क्या सच में अरविंद केजरीवाल अराजकतावादी हैं?

बैंगलोर। आज से लगभग 60 साल पहले, दलितों के नेता और भारत के सबसे महान विचारकों में से एक बीआर अम्‍बेडकर ने अराजकता के व्‍याकरण की निरर्थकता के बारे में खुलकर बात की थी।

उन्‍होंने कहा था कि ''भारत को आंदोलन करने के बेकार और बेतुके तरीकों को छोड़ देना चाहिये और सामाजिक व आर्थिक लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने के लिए सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्‍याग्रह का मार्ग अपनाना चाहिये। अगर आपके लिए संवैधानिक तरीके खुले हैं तो असंवैधानिक तरीकों को अपनाने का कोई औचित्‍य नहीं है।

अपनी बात मनवाने के लिए ऐसे तरीकों को अपनाना सही नहीं है और अराजकतावाद फैलाना गलत है, सभी के हित के लिए इसे छोड़ देना ही बेहतर है।''

दिल्‍ली के पूर्व मुख्‍यमंत्री केजरीवाल, जिन्‍होने हाल ही में अपना इस्‍तीफा दिया है, वह शायद इस विचारधारा से कोसों दूर है और काफी असंतुष्‍ट भी है तभी उन्‍होने जनलोकपाल मुद्दे पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया दी।

''अराजकतावादी''

दिल्‍ली में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में भ्रष्‍टाचार विरोधी आम आदमी पार्टी ने तुफानी शुरूआत की और सबसे कम समय में दिल्‍ली की सत्‍ता पर कब्‍जा कर लिया। आम आदमी पार्टी के मुख्‍य नेता अरविंद केजरीवाल ने 49 दिनों की सरकार में दिल्‍ली में काफी परिवर्तन करने की मांग की।

उन्‍होंने संघीय सरकार के नियंत्रण में आने वाली दिल्‍ली पुलिस पर और अधिक सख्‍ती की मांग की। अन्‍य बड़े शहरों में पुलिस व्‍यवस्‍था, राज्‍य के नियंत्रण में आती है। केजरीवाल के विरोध के कारण मेट्रो स्‍टेशन बंद हो गए और सार्वजनिक परिवहन बाधित हुआ। भयंकर सर्दियों के दौरान, रात को उन्‍होने अपने समर्थकों के साथ बैठकर सड़क पर धरना दिया।

उनके मंत्री, जिनके पास राज्‍य प्रशासन के कई विभाग थे, वह सभी सड़क पर बैठकर अपनी फाइलें साइन कर रहे थे और विरोध का हिस्‍सा बने हुए थे। उनके समर्थकों और पुलिस के बीच काफी तनाव भी हुआ। दिल्‍ली सरकार केजरीवाल के शासन में ऑफिस से नहीं बल्कि सड़कों से चलाई जा रही थी।

एक उदाहरण लीजिए - 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल के मुख्‍यमंत्री अजॉय मुखर्जी ने शांति बनाए रखने की विफलता पर अपनी ही गठबंधन सरकार की के खिलाफ, कलकत्‍तापार्क में 72 घंटों की भूख हड़ताल की थी, उस काल में भारत की जनता ने ऐसा कभी नहीं देखा था कि उनके द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि ही सड़क पर उतर आएं। केजरीवाल ने भी कुछ ऐसा ही किया था।

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केजरीवाल अराजकतावादी हैं

केजरीवाल अराजकतावादी हैं

केजरीवाल ने साफ कर दिया कि वह अराजकतावादी हैं। इस बारे में उनका पत्रकारों से कहना है कि 'कुछ लोग कहते है कि मैं अराजकतावादी हूं और मैं गलत संदेश फैला रहा हूं। हां मैं स्‍वीकार करता हूं कि मैं भारत का सबसे बड़ा अराजकतावादी हूं ।'

दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद उन्‍होंने अपने विरोध को और ज्‍यादा बढ़ा दिया, जिससे उनकी ही आलोचना हुई।

उनके इस रवैये से मीडिया और यहां तक कि उनके समर्थक भी आर्श्‍चयचकित थे कि आखिर सड़क पर इस आंदोलन को लाने की क्‍या आवश्‍यकता है? उनके इस रवैये से प्रशासन में कमी आई है और एक समाचार पत्र के मुताबिक केजरीवाल की यह हरकत सिर्फ एक नुक्‍कड़ नाटक है।

केजरीवाल देश के हित के बारे में सोचते हैं

केजरीवाल देश के हित के बारे में सोचते हैं

केजरीवाल को पसंद करने वाले लोग मानते है कि केजरीवाल साफ-सुथरी नीति अपनाने वाले लोगों में से हैं, वह भ्रष्‍टाचार से परे है और देश के हित के लिए सोचते है और उनकी मांगे उचित है।

