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भारत-चीन सीमा पर तनाव: गलवान का एक साल, कहां से चले-कहां आ गए

By BBC News हिन्दी
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लद्दाख की पैंगोंग झील के इलाके में अपनी-अपनी पोजिशन से पीछे भारत और चीन की सेना
ANI
लद्दाख की पैंगोंग झील के इलाके में अपनी-अपनी पोजिशन से पीछे भारत और चीन की सेना

साल 2017 की गर्मियों के बाद जब सिक्किम के पास डोकलाम में भारत और चीन की सेनाएं एक-दूसरे का सामना कर रही थीं तो उसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की एक 'अनौपचारिक मुलाकात' हुई थी.

कूटनीति के मोर्चे पर ये वो तरीका होता है जिसका इस्तेमाल देशों के लीडर आपसी सौहार्द को बढ़ावा देने और छोटी-छोटी परेशानियों को दूर करने के लिए इस्तेमाल करते हैं.

दुनिया ने देखा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ऐसे वक्त में हुई जब भारत और चीन के बीच कई मुद्दों पर मतभेद बरकरार थे.

और भी तभी टकवार की शुरुआत हुई. लद्दाख के गलवान में ठीक एक साल पहले दोनों मुल्कों की सेनाएं उस मुकाम पर पहुंच गईं जहां शांतिपूर्ण संबंध खत्म हो जाते हैं.

वहां दोनों देशों ने जिस पैमाने पर सेना इकट्ठा की और फिर जो हिंसा हुई, वो बीते चार दशकों में पहले कभी नहीं देखा गया था.

10 मई, 2020

ये वो दिन था जब पहली बार ये संकेत मिले कि बात बिगड़ने की शुरुआत हो गई है. विवाद उसी मुद्दे को लेकर था. दोनों देशों के बीच की सीमा रेखा जिसे दोनों पक्ष नहीं मानते और ज़मीन पर जिसका कोई वजूद नहीं है.

10 मई को 'द ट्रिब्यून' अख़बार ने रिपोर्ट दी, "परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी देश भारत और चीन के सैनिकों के बीच हाथापाई हुई... पूर्वी लद्दाख के घटनाक्रम का ब्यौरा धीरे-धीरे सामने आ रहा है. ये बहुत बड़ा है और इसका व्यापक रूप से प्रभाव पड़ने वाला है."

इसी दिन अंग्रेज़ी अख़बार 'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट थी, "उत्तरी सिक्किम में शनिवार को भारत और चीन के सैकड़ों सैनिकों के बीच तनावपूर्ण स्थिति में आमने-सामने की झड़प हुई. सीमा पर इस गतिरोध के दौरान दोनों पक्षों में हाथापाई हुई जिसकी वजह से कई सैनिक घायल हो गए."

भारतीय सेना के प्रवक्ता ने पत्रकारों के सवालों का जवाब देने के क्रम में कई बार अपना स्टैंड बदला. वे भारत-चीन झड़प की ख़बर की एक हद तक पुष्टि करते नज़र आए तो कभी पैंगोंग त्सो लेक में हुई झड़प को खारिज करते नज़र आए. यहां तक कि पत्रकारों को 'मीडिया में अफवाह फैलाने और खबरों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने से भी बचने' की सलाह दी गई.

14 मई, 2020

भारत के सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने एक बयान जारी किया.

बयान में कहा गया था, "... दोनों घटनाएं न तो आपस में जुड़ी हुई हैं और न ही उनका संबंध किसी अंतरराष्ट्रीय या स्थानीय गतिविधियों से है. मैं ये बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हमारी उत्तरी सीमा पर बुनियादी ढांचे के विकास का काम जारी है."

21 मई, 2020

हालांकि चीन के विदेश मंत्रालय ने भारतीय गतिविधियों को 'अतिक्रमण और घुसपैठ' करार दिया.

दूसरी तरफ़ दिल्ली में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, "चीनी पक्ष की गतिविधियों ने भारत की ओर से किए जाने वाले सामान्य गश्त के काम में बाधा पहुंचाई है."

