गुरूत्वाकर्षी लहरों के अध्ययन के लिये भारत में बनेगा लैब, पढ़ें महत्वपूर्ण बातें
नई दिल्ली। गुरूत्वाकर्षी लहरों पर एल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत की घोषणा ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को रिसर्च की नई दिशा प्रदान की। जाहिर है भारत भी पीछे नहीं रहेगा। जी हां बहुत जल्द भारत में "लेज़र इंटरुरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑबजर्वेटरी (लीगो)" की स्थापना की जायेगी। यह घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मन की बात में की।
गुरूत्वकर्षी लहरों पर यह अध्ययन है नासा का
प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार ने इस नये संस्थान की स्थापना की दिशा में काम शुरू कर दिया है। इसमें भारतीय वैज्ञानिकों की रिसर्च टीम नई दिशा में काम करेगी।
क्या हैं गुरूत्वाकर्षी लहरें, क्यों हैं महत्वपूर्ण
एल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत की अंतिम भविष्यवाणी गुरूत्वाकर्षी लहरें हैं। गुरूत्वाकर्षी लहरों की पहली बार पहचान करने की घोषणा 11 फरवरी को एडवान्स्ड लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्जरवेट्री (एलआईजीओ) ने की थी।
एलआईजीओ के दो विशाल डिटेक्टर हैं। पहला डिटेक्टर लिविंगस्टोन, लुइसियाना में है और दूसरा हैनफोर्ड, वाशिंगटन में है। इस नई खोज ने भौतिकी में तीन मील के पत्थर स्थापित किए-
- गुरूत्वाकर्षी लहरों की सीधी पहचान
- बाइनेरी ब्लैकहोल प्रणाली की पहली पहचान
- आइंस्टीन के सिद्धांत द्वारा प्रतिपादित की ब्लैकहोल पदार्थ हैं, उनके बारे में प्रत्यक्ष प्रमाण
न्यूटन के भौतिक सिद्धांतों के अनुसार गुरूत्वाकर्षण एक ऐसा बल है, जो दो पदार्थों को एक-दूसरे की तरफ खींचता है। आइंस्टीन ने 1915 में सापेक्षता सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए गुरूत्वाकर्षण के बारे में एक नई अवधारणा पेश की थी।
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एलआईजीओ ने दो ब्लैकहोलों से गुरूत्वाकर्षी लहरों के संकेतों का पता लगाया था। यह लहरें प्रकाश गति से संबंधित हैं, जबकि गुरूत्वाकर्षण की न्यूटन अवधारणा अनन्त गति का प्रतिपादन करती है।
गुरूत्वाकर्षी लहरों में रिसर्च में भारत का योगदान
गुरूत्वाकर्षी लहरों के संबंध में भारत का भी बहुत योगदान है। पिछले दो दशकों के दौरान भारतीय वैज्ञानिक समुदाय गुरूत्वाकर्षी लहरों पर काम कर रहा था।
हाल हीमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरूत्वाकर्षी लहरों का पता लगाने वाले दल में शामिल भारतीय वैज्ञानिकों की प्रशंसा की है। उन्होंने इस संबंध में ट्वीट करते हुए कहा, 'गुरूत्वाकर्षी लहरों का पता लगाने वाला ऐतिहासिक कार्य ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बढ़ाएगा। मुझे आशा है कि इस दिशा में हम बड़ा योगदान करेंगे।'
इस खोज से गुरूत्वाकर्षी लहर खगोलशास्त्र के एक नए युग की शुरूआत हुई है और इससे हमें ब्रह्मांड के उत्पन्न होने संबंधी बुनियादी सवालों का हल मिल सकता है।












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