J&K Election: जम्मू में अधिकतर सीटें जीतकर कश्मीर में सरकार बनाने की बीजेपी की क्या है रणनीति? ग्राउंड रिपोर्ट
Jammu Kashmir Chunav: जम्मू और कश्मीर में 10 वर्षों बाद विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इस साल हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने कश्मीर डिविजन की तीनों सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारे थे, लेकिन परोक्ष तौर पर कुछ दलों या निर्दलीयों का समर्थन करती नजर आई थी। लेकिन, विधानसभा चुनाव में भाजपा घाटी में भी उम्मीदवार उतार रही है, लेकिन यहां चुनाव जीतने की इसकी रणनीति क्या होगी यह चर्चा का विषय बना हुआ है।
परिसीमन के बाद जम्मू-कश्मीर में 90 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं, जिनमें से कश्मीर में 47 और जम्मू में 43 सीटें हैं। पहली बार यहां अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए 9 सीटें रिजर्व की गई हैं और जम्मू के सांबा, राजौरी और कठुआ और कश्मीर में कुपवाड़ा जिलों में अतिरिक्त सीटें जुड़ी हैं।

जम्मू में बड़ी ताकत बनी भाजपा, कश्मीर में आज भी हाथ तंग
जम्मू-कश्मीर में 2014 के लोकसभा चुनावों से लेकर 2024 के लोकसभा चुनावों तक कुल 4 चुनाव हुए हैं और इन चारों चुनावों में जम्मू डिविजन में भाजपा का पलड़ा हमेशा भारी रहा है और आज की तारीख में पार्टी इस क्षेत्र में और भी बड़ी ताकत बनकर उभरी है। लेकिन, कश्मीर में अभी भी पार्टी का हाथ तंग है।
कश्मीर के लिए भाजपा ने बनाई खास रणनीति
भाजपा की ओर से साफ किया गया है कि जम्मू में वह किसी भी दल के साथ कोई भी चुनाव-पूर्व गठबंधन या तालमेल नहीं करेगी। लेकिन, कश्मीर के लिए बार-बार कुछ निर्दलीयों को समर्थन देने की बातें सामने आ रही हैं। वनइंडिया ने अपने स्तर पर जो पड़ताल की है, उसमें इसके पीछे भाजपा की एक बहुत ही सधी हुई रणनीति मालूम पड़ती है।
वनइंडिया के ग्राउंड रिपोर्टर इजहार नाजिर अली के मुताबिक भाजपा इस बार सज्जाद गनी लोन की जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कांफ्रेंस को कश्मीर घाटी की 3-4 सीटों पर अघोषित समर्थन दे सकती है।
लोकसभा चुनावों में लोन खुद बारामुला से प्रत्याशी थे और बीजेपी के कुछ नेताओं ने उन्हें 'हमारा आदमी' बताया था। लोन तो जीत नहीं पाए, लेकिन, नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला का अब्दुल राशिद शेख उर्फ राशिद इंजीनियर से हार का अंतर जरूर बढ़ गया।
कश्मीर में एक या दो सीटों पर जीत की उम्मीद कर सकती है भाजपा
वनइंडिया संवाददाता के मुताबिक कश्मीर में बीजेपी अपने दम पर बहुत कमजोर है और बमुश्किल एक या दो सीटें जीतने की उम्मीद कर सकती है। लेकिन, इसका असल मकसद घाटी में नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी को हराना है और इसके लिए वह किसी छोटी पार्टी या निर्दलीय को परोक्ष समर्थन दे सकती है।
कश्मीर में लोकसभा चुनावों वाली अपना सकती है रणनीति
स्थानीय पत्रकार नरेश शर्मा का भी मानना है कि कुछ सीटों पर भारतीय जनता पार्टी निर्दलीयों को सपोर्ट करेगी। जैसे लोकसभा चुनाव में अनंतनाग-राजौरी में अल्ताफ बुखारी की जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी का समर्थन किया था। यहां नेशनल कांफ्रेंस जीती थी और पीडीपी सुप्रीमो महबूबा मुफ्ती हार गई थीं।
चुनाव के बाद वाली संभावनाओं पर टिकी है बीजेपी की कश्मीर वाली रणनीति!
घाटी में नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की भी असल राजनीतिक दुश्मनी बीजेपी से ही है। ये दोनों दल भी घाटी में भाजपा का ही डर दिखाकर वोट लेने की कोशिश करेंगे। जबकि, भाजपा उन निर्दलीय या छोटे दलों का परोक्ष समर्थन कर सकती है, जो चुनाव के बाद वाली परिस्थितियों में उसके काम आ सकें।
कुल मिलाकर भाजपा की रणनीति ये है कि अगर जम्मू की 43 सीटों में से 35 के आसपास भी सीटें आ गईं और कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन, पीडीपी और अन्यों के बीच खंडित जनादेश आ गया तो पार्टी आर्टिकल 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए हो रहे पहले चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है और छोटे-छोटे दलों और निर्दलीयों के सहयोग से सरकार बना सकती है।












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