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शहीदों को सलाम: नमक सत्याग्रह से अंग्रेजों को चुनौती, आजादी के लिए कई बार गईं जेल, यूं कहलाईं 'भारत की कोकिला'

Saheedon Ko Salam: सरोजिनी नायडू, जिन्हें 'भारत की कोकिला' भी कहा जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक महानायक थीं। उनके योगदान, साहस, और नेतृत्व के कारण वे इतिहास में हमेशा सम्मान के साथ याद की जाएंगी। उनकी काव्यात्मक दृष्टि और राजनीतिक सक्रियता ने न सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि भारतीय महिलाओं के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बनीं।

1905 के बंगाल विभाजन के विरोध के समय नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ीं और 1916 में महात्मा गांधी से मिलीं। गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के संघर्ष को समर्पित कर दिया।वनइंडिया आपको अपनी 'शहीदों को सलाम' सीरीज के जरिए 'सरोजिनी नायडू' के योगदान से रूबरू करा रहा है...

Freedom Fighter Sarojini Naidu

कैसा था बचपन?

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था। उनका पूरा नाम सरोजिनी चट्टोपाध्याय था। उनके पिता, अघोरनाथ चट्टोपाध्याय, एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् थे, जबकि उनकी माता, बरदा सुंदरी देवी, एक कवयित्री थीं। एक समृद्ध बौद्धिक और सांस्कृतिक वातावरण में पली-बढ़ी सरोजिनी ने बचपन से ही साहित्य और कला के प्रति गहरी रुचि विकसित की।

नायडू ने मात्र 12 वर्ष की उम्र में मद्रास विश्वविद्यालय से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। अपनी असाधारण प्रतिभा के कारण उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा गया, जहां उन्होंने किंग्स कॉलेज, लंदन और फिर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के गर्टन कॉलेज में अध्ययन किया।

स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश
सरोजिनी नायडू का जीवन केवल साहित्य तक सीमित नहीं था, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय रूप से भाग लिया। 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध के समय वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ीं और 1916 में महात्मा गांधी से मिलीं। गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के संघर्ष को समर्पित कर दिया। उन्होंने गांधीजी के अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों को अपनाया और कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में जुट गईं।

प्रमुख योगदान और संघर्ष
सरोजिनी नायडू ने न सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया, बल्कि वे महिलाओं को भी इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित करती रहीं। वे कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं और 1925 में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन का नेतृत्व किया। 1930 में उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधीजी के 'नमक सत्याग्रह' में भाग लिया। उन्होंने गांधीजी के साथ दांडी मार्च में भाग लिया और इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे कई बार अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार हुईं, लेकिन उनके संकल्प और साहस ने उन्हें कभी नहीं डगमगाया। उनका नेतृत्व और संगठनात्मक कौशल उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों में शामिल करता है। नायडू कई बार जेल भी गईं।

अंग्रेजों को टक्कर
सरोजिनी नायडू ने अपनी वक्तृत्व कला और लेखनी के माध्यम से अंग्रेजों के खिलाफ तीखा विरोध दर्ज किया। वे अपने भाषणों में देशभक्ति, आत्म-सम्मान और स्वतंत्रता की भावना को प्रज्वलित करती थीं। उन्होंने भारत की आजादी के लिए लोगों को एकजुट करने का काम किया और महिलाओं को विशेष रूप से स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।

बचपन और काव्यात्मक करियर
सरोजिनी नायडू का साहित्यिक करियर उनकी किशोरावस्था में ही शुरू हो गया था। उनकी कविताएं भारतीय परंपराओं, प्रकृति, और महिलाओं की भावनाओं को प्रतिबिंबित करती थीं। उनकी पहली कविता संग्रह 'द गोल्डन थ्रेशहोल्ड' 1905 में प्रकाशित हुई। इसके बाद, उन्होंने 'द बर्ड ऑफ टाइम' (1912) और 'द ब्रोकन विंग' (1917) जैसी कई अन्य प्रसिद्ध कविताएं लिखीं। उनकी कविताओं में भारतीय संस्कृति और समाज का सजीव चित्रण मिलता है, और उनकी रचनाएं भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

भारत की आजादी में भूमिका
सरोजिनी नायडू की भूमिका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वे महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर विभिन्न आंदोलनों में हिस्सा लेती रहीं। आजादी के बाद, उन्हें संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत) का पहला राज्यपाल बनाया गया। वे किसी भी भारतीय राज्य की पहली महिला राज्यपाल बनीं।

कब-कब जेल जाना पड़ा?

