्यसभा के माध्यम से दिल्ली वापसी की चर्चा तेज हुई।
कहते हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी उन्हें मना भी नहीं कर पाए। लेकिन, राहुल गांधी ने उनकी राजनीति की गाड़ी ऐसे फंसाई कि उससे बाहर निकल पाना मुश्किल हो गया। जानकारी के अनुसार इसमें प्रियंका गांधी ने भी अपने भैइया का साथ देना मुनासिब समझा।
जिन बच्चों को बचपन में मनाने-पुचकारने के लिए पूरी जवानी पसीना बहाया, वही बच्चे अब 'मालिक वाले अंदाज' में बर्ताव कर रहे हैं? शायद यही बात उनके दिल को खटक गई है!
सिख दंगों का मामला
इस बीच इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए सिख-विरोध दंगों का जिन्न भी कमलनाथ के पीछे पड़ा हुआ है। दिल्ली हाई कोर्ट ने इसी महीने एसआईटी को इस मामले में कमलनाथ के खिलाफ हुई कार्रवाई को लेकर स्टैटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने भाजपा नेता मनजिंदर सिंह सिरसा की याचिका पर एसआईटी को स्टैटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। अब इस मामले की सुनवाई की तारीख 23 अप्रैल को मुकर्रर की गई है।
भांजे रतुल पुरी पर शिकंजा
कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी आर्थिक अपराध से जुड़े मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में हैं। रतुल पुरी अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले से लेकर उर्वरक घोटाले और मोजर बियर से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस तक में भी आरोपी हैं और वह जमानत पर जेल से बाहर हैं।












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