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6 जून, 2020

लद्दाख में भारत और चीन के कूटनयिकों और मिलिट्री कमांडरों की बैठक हुई. दोनों देशों के बीच हुई कई बैठकों में से ये पहली बैठक थी.

भारतीय पक्ष की ओर से जो कुछ कहा गया, उससे ये भी जानकारी मिली कि उस वक़्त हालात को कैसे संभाला जा रहा था.

भारतीय पक्ष के बयान में कहा गया, "दोनों ही पक्षों ने इस बात को भी ध्यान में रखा है कि इस साल दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की स्थापना की 70वीं सालगिरह है. दोनों ही पक्षों के बीच इस बात पर सहमति बनी है कि मामले का जल्द समाधान निकालने से संबंधों को आगे ले जाने में मदद मिलेगी."

उस वक्त चीनी पक्ष ने कहा, "संबंधित मुद्दों को बातचीत और सलाह मशविरे के जरिए उचित तरीके से सुलझाने के लिए दोनों ही पक्ष ख्वाहिशमंद और समर्थ हैं."

चीन से लगने वाली सीमा के एक हिस्से की देखभाल करने वाले सेना के उत्तरी कमांड की अगुवाई कर चुके लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुडा (रिटायर्ड) ने कहा, "ये भावना था कि अतीत की तरह इसे भी शांतिपूर्ण तरीके से सुलझा लिया जाएगा. शायद यही वजह रही होगी कि चीज़ों को कमतर करने की शुरुआती कोशिशें शुरू हो पाईं."

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16 जून, 2020

उस दिन अफवाहों का बाज़ार गर्म था. पहले ये ख़बर आई कि सीमा के एक विवादित हिस्से पर कहीं झड़प हुई है. फिर ये सुनने में आया कि अलग-अलग जगहों पर हिंसा हुई है. ऐसा लग रहा था कि जैसे हर किसी के पास एक सोर्स है और एक ख़बर भी थी.

आख़िरकार दिन के एक बजे भारतीय सेना ने बताया, "गलवान घाटी में तनाव कम करने की प्रक्रिया के दौरान कल रात हिंसक झड़प हुई जिसमें दोनों ही पक्षों को नुक़सान उठाना पड़ा है. भारतीय पक्ष की ओर से एक अधिकारी और दो सैनिकों ने जान गंवाई है."

रात दस बजे के थोड़ी देर बाद ही सेना ने अपने बयान में संशोधन किया.

बयान में गलवान घाटी में चीनी पक्ष से कब्जा छुड़ाने की घोषणा के साथ ये कहा गया, "झड़प वाली जगह पर ड्यूटी पर तैनात गंभीर रूप से घायल होने वाले 17 सैनिकों की मौत हो गई. इस संघर्ष में मरने वाले सैनिकों की संख्या बढ़कर 20 हो गई है."

इस के अगले दिन यानी 17 जून को चीन के विदेश मंत्रालय ने इस घटना पर अपने बयान में कहा, "15 जून को भारतीय सैनिकों ने आश्चर्यजनक रूप से अपनी अवैध गतिविधियों को अंजाम देने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा पार किया और चीनी सैनिकों पर हमला कर उन्हें उकसाया. इस वजह से दोनों पक्षों के बीच हिंसक झड़प हुई और सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

चीन के बयान से जो बात साफ़ हुई, वो ये थी कि भारत की तरह वो मरने वाले सैनिकों की संख्या के बारे में जानकारी नहीं देता है.