  • 1920: असहयोग आंदोलन के दौरान, जब उन्होंने अंग्रेजी सामान का बहिष्कार करने और स्वतंत्रता की मांग को लेकर सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया, तो उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया।
  • 1930: महात्मा गांधी के 'नमक सत्याग्रह' में भाग लेने के दौरान, उन्होंने गांधीजी के साथ धरसाना साल्ट वर्क्स पर धावा बोला। इस दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल भेज दिया गया।
  • 1942: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान, सरोजिनी नायडू को दोबारा गिरफ्तार किया गया और कुछ समय के लिए जेल में रखा गया।

जब खानी पड़ी थी अंग्रेजों की लाठी
1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान, जब सरोजिनी नायडू धरसाना साल्ट वर्क्स में अहिंसक विरोध कर रही थीं, तब ब्रिटिश पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। इस दौरान उन्हें भी लाठियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अहिंसक रहकर संघर्ष जारी रखा। सरोजिनी नायडू ने अपने जीवन में कई बार अंग्रेजों के अत्याचार सहे, विशेषकर जेल में उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। फिर भी, उन्होंने कभी हार नहीं मानी और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहीं। सरोजिनी नायडू की दृढ़ता और साहस ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण नेता बना दिया।

सरोजिनी नायडू का नारा
सरोजिनी नायडू का कोई विशेष नारा नहीं था, लेकिन उनकी कविताओं और भाषणों में राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता की भावना मुखर रूप से अभिव्यक्त होती थी। उनके वक्तव्य और काव्य ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को गहराई और प्रेरणा प्रदान की।

क्यों कहते हैं भारत की कोकिला?
सरोजिनी नायडू को "भारत की कोकिला" (Nightingale of India) कहा जाता है, क्योंकि उनकी कविताएं और भाषण बेहद मधुर और प्रेरणादायक होते थे। उनके लेखन और बोलने का अंदाज बेहद प्रभावशाली था, जो सीधे दिल पर असर डालता था। उनकी कविताएं भारतीय संस्कृति, सौंदर्य, और संघर्ष को बखूबी चित्रित करती थीं, और उनकी आवाज में एक विशेष प्रकार की मिठास और प्रभावशाली शक्ति थी, जो उन्हें "कोकिला" के समान बनाती थी।

महिला सशक्तिकरण का प्रतीक
उस समय, जब भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका सीमित थी, सरोजिनी नायडू ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेकर महिलाओं को प्रेरित किया। उन्होंने दिखाया कि महिलाएं भी देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर सकती हैं और नेतृत्व कर सकती हैं।

लखनऊ में हुआ निधन
सरोजिनी नायडू का निधन 2 मार्च 1949 को लखनऊ में हुआ। वे उस समय उत्तर प्रदेश की राज्यपाल थीं। उनकी मृत्यु के बाद, उन्हें 'भारत की कोकिला' के रूप में याद किया जाता है, जो उनकी काव्यात्मक शैली और ओजस्वी वक्तृत्व के कारण था।

परिवार और उत्तराधिकार
सरोजिनी नायडू के परिवार में उनके पति का नाम गोविंदराजुलु नायडू था, जो एक चिकित्सक थे। उनके चार बच्चे थे: जयसूर्या, पद्मजा, रणधीर और लीलामणि। उनकी बेटी पद्मजा नायडू भी एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थीं और बाद में पश्चिम बंगाल की राज्यपाल बनीं।

वर्तमान में नायडू के पीढ़ी में जानें
2024 में, सरोजिनी नायडू के परिवार की वर्तमान पीढ़ी के बारे में विस्तृत जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनके परिवार के सदस्य विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में जुड़े रहे हैं। उनकी वंश परंपरा को उनके बच्चों और उनके योगदान के माध्यम से देखा जा सकता है।

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