J&K Election: ST के लिए आरक्षित सीटों को लेकर दूर हुआ कंफ्यूजन! गुज्जर-बकरवालों की उम्मीदों पर फिरा पानी?
Jammu Kashmir Election News: केंद्र सरकार ने इसी साल की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर के कुछ समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिया है। लेकिन, जब चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो गई तो भी इस बात को लेकर कंफ्यूजन था कि क्या एसटी के तौर पर शामिल किए गए नए समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा।
आधिकारिक तौर पर चुनाव आयोग की ओर से इसका स्पष्टीकरण तो सामने नहीं आया है। लेकिन, मंगलवार को भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की जो लिस्ट जारी की, उससे इस असमंजस पर से पर्दा हट गया है।

भाजपा की लिस्ट से दूर हुआ कंफ्यूजन!
बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में से तीन पहाड़ी समुदाय के लोगों को टिकट दिया है, जिन्हें इसी साल अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल किया गया है।
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वैसे इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अफसर ने नाम नहीं जाहिर होने देने की शर्त पर कहा है कि नामांकन पत्रों की जांच के दौरान जो भी उम्मीदवार अनुसूचित जनजाति होने का वैध प्रमाण पत्र जमा करेंगे, वह एसटी के लिए आरक्षित सीट से चुनाव लड़ सकेंगे।
गुज्जर-बकरवाल समुदाय के लोगों की उम्मीदों पर फिरा पानी!
हाल ही में ऑल जम्मू एंड कश्मीर गुज्जर-बकरवाल कोऑर्डिनेशन कमेटी ने चुनाव आयोग से संपर्क करके यह स्पष्ट करने को कहा था कि केंद्र शासित प्रदेश में एसटी के लिए आरक्षित 9 सीटें सिर्फ गुज्जर-बकरवाल समुदायों के लिए हैं।
कमेटी का तर्क था कि 2022 में परिसीमन आयोग ने 9 सीटों की पहचान 2011 की जनगणना के आधार पर की थी और जिन समूहों को 2024 की एसटी लिस्ट में जगह मिली है, उनको ध्यान में नहीं रखा था।
जब एसटी का दर्ज मिल गया फिर सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने में दिक्कत कैसी?
कमेटी ने मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार से असमंजस खत्म करने का अनुरोध करते हुए कहा था, 'आरक्षण प्रक्रिया की अखंडता को बनाए रखने और यह सुनिश्चित करने के लिए यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के सबसे पिछड़े समुदायों को मूल परिसीमन के द्वारा अपेक्षित सुरक्षा और प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके।'
जम्मू में एक प्रेस कांफ्रेंस में गुज्जर-बकरवाल कमेटी के संयोजक अनवर चौधरी ने कहा, 'गुज्जर-बकरवालों को इन 9 सीटों पर लड़ने का अधिकार है, न कि सामान्य श्रेणी में से किसी को या 2024 में शामिल की गई किसी श्रेणी को।'
लेकिन, चुनाव आयोग के अधिकारी का कहना है कि क्योंकि जम्मू और कश्मीर की अनूसूचित जनजाति की लिस्ट इस साल की शुरुआत में संशोधित की गई थी, आरक्षित सीट अनुसूचि में शामिल किसी भी एसटी समुदाय के लिए खुली है।
पहली बार जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें हुईं हैं रिजर्व
जम्मू और कश्मीर में सरकारी नौकरियों और सरकारी शिक्षण संस्थानों में गुज्जर-बकरवालों को 1990 के दशक से आरक्षण मिला हुआ है। लेकिन, जम्मू और कश्मीर विधानसभा का यह पहला चुनाव है, जब अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें भी रिजर्व की गई हैं।
2019 में आर्टिकल 370 खत्म होने के बाद 2022 में विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया गया, जिनमें से 9 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित की गई हैं। इन 9 सीटों में से 6 जम्मू डिविजन और 3 कश्मीर डिविजन में हैं।
इन समुदायों को अनुसूचित जनजाति का मिला दर्जा
इस साल फरवरी में संसद ने जम्मू और कश्मीर की अनुसूचित जनजातियों की लिस्ट में संशोधन किया था और इसमें पहाड़ी, पदारी जनजातियां, कोली और गड्डा ब्राह्मणों को शामिल किया गया था। इन समुदायों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में भी 10% आरक्षण दिया गया है, जो मौजूदा एसटी समुदायों को प्राप्त 10% कोटे के अतिरिक्त है।
गुज्जर-बकरवालों की ओर से नई व्यवस्था का इसलिए विरोध हो रहा है, क्योंकि उन्हें डर है कि उन्होंने राजनीति में आने का जो सपना देखा था, अब उसमें नई अनुसूचित जनजातियों की भी भागीदारी हो जाएगी।
बीजेपी ने इन तीन सीटों से पहाड़ी समुदाय के उम्मीदवारों को दिया टिकट
बीजेपी ने अबतक जिन तीन पहाड़ी नेताओं को एसटी-रिजर्व सीट से टिकट दिया है, उनमें मेंढर से मुर्तजा खान, सूरनकोट से सैयद मुस्ताक अहमद बुखारी और थानामंडी से मोहम्मद इकबाल मलिक का नाम शामिल है।
बीजेपी ने तीन गुज्जर उम्मीदवारों को भी दिया मौका
वहीं पार्टी ने अनुसूचित जनजाति के लिए ही आरक्षित कोकरनाग सीट से रोसन हुसैन खान गुज्जर को उतारा है। इसी तरह से भाजपा ने बुद्धल (एसटी) से प्रमुख गुज्जर नेता चौधरी जुल्फीकार अली और पुंछ-हवेली सीट से एक और गुज्जर नेता चौधरी अब्दुल गनी को मौका दिया है।
अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित ये सभी सीटें पुंछ और राजौरी जिलों में हैं, जो कि सीमावर्ती क्षेत्र हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जफर चौधरी के मुताबिक जम्मू-कश्मीर के चुनावी इतिहास को देखने से पता चलता है कि गुज्जर-बकरवाल और पहाड़ी समुदायों ने कभी भी एक दल के लिए वोट नहीं किया।
बदली हुई सियासी परिस्थितियों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सीटें आरक्षित होने के बाद यहां की राजनीतिक धारा में क्या बदलाव होता है।












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