चीनी सैनिकों की चालबाजी पर नजर, भारतीय सेना ने लद्दाख में शुरू किया सर्दियों का सामान और राशन जुटाना
नई दिल्ली: लद्दाख में भारत-चीन के बीच चल रहे सीमा विवाद को तीन महीने का वक्त होने जा रहा है। कोर कमांडर लेवल की बैठक के बाद दोनों देशों ने पीछे हटने पर सहमति जताई थी। इसके बावजूद अब खबर आ रही है कि चीन पीछे हटने के मूड में नहीं है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सेना ने भी अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। साथ ही लद्दाख में अपनी लॉजिस्टिक क्षमता को बढ़ाने में जुटी है। इसके लिए राशन, सर्दियों के कपड़े, तेल और अन्य जरूरी चीजों के इंतजाम किए जा रहे हैं।

इस बार दोगुने राशन की जरूरत
सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक लद्दाख में सामान्यता एक साल में 30,000 मिट्रिक टन राशन लगता है, लेकिन इस बार वहां पर अतिरिक्त जवानों की तैनाती की गई है। जिस वजह से राशन की खपत दोगुनी के करीब हो गई है। चीनी सेना अभी पीछे जाती नहीं दिख रही, इसलिए सेना की ओर से अपने लॉजिस्टिक्स को मजबूत किया जा रहा है। उनके मुताबिक चीन दोबारा से सीमा पर नई चाल न चले, इसके लिए फार्वर्ड एरिया में सर्दियों में भी जवानों की तैनाती करनी पड़ती है।

अतिरिक्त जवानों की तैनाती
भारतीय सेना अब तीन अतिरिक्त डिविजन को वापस तैनात करने के लिए तैयार है। एक डिविजन में 10 हजार से 25,000 तक जवान होते हैं। ऐसे में करीब 40,000 जवान इस समय एलएसी पर तैनात हैं। एलएसी के कुछ इलाकों पर अभी तक चीनी जवान मौजूद हैं। 14 जुलाई को भारत और चीन के बीच चौथी कमांडर स्तर की वार्ता हुई थी और चार में से सिर्फ दो ही प्वाइंट्स पर डिसइंगेजमेंट पूरा हो सका है। अभी यह तय नहीं है कि चीन के साथ अब कोई वार्ता होगी या नहीं। दोनों तरफ से सेनाएं गलवान घाटी के पेट्रोलिंग प्वाइंट (पीपी) 14 और पीपी 15 से पीछे हटी हैं।

सर्दियों में भी खुला रहेगा जोजिला पास?
आपको बता दें कि लेह जाने के दो रास्ते हैं। जिसमें एक श्रीनगर से जोजिला पास होते हुए और दूसरा मनाली के रोहतांग दर्रे से है। नवबंर-दिसंबर में भारी बर्फबारी की वजह से ये दोनों रास्ते छह महीने के लिए बंद हो जाते हैं। ऐसे में सर्दियों में सिर्फ हवाई मार्ग से ही जरूरी सामानों की आपूर्ति हो पाती है, लेकिन मौसम वहां पर काफी खराब रहता है, जिस वजह से कई बार विमान भी लैंड नहीं कर पाते हैं। ऐसे में सड़क मार्ग से सर्दियों का जरूरी सामान भिजवाया जा रहा है। वहीं बीआरओ की मदद से पूरी सर्दी जोजिला पास को खोले रखने की योजना है।

क्या है चुनौती?
सेना के पास पहले अडवांस विंटर स्टॉकिंग (AWS) के लिए पहले जून से सितंबर तक यानि 150 दिन का वक्त होता था। इस बार कोरोना का कहर भी जारी है, तो वहीं जवानों की संख्या भी बढ़ गई है। ऐसे में कम वक्त में ज्यादा राशन पहुंचाने की चुनौती है। सेना ने इसके लिए भी वैकल्पिक व्यवस्था करनी शुरू कर दी है। राशन के अलावा गोला बारूद और हथियारों की सप्लाई को भी ध्यान सेना का रखना पड़ता है।












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