योगेंद्र यादव

योगेंद्र यादव

पुलिस के बारे में की जाने वाली मांग पर आप के प्रवक्‍ता योगेंद्र यादव का मानना है दिल्‍ली की कुख्‍यात भ्रष्‍ट पुलिस अपने निर्वाचित नेताओं के प्रति जवाबदेह नहीं है और अपनी संघीय सरकार और विश्‍वासपात्र को सही जानकारी उपलब्‍ध नहीं करवाती है।

उन्‍होंनं इसे स्‍थानीय शासन की संरचना में अनर्थता माना है। उन्‍होंने कहा कि पिछले कई सालों से देश की दो बड़ी पार्टियां, भाजपा और कांग्रेस भी चाहती है कि दिल्‍ली पुलिस, स्‍थानीय सरकार को रिपोर्ट करें, लेकिन कई कारणों से ऐसा संभव नहीं हो सका और न ही कुछ बदला।

सड़क पर विरोध

सड़क पर विरोध

केजरीवाल ऐसा करना चाहते थे तो उनहोने सड़क पर विरोध किया और आखिर क्‍यूं न करें। मिस्‍टर यादव, भारत के बेहतरीन राजनीतिक विशेषज्ञों में से एक है जिन्‍होने पिछले वर्ष आप को ज्‍वाइन किया।

उनका कहना है कि सड़कों पर प्रदर्शन करना हमारे लोकतंत्र का एक हिस्‍सा है, सड़क पर विरोध को जताया जा सकता है। प्रतिक्रिया जरूरी होती है और इसे अराजकता का नाम देना गलत है।

नकारात्‍मक असर

नकारात्‍मक असर

लेकिन आलोचकों का मानना है कि केजरीवाल की इस हरकत से उनकी गुडविल पर नकारात्‍मक असर पड़ा है। आम आदमी पार्टी जब बनी थी, तो उसने देश की बड़ी पार्टियों को टक्‍कर दी, उसने भ्रष्‍टाचार दूर भगाने की बात कही, जनता के बीच राजनीति में एक ताजगी की लहर सी आ गई, यूथ को मौका मिला, आर्दशवाद की बात हुई, लेकिन केजरीवाल की सही नीतियों में गलत तरीके की वजह से बुरा असर पड़ा।

ताजा सर्वे कड़वी बात

ताजा सर्वे कड़वी बात

हाल ही में हुए भारत के 18 राज्‍यों के एक सर्वेक्षण में यह तथ्‍य सामने आया है कि सिर्फ आधे मतदाता ही केजरीवाल की पार्टी के बारे में जानते है जिनमें से 18 प्रतिशत मतदाताओं ने उन्‍हे वोट देने से इंकार कर दिया।

 पद की गरिमा नहीं रखी...

पद की गरिमा नहीं रखी...

लेकिन कईयों का मानना है कि आप पार्टी की कई प्रयास और नीतियां, उनके लाभ देने का तरीका उन्हें आसानी से मई के चुनावों में पहुंचा सकता था, अगर वह सड़क प्रदर्शन वाला काम न करते।

उन्‍हे सही तरीके का इस्‍तेमाल करना चाहिए था और संवैधानिक पद को संभालने की गरिमा बनाएं रखना चाहिये था। इस पूरे घटनाक्रम के बारे में इतिहासकार रामचंद्र गुहा का कहना है कि केजरीवाल को विवेकपूर्ण और संवैधानिक तरीके से विरोध करना चाहिये और अपने पद की प्रतिष्‍ठा का ध्‍यान रखना चाहिये था।

केजरीवाल में दम है...

केजरीवाल में दम है...

केजरीवाल का समर्थन करने वाले लोग इसे अराजकतावाद मानने से इंकार करते है वैसे भारत की जनता अब सरकार में स्थिरता और देश में विकास चाहती है ऐसे में उन्‍हे स्‍ट्रांग विजन वाली पार्टी चाहिये।

इसलिए, सवाल यह उठता है कि क्‍या अरविंद केजरीवाल भारत की राजनीति में उलटफेर कर देगें या फिर आगे से राजनीति में नज़र ही नहीं आएंगे। इस बारे में कोई भी राय देना जल्‍दबाजी होगी।

हमने जो किया सही किया...

हमने जो किया सही किया...

हालांकि, आप के प्रवक्‍ता योगेंद्र यादव कहते है कि हमारे पास अनुभव की कमी है, हम गल्तियां कर सकते है, इससे हमारा विरोध बढ़ेगा, लेकिन दिल्‍ली पुलिस के लिए किया गया प्रदर्शन एक सीमित हस्‍तक्षेप था, हम जनता के लिए जितना कर सकते हैं, उससे ज्‍यादा ही प्रयास करते है। खैर जो भी, आगे आगे देखिए होता है क्‍या...!

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