कौन हैं भारत के 'न्यूक्लियर पॉवर मैन' Raja Ramanna, ठुकरा दिया था सद्दाम हुस्सैन के अरबों डॉलर का ऑफर
Raja Ramanna: पहलगाम हमले के बाद से ही भारत पाकिस्तान के बीच तनाव का माहौल है और दोनों ही देश परमाणु संपन्न देश हैं। पाकिस्तान लगातार भारत को न्यूक्लियर पॉवर के इस्तेमाल की धमकी दे रहा है। दोनों देशों के पास न्यूक्लियर हथियार हैं और ऐसे में वैश्विक शक्तियों को डर है कि कहीं कोई एक चिंगारी विनाश की लपटों में न बदल जाए।
भारत ने यह शक्ति किन परिस्थितियों में हासिल की ये बात किसी से नहीं छुपी है इसके बावजूद भारतीय वैज्ञानिकों ने भारत को एक न्यूक्लियर राष्ट्र के रूप में खड़ा किया।

लेकिन क्या आप जानते हैं भारत को परमाणु संपन्न देश बनाने में जिसका सबसे बड़ा योगदान था उस व्यक्ति को इराक के तानाशाह सद्दाम हुस्सैन ने एक ऑफर दिया था।
आईए मिलते हैं भारत के उस न्यूक्लियर पॉवर मैन से जिन्हें भारत की परमाणु शक्ति का जनक भी कहा जाता है...
भारत को परमाणु संपन्न देश बनाने में एक नाम उभरकर आता है - डॉ. राजा रामन्ना। एक ऐसा वैज्ञानिक जो देशभक्त भी था और एक नैतिक आदर्श का पालक भी था। जब दुनिया के कई देश परमाणु तकनीक को हथियारों की दौड़ का जरिया बना रहे थे, उस समय भारत के इस वैज्ञानिक ने इसे राष्ट्र की आत्मनिर्भरता और सुरक्षा का माध्यम बनाया।
Who is Dr.Raja Ramanna कौन हैं न्यूक्लियर साइंटिस्ट राजा रामन्ना
28 जनवरी 1925 को कर्नाटक के तुमकुर में जन्मे राजा रामन्ना बचपन से ही होनहार थे। राजा रामन्ना डॉ. होमी भाभा से काफी प्रभावित थे और पहली बार वो संगीत के माध्यम से ही उनसे मिले थे।
साल 1944 में डॉ. रामन्ना के म्यूजिक एग्जामिनर अल्फ्रेड ट्रिनिटी के गेस्ट हाउस में मिले थे। दरअसल, रामन्ना का विज्ञान की ओर झुकाव तो था ही लेकिन इसके साथ-साथ उन्हें संगीत में भी गहरी रुचि थी। वह एक बेहतरीन पियानो वादक थे। पर अंत में उनका झुकाव न्यूक्लियर फिजिक्स की ओर हुआ।
उन्होंने इंग्लैंड से PhD करने के बाद भारत लौटकर डॉ. होमी भाभा के साथ टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में काम शुरू किया। यहीं से उनका सफर भारतीय न्यूक्लियर कार्यक्रम की रीढ़ बनने की ओर बढ़ा।
Raja Ramanna: जब सद्दाम हुसैन ने दिया प्रस्ताव, "जितना पैसा मांगो, मिलेगा"
1978 में एक ऐसा दिलचस्प और ऐतिहासिक वाकया घटा जो रामन्ना की देशभक्ति और नैतिक बल की मिसाल बन गया। वह इराक की एक सरकारी यात्रा पर थे। उस समय इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने उनसे व्यक्तिगत मुलाकात की और एक चौंकाने वाला प्रस्ताव रखा। सद्दाम ने कहा, "आप यहीं रुक जाइए, हमारे न्यूक्लियर प्रोग्राम की कमान संभालिए। जितना पैसा चाहिए, दिया जाएगा।"
यह प्रस्ताव किसी भी आम व्यक्ति के लिए बेहद आकर्षक हो सकता था। लेकिन राजा रामन्ना केवल एक वैज्ञानिक नहीं थे, वह एक सच्चे भारतीय थे। उन्होंने उस प्रस्ताव को शालीनता से ठुकरा दिया और अगली ही उड़ान से भारत लौट आए।
India Nuclear Power: 'स्माइलिंग बुद्धा' और पोखरण में परमाणु की गर्जना
18 मई 1974 - यह वह दिन था जब भारत ने दुनिया को चौंका दिया। राजस्थान के पोखरण में किया गया पहला परमाणु परीक्षण 'स्माइलिंग बुद्धा' के नाम से जाना गया। शांतिपूर्ण उद्देश्य से किए गए इस परीक्षण ने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों की पंक्ति में ला खड़ा किया। इस परीक्षण की कमान जिनके हाथ में थी, वह थे राजा रामन्ना। उन्होंने न केवल इस पूरे मिशन का नेतृत्व किया, बल्कि परमाणु बम निर्माण से लेकर उसके परीक्षण तक के हर तकनीकी पहलू को गहराई से संचालित किया।
1958 में आत्मनिर्भर भारत की नींव रखी गई और इसके लिए होमा भाभा को न्यूक्लियर फ्यूल साइकल को विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई। 1966 में डॉ. होमी भाभा के निधन के बाद, रामन्ना को न्यूक्लियर कार्यक्रम का नेतृत्व सौंपा गया।
जब 1967 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं, तो उन्होंने न्यूक्लियर प्रोग्राम को प्राथमिकता दी। राजा रामन्ना ने इंदिरा गांधी को सूचित किया कि भारत न्यूक्लियर बम बनाने और परीक्षण करने के लिए तैयार है। सितंबर 1972 में प्रधानमंत्री ने परीक्षण की मंजूरी दी और फिर वो ऐतिहासिक दिन आया - 18 मई 1974। यह परीक्षण न केवल तकनीकी उपलब्धि थी, बल्कि एक मजबूत राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत भी।
India Nuclear Power: वैश्विक दबाव और भारतीय वैज्ञानिकों के सामने चुनौतियां
पोखरण परीक्षण के बाद भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों की बौछार हुई। लेकिन राजा रामन्ना और उनकी टीम ने इन परिस्थितियों में भी आत्मनिर्भरता का मार्ग चुना। 1981 में उन्होंने BARC (भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर) के निदेशक के रूप में कमान संभाली और स्वदेशी तकनीक से भारत को आगे बढ़ाया।
उनके नेतृत्व में न केवल रक्षा क्षेत्र, बल्कि न्यूक्लियर एनर्जी के शांतिपूर्ण उपयोग, जैसे बिजली उत्पादन, मेडिकल साइंस और कृषि के क्षेत्र में भी प्रगति हुई।
आज जब हम परमाणु हथियारों की धमकियों और राजनीतिक अस्थिरता के बीच खड़े हैं, तब राजा रामन्ना जैसे व्यक्तित्व की प्रासंगिकता और भी अधिक हो जाती है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि विज्ञान केवल हथियार नहीं बनाता, वह सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और नैतिकता का रास्ता भी दिखा सकता है।












Click it and Unblock the Notifications