'सेना के सूत्रों' का हवाला देते हुए भारत की सरकारी समाचार सेवा 'प्रसार भारती न्यूज़ सर्विसेज़' ने ट्वीट किया, "चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के 45 से भी ज़्यादा जवान मारे गए हैं. गलवान में हालात सामान्य करने के लिए मेजर जनरल स्तर की बातचीत चल रही है. भारत का कोई सैनिक लापता नहीं है."

https://twitter.com/pbns_india/status/1273144011507806209

जनरल हुडा ने कहा, "ये साफ़ है कि हम चीनी पक्ष के संकेतों को समझ नहीं पाए. न केवल सेना के स्तर पर बल्कि राजनीतिक नेतृत्व भी इसे भांप नहीं पाया. जैसे ही गलवान की घटना हुई, ये बात समझ में आ गई कि ये सामान्य स्थिति नहीं है. इस बात की भी तारीफ की जानी चाहिए कि सेना ने इसके बाद कितनी जल्दी से कार्रवाई की."

गलवान में हालात कैसे बिगड़े?

सिम टैक भू-राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "सैटेलाइट से ली गई कई तस्वीरों के जरिए हमने देखा कि वहां चीन क्या कर रहा था. चीन ने गलवान घाटी में घुसपैठ शुरू कर दी थी. गलवान घाटी में उसने पैट्रोल प्वॉयंट 14 तक मिलिट्री बेस या अस्थाई ठिकानों का निर्माण कर लिया था."

"एक दिन हमने देखा कि वहां चीनी सैनिक पोजिशन लेकर तैयार थे. इसके बाद वहां से हिंसक झड़प की ख़बरें आईं और फिर हमने देखा कि चीनी सैनिक पैट्रोल प्वॉयंट 14 से पीछे हट गए हैं."

सिम टैक आगे कहते हैं, "हालांकि जैसे ही चीनी सैनिक गलवान घाटी में पिछले हटने लगे, हमने देखा कि अक्साई चिन में उसने नए ठिकानों पर अपना दायरा फैलाना शुरू कर दिया था."

19 जून, 2020

चीन के ख़िलाफ़ भारत की जवाबी कार्रवाई के बारे में सर्वदलीय मीटिंग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया, "किसी ने भी हमारे क्षेत्र में घुसपैठ नहीं की है. कोई भीतर नहीं आया है और न ही हमारी किसी चौकी पर किसी और का कब्ज़ा है."

चीनी पक्ष ने लगभग उसी समय अपने बयान में कहा कि भारतीय सैनिक अप्रैल, 2020 से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर निर्माण कार्य में लगे हुए थे जिसका उन्होंने विरोध किया था.

स्वतंत्र विश्लेषक और चीन के वाणिज्य मंत्रालय के लिए काम कर चुके एक पूर्व नौकरशाह सन शी ने बीबीसी की चीनी सेवा को बताया, "भारतीय सैनिकों के सीमा नहीं पार करने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही तैयार हो गए हों लेकिन इस संघर्ष का ये नतीज़ा निकला कि भारत पश्चिमी देशों के खेमे के और करीब चला गया."

"चीन यकीनन ये नहीं चाहता था. दरअसल, हिंसक संघर्ष के बाद चीन ने मरने वाले अपने सैनिकों की संख्या सार्वजनिक नहीं की क्योंकि शी जिनपिंग की सरकार इसे बड़ी ख़बर नहीं बनने देना चाहते थे."

तीन जुलाई, 2020

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय सैनिकों से मिलने लद्दाख पहुंचे.

उन्होंने उस लड़ाई को मानवता और विस्तारवाद के बीच की लड़ाई करार दिया लेकिन चीन का नाम नहीं लिया.

31 अगस्त, 2020

भारत ने कहा कि उसे चीन की गतिविधियों का अंदाजा था और अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए उसने कदम उठाए. बाद में भारतीय पक्ष ने माना कि गलवान में जो कुछ हुआ वो 'एक सुनियोजित और सोच समझकर किया गया ऑपरेशन था ताकि वहां बढ़त बनाई' जा सके.

इसके अगले दिन चीन की सरकार ने कहा, "भारतीय सैनिकों ने एक बार फिर पैगोंग त्सो झील के दक्षिणी किनारे पर और रेकिन पर्वत के पास अवैध रूप से वास्तविक नियंत्रण रेखा पार की. ये क्षेत्र भारत-चीन सीमा के पश्चिमी सेक्टर में है."

