Chunavi Kisse: जब इंदिरा गांधी को मंदिर में लेनी पड़ी शरण, फिर कैसे चौधरी चरण सिंह को चुकानी पड़ी कीमत
आपातकाल के बाद 1977 के आम चुनाव हुए थे। ये वो चुनाव था जिसमें इंदिरा गांधी की कांग्रेस को सबसे करारी हार मिली थी। उत्तर भारत के कई इलाकों में तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ ही हो गया था। इंदिरा खुद रायबरेली से चुनाव हार गईं और कांग्रेस 153 सीटों पर सिमट गई।
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र तक जनता पार्टी की सरकार बनी। उस दौर में हुए चुनावों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली।

23 जून 1977 को राम नरेश यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। राम नरेश यादव आजमगढ़ सीट पर सांसद चुने गए थे। सीएम बनने के बाद उन्हें ये सीट छोड़ने पड़ी। इसके बाद 1978 में आजमगढ़ लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ।
उत्तर प्रदेश में एक भी सीट न जीत पाने से निराश इंदिरा गांधी ने आजमगढ़ सीट पर हो रहे उपचुनाव में अपना उम्मीदवार ना खड़ा करने का मन बना लिया था और पार्टी के पुनर्निर्माण पर जोर दिया। लेकिन कुछ ही दिन बाद उन्होंने अपना फैसला बदल दिया और यह सीट हर हाल में जीतने की ठान ली। उन्होंने आजमगढ़ सीट पर अपना प्रत्याशी ही नहीं खड़ा किया बल्कि खुद चुनाव मैदान में इस सीट को जीतने के लिए उतर पड़ी।
आजमगढ़ में उत्तर प्रदेश कांग्रेस की मोहसिना किदवई को प्रत्याशी बनाया गया। इंदिरा गांधी ने मोहसिना को जिताने के लिए खुद कमान संभाली। आजमगढ़ सीट एक तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री राम नरेश यादव का गृह क्षेत्र था तो वहीं दूसरी तरफ यहां पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई थी।
कांग्रेस की प्रत्याशी मोहसिना किदवई के खिलाफ जनता पार्टी ने राम बचन यादव को अपना उम्मीदवार बनाया था। चौधरी चरण सिंह उन दिनों देश के गृह मंत्री थे। इंदिरा गांधी का चौधरी चरण सिंह एक दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंदी थे। उन्होंने मंत्रालय की ताकत का भरपूर इस्तेमाल किया।
इंदिरा गांधी के लिए प्रशासनिक मशीनरी के लिए यह आदेश था कि उन्हें किसी भी राजनीतिक सभा की परमिशन न दी जाए। यहां तक कि किसी भी होटल और गेस्ट हाउस में रुकने की इजाजत भी ना मिले। अपने गृह मंत्री के इस आदेश के बाद पूरी प्रशासनिक मशीनरी उन्हें खुश करने के लिए जी जान से जुट गई और इंदिरा गांधी को किसी गेस्ट हाउस तक में रुकने की जगह तक नहीं मिली।
इंदिरा हार कहां मानने वाली थीं। उन्होंने मंदिर को अपना ठिकाना बना लिया। वहीं रहती और दिन पर क्षेत्र में प्रचार-प्रसार करतीं। जनता को इंदिरा का संघर्ष दिखा। वहीं उनका भावनात्मक भाषण अलग काम कर गया। एक साल पहले ही बुरी तरह हारने वाली कांग्रेस उपचुनाव जीत चुकी थी। इस चुनाव को आज भी देश के सबसे अहम उपचुनावों में से एक माना जाता है।












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