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दाल-भात, बेगुन भाजा पर जीवन काटने वाले ज्योति बसु

By Bbc Hindi
ज्योति बसु
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ज्योति बसु

ज्योति बसु और उनसे पहले पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे सिद्धार्थ शंकर राय के बीच लगभग उस हद तक राजनीतिक प्रतिद्वंदिता थी जैसी आजकल मुलायम सिंह यादव और मायावती के बीच रहती है.

लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर दोनों के बीच जिस तरह की नज़दीकियाँ थीं, उन्हें शब्दों में बयान करना काफ़ी मुश्किल है. उस ज़माने में ज्योति बसु को एक विधायक के रूप में 250 रुपए तनख्वाह के तौर पर मिलते थे जिसका अधिकांश हिस्सा वो पार्टी को दे दिया करते थे.

सिद्धार्थ जब ज्योति बसु से मिलने जाते थे तो कभी-कभार उनकी रसोई की तरफ भी बढ़ जाते थे ये देखने के लिए कि आज खाने में क्या बना है. उनके यहाँ बहुत साधारण खाना बनता था. दाल भात और तले हुए बैंगन (बेगुन भाजा).

बाद में जब वो विपक्ष के नेता हो गए तो हालात थोड़े बेहतर हो गए और उनका वेतन बढ़ा कर 750 रुपए मासिक कर दिया गया.

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कुछ लिखने की गुज़ारिश

तब भी ज्योति बसु की पत्नी कमला बसु, सिद्धार्थ से अक्सर शिकायत करतीं थीं कि अपने दोस्त को बताएं कि घर किस तरह से चलाया जाता है? वो अभी भी लगभग पूरा वेतन पार्टी को दे देते हैं और मेरे लिए दोनों वक्त का खाना बनाना मुसीबत बन जाता है.

एक बार चंद्रनगर से कोलकाता आते हुए ज्योति बसु और सिद्धार्थ शंकर राय को कुछ सुंदर कन्याओं ने घेर लिया. ज्योति उस ज़माने में स्टार राजनीतिज्ञ हुआ करते थे, इसलिए सब उनका ऑटोग्राफ़ मांगने लगीं.

लेकिन वो उनके हस्ताक्षर भर से संतुष्ट नहीं हुईं. उनका इसरार था कि ज्योति बसु हस्ताक्षर के साथ एक दो पंक्तियाँ भी लिखें. लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया.

जब वो कार में आए तो सिद्धार्थ ने मज़ाक किया कि आप इतनी सुंदर कन्याओं को किस तरह से मना कर सकते हैं. आप टैगोर की ही एक दो पंक्ति लिख देते. इस पर ज्योति बसु ने बंगाली में जवाब दिया, 'जानबो तो लेखबो' (पता होता तभी तो लिखता.)

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इंदिरा गांधी से मुलाकात

बांग्लादेश युद्ध से कुछ पहले सिद्धार्थ ने इंदिरा गांधी से उनके निवास स्थान पर ज्योति बसु की एक गुप्त मुलाकात करवाई. किसी को इस मुलाकात का पता न चले इसलिए वो रात के ग्यारह बजे अपनी पत्नी माला की फ़ियेट कार में ज्योति बसु को बैठा कर खुद ड्राइव कर 1 सफ़दरजंग रोड पहुंचे.

एक घंटे की मुलाकात के बाद जब राय बाहर निकले तो रास्ता भूल गए और दिल्ली के गोलचक्करों के चक्कर काटते रहे. जब एक घंटे तक वो रास्ता नहीं ढ़ूढ़ पाए तो सिद्धार्थ ने कहा कि किसी थाने में पहुँच कर मदद मांगी जाए.

इस पर ज्योति बसु ने कहा, "नालायक! क्या तुम पूरी दुनिया में ढ़िंढ़ोरा पीटना चाहते हो कि मैं इंदिरा गांधी से मिलने उनके निवास स्थान पर गया था." सौभाग्य से सिद्धार्थ शंकर राय को रास्ता मिल गया और किसी थाने जाने की नौबत नहीं आई.

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सरकार पर हमला बोलिए

राजनीतिक विरोध के बावजूद ज्योति बसु कांग्रेस के नेता एबी ग़नी ख़ान चौधरी को अपने परिवार का सदस्य मानते थे. वो बरकत दा को शाहेब कह कर बुलाते थे.

उनकी बहन हर दो सप्ताह पर ज्योति बसु के लिए बिरयानी भेजा करती थीं. कभी कभी किन्हीं कारणों से जब बिरयानी नहीं पहुंच पाती थी तो ज्योति फ़ोन कर पूछा करते थे, "पठाओ नी केनो" (भेजा क्यों नहीं).

बंगला पत्रकार तरुण गांगुली एक मज़ेदार क़िस्सा बताते हैं. एक बार ज्योति बसु ने बरकत दा के भाई और पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता से अकेले में कहा कि आप फ़लां-फ़लां मुद्दे पर सदन में सरकार पर हमला क्यों नहीं बोलते?

आपको कड़े शब्द इस्तेमाल करने चाहिए. कागज़ कलम निकालिए और लिखिए कि अगले दिन आप किस तरह हम पर हमला बोलेंगे.

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फ़िदेल कास्त्रो सीऑफ़ करने आए

सीताराम येचुरी बताते हैं कि 1993 में ज्योति बसु को क्यूबा आने का निमंत्रण मिला. यात्रा के दौरान जब ज्योति रात को सोने की तैयारी कर रहे थे तभी उन्हें संदेश मिला कि फ़िदेल कास्त्रो उनसे मिलना चाहते हैं.