गलवान, लद्दाख
ANI
गलवान, लद्दाख

पांच सितंबर, 2020

इसके बाद सबकी नज़र मॉस्को पर चली गई जहां पांच दिनों के भीतर दोनों ही पक्षों के रक्षा और विदेश मंत्रियों की बैठक हुई.

हालात गंभीर होते हुए दिखने लगे थे. बाद के दिनों में दोनों ही पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया था.

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन में कहा, "वहां नाजुक हालात हैं. हम चीन और भारत की मदद के लिए तैयार हैं."

हालांकि किसी दूसरे देश की सीधी दखलंदाज़ी की नौबत नहीं आई और दोनों ही पक्षों के बीच एक संतुलित बातचीत से उम्मीद बंधी.

22 सितंबर, 2020

दोनों ही देशों की सेनाओं ने पहला साझा बयान जारी किया जिसमें वहां और सैनिक नहीं जुटाने पर सहमति जाहिर की गई.

गलवान, लद्दाख
ANI
गलवान, लद्दाख

15 जनवरी, 2021

सेना दिवस की पूर्व संध्या पर जनरल नरवणे ने कहा, "जो बात साफ तौर पर सामने आई है, वो ये है कि हमें अपनी क्षमताओं के पुनर्गठन और उसे विस्तार करने की ज़रूरत है."

उन्होंने ये भी कहा कि लद्दाख में जो कुछ भी हुआ, उसके अलावा चीन के साथ सेंट्रल सेक्टर और ईस्टर्न सेक्टर में भी ऐसी जगहें हैं जहां संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है.

10 फरवरी, 2021

तकरीबन दस महीनों के बाद लद्दाख की पैंगोंग झील के इलाके से दोनों ही देशों की सेनाओं मे अपने सैनिकों को वहां से पीछे हटाना शुरू किया.

ठीक उसी दिन, रूस की सरकारी न्यूज़ एजेंसी 'तास' ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि साल 2020 के मई और जून महीने में हुई झड़प में चीन के 45 सैनिकों की जान गई थी.

चीन ने तब तक गलवान की घटना में मरने वाले अपने सैनिकों के बारे में सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा था लेकिन इस रिपोर्ट के बाद उसे सफ़ाई देनी पड़ी. चीन ने कहा कि उसके चार सैनिक मारे गए थे.

लद्दाख में तैनात के-9 वज्र होवित्ज़र तोप
ANI
लद्दाख में तैनात के-9 वज्र होवित्ज़र तोप

29 अप्रैल, 2021

चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने बताया कि भारत के साथ उसका व्यापार पिछले साल और मजबूत हुआ है.

गौर करने वाली बात ये थी कि ये रिपोर्ट उस समय आई जब भारत ने कई चीनी ऐप्स पर पाबंदी लगाने का एलान कर दिया और चीनी सामानों के भारत में आयात को मुश्किल बना दिया.

लेकिन इससे हासिल क्या हुआ? अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सुरक्षा और रणनीति विभाग की असिस्टैंट प्रोफ़ेसर स्वास्थी राव कहती हैं, "अगर साल 2019 में अमेरिका हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार था तो साल 2020-21 में तमान अड़चनों के बावजूद चीन हमारा सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी बनकर उभरा है. ये विरोधाभास है."

लेकिन इसके कारण थे. स्वास्थी राव कहती हैं, "इतनी बड़ी दो अर्थव्यवस्थाएं जो एक दूसरे का बाज़ार और पड़ोसी दोनों है, को एक दूसरे से अलग करना नामुमकिन है. वे दिन जब हम चीनी ऐप पर रोक लगा रहे थे क्योंकि हमारे सैनिक हताहत हो रहे थे. अब हम चीन के बहिष्कार की कोई बात नहीं कर रहे हैं."

