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'मेरे लिए बोलने से बेहतर है मार खा लेना, हकला हूं ना'

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    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,
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    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,

    ''मुझे जवाब आते हैं लेकिन मैं हाथ नहीं उठाता. सब हंसते हैं मेरे बोलने पर. इसी वजह से रोज़ किसी न किसी पीरियड में मार खाता हूं या फिर क्लास के बाहर खड़ा हो जाता हूं.''

    ''सब हंसें, उससे तो अच्छा है कि मार ही खा लूं. वो मुझे हकला कहते हैं.''

    ग्यारह साल के उस बच्चे की बेचारगी, दूसरों के लिए 'मज़ा' है.

    बोलने की इस तक़लीफ़ का नतीजा ये हुआ कि इस बच्चे ने ख़ुद को अकेला कर लिया.

    उसे स्कूल जाना पसंद नहीं. न वो अपनी तक़लीफ़ किसी से बांटता है, न खुशी.

    अकेले में रोता है. दिन भर उसके होंठ फड़फड़ाते रहते हैं. अपनी बात एक बार में पूरी करने की कोशिशें करता है. नहीं कर पाता तो ख़ुद से ही बातें करता है, क्योंकि तब उसका मज़ाक नहीं उड़ता.

    शीशे के आगे खड़े होकर वो अपना मुंह पूरा खोलकर जीभ खींचता है. मुंह में उंगली डालकर युव्युला (मुंह के पीछे घंटीनुमा संरचना) खींचने की कोशिश करता है. मानो कुछ फंसा हो, जिसे एक दिन वो अपनी सारी पीड़ाओं के साथ निकाल फेंकेगा.

    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,
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    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,

    किसी को कैसे समझाए कि ये उसकी ग़लती नहीं है, एक तक़लीफ़ है.

    कुछ ऐसी ही कहानी रानी मुखर्जी की भी है.

    पिछले दिनों रानी मुखर्जी ने अपनी आने वाली फ़िल्म 'हिचकी' के प्रमोशन के दौरान बताया कि बचपन में वो भी हकलाती थीं.

    उनकी मां को भी हकलाने की तक़लीफ़ थी और बड़े भाई को भी.

    'तुम सबसे बाद में बोलना'

    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,
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    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,

    रानी कहती हैं ''जब मैं छोटी थी तो हकलाती थी लेकिन मुझे इस तक़लीफ़ को हर हाल में दूर करना था. बतौर अभिनेत्री मुझे संवाद बोलने होते हैं, अपनी भावनाएं ज़ाहिर करनी होती हैं और जब आप भावुक होते हैं तो हकलाहट बहुत आसानी से पकड़ में आ जाती है.''

    32 साल के शिव (बदला हुआ नाम) भी हकलाते हैं.

    शिव बताते हैं ''हकलाना रोज़ी-रोटी पर हावी होने लगा था. मीडिया फ़ील्ड में हूं. मीटिंग में आइडिया होते हुए भी नहीं बोलता था.''

    ''एक बार कोशिश की थी लेकिन साथ वालों ने बोला, तुम सबसे बाद में बोलना.''

    शिव कहते हैं कोई मुंह पर तो नहीं बोलता लेकिन जब लोग आपकी बात पर आसमान ताकते हैं या अटकने पर मुस्कुरा देते हैं, तो बुरा लगता है.

    द इंडियन स्टैमरिंग एसोसिएशन के आंकड़ों की मानें तो भारत में करीब 1.1 से 1.2 करोड़ लोग इस तक़लीफ़ से जूझ रहे हैं.

    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,
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    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,

    क्यों होती है ये दिक्क़त?

    स्पीच थैरेपी सेंटर में काम करने वाले डॉ. एपी सिंह का कहना है कि सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है कि ये कोई आनुवांशिक बीमारी नहीं है. ज़्यादातर मामलों में ये माहौल के प्रभाव से होने वाली दिक्क़त है.

    अधिकतर मामलों में ऐसा होता है कि बच्चे के आस-पास में कोई न कोई शख़्स ऐसा होता है जिसे हक़लाने की दिक्क़त होती है. जब वो बच्चा उस शख़्स को सुनता है तो वो उसे कॉपी करना शुरू कर देता है.

    ये सिर्फ़ बोलने की दिक्क़त है जिसे दूर किया जा सकता है.

    'नकल'

    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,
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    हकलाना, रानी मुखर्जी, हिचकी,

    सामान्य तौर पर तीन साल की उम्र से लेकर सात साल की उम्र तक बच्चे नकल करते हैं और इसी दौरान वो ये आदत विकसित कर लेते हैं.

    डॉक्टर सिंह का कहना है कि शुरू में तो बच्चा इसे समझता ही नहीं है. न ही घर वाले इस पर ध्यान देते हैं लेकिन जब वो स्कूल जाने लगता है, घर के बाहर अकेले खेलने जाना शुरू करता है तो उसे अपनी इस आदत के बारे में पता चलना शुरू होता है.

    इसके बाद वो असहज होने लगता है. उसे खुद पर एक दबाव महसूस होता है लेकिन इस दबाव का असर सकारात्मक नहीं, नकारात्मक होता है.

    ऐसी स्थिति में कई बार या तो बच्चा बोलना कम कर देता है या फिर लोगों से मिलने-जुलने में कतराने लगता है. बच्चे का ये डर ही इस परेशानी को और बढ़ाने का काम करता है.

    डॉक्टर सिंह कहते हैं कि 'स्टैमरिंग' की परेशानी ज़्यादातर उन लोगों को होती है जो बहुत भावुक होते हैं. इसके अलावा जो लोग औसत से अधिक बुद्धिमान होते हैं उनमें भी ये तक़लीफ़ देखने को मिलती है क्योंकि वे एक ही बार में बहुत सी चीज़ें सोचते हैं.

    मुख्य तौर पर इसकी चार वजहें सकती हैं

    -किसी ऐसे शख़्स की नकल करना जो हकलाता हो

    -बचपन में अगर सिर में चोट लग गई हो तो

    -अगर बचपन में कोई गंभीर बीमारी हो गई हो तो

    -स्पीच ऑर्गन्स का सही से काम नहीं करना

    डॉक्टर सिंह कहते हैं स्पीच ऑर्गन्स पर अगर पूरा कंट्रोल न हो और अगर सांस लेना सामान्य न हो तो भी हकलाने की दिक्क़त हो सकती है.

    क्या है उपाय?

    स्पीच थैरेपी इसमें सबसे कारगर उपाय है. इसमें बच्चे को लयबद्ध तरीक़े से बात करने की सलाह दी जाती है. पूरा मुंह खोलकर जीभ की एक्सरसाइज़ करने की सलाह दी जाती है.

    पढ़ना, सुनना या बात करना इसमें सबसे अधिक फ़ायदेमंद है.

    इसके अलावा कुछ एक्सरसाइज़ भी हैं जो थैरेपी के दौरान करने की सलाह दी जाती है.

    इलाज के नाम पर अस्पताल 'लूटे' तो क्या करें?

    थैरेपी कितने वक़्त में असर करेगी ये पीड़ित की उम्र और हकलाने के व्यवहार पर निर्भर करता है. सामान्य तौर पर थैरेपी का असर चार हफ़्ते के भीतर नज़र आने लगता है.

    लेकिन सबसे ज़रूरी है कि अगर कोई शख़्स थैरेपी ले रहा है तो उसे उत्साहित करते रहना चाहिए. बार-बार टोकना उसकी परेशानी को और बढ़ा सकता है.

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    English summary
    It is better to speak for me than to kill do not you

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