सीताराम येचुरी के साथ ज्योति बसु आधी रात के आसपास उनसे मिलने पहुँचे. सीताराम येचुरी बताते हैं कि वो बैठक डेढ़ घंटे चली. कास्त्रो उनसे सवाल पर सवाल किए जा रहे थे.

भारत कितना कोयला पैदा करता है? वहाँ कितना लोहा पैदा होता है? वगैरह वगैरह... एक समय ऐसा आया कि ज्योति बसु ने बंगाली में मुझसे कहा, "एकी आमार इंटरव्यू नीच्छे ना कि"(ये मेरा इंटरव्यू ले रहे हैं क्या?).

अगले दिन जब ज्योति बसु जाने के लिए हवाना एयरपोर्ट पहुँचे तो पता चला कि फ़िदेल कास्त्रो उन्हें सीऑफ़ करने के लिए वहाँ पहुँचे हुए हैं.

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हमें मंदिर जाना चाहिए

सीताराम येचुरी पहली बार 1989 में ज्योति बसु के साथ नेपाल विदेश यात्रा पर गए थे. वो नेपाल सरकार के राजकीय अतिथि थे.

इसलिए उन्होंने ज्योति बसु के लिए पशुपतिनाथ मंदिर जाने का कार्यक्रम रखा. येचुरी ने उनसे पूछा कि उन्होंने मंदिर जाने से इनकार क्यों नहीं कर दिया.

उन्होंने कहा कि जिस तरह भारत हर विदेशी मेहमान को राज घाट ले जाता है चाहे उसका गांधीवाद में विश्वास हो या नहीं, उसी तरह नास्तिक होते हुए भी हमें पशुपतिनाथ मंदिर जाना चाहिए.

ज्योति बसु की पुत्र वधू डौली बसु बताती हैं, "मेरी शादी के एक दिन बाद ही मुझे बुखार चढ़ गया. अगली सुबह जब मैं बिस्तर में ही थी कि मैंने रसोई से कुछ बर्तन खड़खड़ाने की आवाज़ सुनी."

मेरे ससुर एक पतीली में पानी गर्म कर रहे थे. ज्योति ने कहा, "तुम्हें गर्म पानी इस्तेमाल करना चाहिए वर्ना ठंड लग जाएगी."

बसु ने अपने हाथों से अपनी बीमार पुत्र वधु के लिए चाय बनाई. डौली बताती हैं, "उनके इस व्यवहार ने हम दोनों के बीच ऐसा संबंध कायम कर दिया जो ताउम्र बरक़रार रहा."

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धर्मतल्ला के दिन

बहुत कम लोग जानते हैं कि ज्योति बसु ने 21 साल की उम्र में अपना पहला चाय का प्याला पिया क्योंकि उनके पिता ने उन्हें चाय पीने की मनाही कर रखी थी.

एक बार चेन्नई के लोयोला कॉलेज ने एक समारोह में उन्हें आमंत्रित किया. वहा दिए अपने भाषण में ज्योति बसु ने एक मज़ेदार बात बताई कि जब वो धर्मतल्ला में लोरेटो स्कूल में पढ़ते थे तो कक्षा दो में उनकी पूरी क्लास में सभी लड़कियों के बीच में वो अकेले लड़के थे. उनका ये कहना था कि कुछ लोग तालियां बजाने लगे.

एक दो लोगों ने सीटियाँ भी बजाईं. बहुत हिम्मत जुटा कर एक लड़का खड़ा हुआ और उसने सवाल किया, "सर, इतनी सारी लड़कियों के साथ आपने किया क्या." ज्योति बाबू ने अपनी दुर्लभ मुस्कान बिखेरी और बोले, "उस उम्र में आप कर भी क्या सकते हैं!"

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मेरी शिक्षा पूर्ण नहीं है

ज्योति बसु के सचिव सुरक्षा एम के सिंह एक दिलचस्प बात बताते हैं कि ज्योति बसु जब कभी हिंदी बोलते थे तो अक्सर कई उर्दू लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते थे. उर्दू का शब्द नुमाइंदा उनका प्रिय शब्द होता था.

शायद उनकी हिंदी लेफ़्ट फ़्रंट के सभी मंत्रियों की सम्मिलित हिंदी से बेहतर थी. ज्योति बसु के भाषणों की ख़ास बात होती थी उनके अधूरे वाक्य. चाहे वो पांच लोगों को संबोधित कर रहे हों या विधानसभा में महत्वपूर्ण भाषण देने वाले हों वो महत्वपूर्ण बिंदु एक काग़ज़ पर नोट कर लिया करते थे ताकि वो कुछ भूल न जाएं.दिलचस्प बात यह थी कि वे सारे बिंदु अंग्रेज़ी में नोट करते थे.

उनके मंत्रिमडल के सहयोगी अशोक मित्रा अपनी आत्मकथा 'ए प्रैटलर्स टेल' में लिखते हैं कि एक बार जब मैंने उनकी इस आदत पर आश्चर्य प्रकट किया तो उन्होंने मुझसे कहा, "क्या करूँ? मैं सिर्फ़ अंग्रेज़ी में ही लिख सकता हूँ क्योंकि मेरी शिक्षा तुम्हारी तरह संपूर्ण नहीं है."

BBC Hindi
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English summary
Jyoti Basu who lives on pulse rice betel leaf
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