पैगोंग झी, लद्दाख, भारत चीन संबंध
ANI
पैगोंग झी, लद्दाख, भारत चीन संबंध

14 मई, 2021

कोरोना महामारी की दूसरी लहर में भारत ने अर्जेंट मेडिकल सप्लाई के लिए चीन की ओर कदम बढ़ाया.

चीन की सरकार ने दावा किया कि सिर्फ़ अप्रैल में उसने भारत को 26 हज़ार से ज़्यादा वेंटिलेटर्स और ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर्स, 15 हज़ार से अधिक पेशेंट मॉनीटर्स और तकरीबन 3800 टन दवा सामाग्री का निर्यात किया.

भारत से चीन को 70 हज़ार से ज्यादा ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर्स और वैक्सीन बनाने के काम आने वाले 30 टन कच्चा माल के ऑर्डर्स मिले जिनकी सप्लाई होने जा रही है.

इससे पहले भारत के विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल को चीनी पक्ष के साथ व्यापार की बात स्वीकार की थी.

विदेश मंत्रालय ने कहा था, "भारतीय कंपनियां पहले से ही चीन से ज़रूरी चीज़ों और कच्चे माल की खरीदारी की प्रक्रिया में थी. कोरोना महामारी जैसी गंभीर चुनौतियों से निपटने के लिए गंभीर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत पड़ती है."

तीन जून, 2021

भारतीय विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव अरिंदम बागची ने कहा, "सैनिकों को वापस बुलाने की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है."

क्या मौजूदा स्थिति लंबे समय तक बरकरार रह पाएगी?

जनरल हुडा कहते हैं, "अगर हम ये सोचते हैं कि हम वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लाखों सैनिकों को तैनात कर देंगे तो ये व्यवहारिक बात नहीं होगी. अब गर्मियां आ गई हैं. सैनिक गतिविधियां और पैट्रोलिंग का काम दोनों ही तरफ़ से बढ़ेगा. बुनियादी ढांचे के विकास का काम भी होगा और सीमा पर निर्धारित प्रोटोकॉल की व्यवस्था खत्म हो गई है. दोनों ही पक्षों में संदेह का माहौल है. मुझे आशंका है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हालात पहले से ज्यादा तनावपूर्ण हो सकते हैं. स्थानीय घटनाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता है."

भू-राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ सिम टैक का कहना है, "हम अभी भी उन इलाकों में चीन की बड़ी संख्या में मौजूदगी देख सकते हैं जहां मई, 2020 के पहले वे नहीं थे. चीन वहां क्या करने की योजना बना रहा है? दूसरी तरफ़ भारत में बेहद सीमित रूप से और धीमी रफ्तार से विकास गतिविधियां चल रही हैं."

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस दौरान अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत करने के अलावा भारत की क्वाड देशों के साथ करीबी बढ़ी है जिसमें जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका शामिल है.

क्या ये कहना ठीक होगा कि भारत ने चीन को काउंटर करने के लिए दूसरी ताक़तों के साथ संपर्क बढ़ाने की अपनी कोशिशें तेज़ कर दी हैं?

ताइवान के ताइपेई स्थित नेशनल चेंगची यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ़ डिप्लोमेसी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर पिंग क्वे चेन ने बीबीसी की चीनी सेवा को बताया, "कई विश्लेषक ये कहेंगे कि भारत का पश्चिमी गठबंधनों से रिश्ता बढ़ा है लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता. भारत अपने विकल्प खुले रखने की कोशिश कर रहा है. भारत के पास ज्यादा विकल्प होने का मतलब ये है कि किसी विवाद की सूरत में उसके पास ज्यादा बाहरी गठबंधन हों. इससे चीन के साथ किसी बातचीत में भारत बढ़त की स्थिति में रहेगा. पिछले साल भारत ने इसे बखूबी आजमाया था."

(बीबीसी की चीनी सेवा के हांगकांग स्थित रिपोर्टर मार्टिन चिंग झे से मिल इनपुट के साथ)

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English summary
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