राहुल-सोनिया के पीछे या उनके बिना आख़िर कैसे चल पाएगी कांग्रेस?

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"कांग्रेस पार्टी ऊपर से बहुत भारी हो गई है, इसमें बहुत सारे बुद्धिजीवी जमा हो गए हैं."

"नेता आरामतलब और आलसी हो चुके हैं. इन्हें दिल्ली में रहने की आदत हो चुकी है."

"ज़मीनी सच से बहुत परे हो चुके हैं, पार्टी कार्यकर्ताओं से कट गए हैं और आम जनता से भी."

"लीडरशिप का एक बड़ा संकट है. सोनिया गाँधी अपने बेटे राहुल से अंधे प्यार के कारण पार्टी की बागडोर किसी और को सौंपना नहीं चाहतीं."

"नेताओं में अब भी घमंड बाक़ी है, वो सोचते हैं जनता वापस उनके पास जल्द ही लौटेगी."

"पार्टी में उभरते हुए सियासी रुझानों से निपटने के लिए कोई मेकेनिज़्म नहीं है."

"पार्टी डूब रही है, इसका अंत नज़दीक है."

हाल के बिहार विधानसभा चुनाव और कई राज्यों में हुए उप-चुनावों में पार्टी को लगे झटके के बाद ऐसे ही विचार, कांग्रेस के भीतर और बाहर गूंज रहे हैं.

पार्टी में सुधार की मांग

साल 2014 में हुए आम चुनाव में हार के बाद से कांग्रेस पार्टी जब भी कोई चुनाव हारती है तो पार्टी में दबा-दबा सा विद्रोह जैसा माहौल बनता है जो कुछ समय बाद टल जाता है.

मीडिया में पार्टी के भविष्य और इसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगना शुरू हो जाता है.

कांग्रेस के अंदर कई नेता पार्टी में सुधार की मांग तेज़ कर देते हैं, जिनमें वो लोग भी शामिल हैं जो पार्टी के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार माने जाते हैं.

लेकिन एक संकट से दूसरे संकट के बीच कांग्रेस ने कर्नाटक, पंजाब, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव जीते भी और मध्य प्रदेश और कर्नाटक में सत्ता गंवाई भी.

इस बार "बग़ावत" करने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद और कपिल सिब्बल उन 23 नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने पिछले साल अगस्त में पार्टी में सुधार के लिए लिखी गई चिट्ठी पर दस्तख़त किए थे.

इन नेताओं की पहचान अनौपचारिक रूप से G23 कहकर की जाती है. इनमें से एक कपिल सिब्बल मीडिया को दिए गए एक इंटरव्यू में पूछते हैं कि डेढ़ साल पहले लिखी गई चिट्ठी के सुझावों पर अब तक अमल क्यों नहीं हुआ.

ये नेता पार्टी में एक नई जान डालने की बात करते हैं, पार्टी को एक ऐसी शक्ति बनाना चाहते हैं जो बीजेपी का मुक़ाबला हर चुनाव में कर सके.

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गाँधी परिवार कांग्रेस की राह का रोड़ा?

कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व प्रवक्ता संजय झा ने मार्च में एक अंग्रेज़ी अख़बार में एक लेख लिखकर पार्टी में सुधार लाने पर ज़ोर दिया था जिसके नतीजे में पार्टी ने उन्हें प्रवक्ता के पद से हटा दिया था.

अब तक उन्हें कोई परिवर्तन नज़र आया है? वो बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "नहीं, कोई खास नहीं, जो हमें उम्मीदें थीं, जिन मुद्दों की हमने अपने लेख में चर्चा की थी, इच्छाशक्ति और बदलाव लाने का जज़्बा जो पार्टी के लिए ज़रूरी है वो अब भी पार्टी नहीं कर सकी है. अभी बयानबाज़ी हम ज़्यादा सुन रहे हैं. लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं हुआ है."

पार्टी के नेताओं की सुधार की मांग की पुकार में सबसे अहम लीडरशिप के चयन की है. राहुल गाँधी में पिछले साल मई में आम चुनाव में हार की नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए पार्टी अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. कुछ समय के लिए सोनिया गाँधी अंतरिम अध्यक्ष बनीं लेकिन वो अक्सर बीमार रहती हैं.

संजय झा के अनुसार पार्टी का नया अध्यक्ष कब का बन जाना चाहिए था लेकिन वो मायूस हैं कि ऐसा अब तक नहीं हुआ है.

कांग्रेस के भीतर लोगों को लगने लगा है कि गांधी परिवार ही पार्टी की राह का रोड़ा बन गया है.

कई नेता सीधे तौर पर गाँधी परिवार पर हमला नहीं करते हैं लेकिन वो नहीं चाहते कि परिवार का कोई सदस्य अध्यक्ष बने "क्योंकि अब उनमे पहले जैसी वोटरों को आकर्षित करने की शक्ति नहीं रही". उनके मुताबिक़ सबसे बड़ी समस्या गाँधी परिवार है.

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परिवार गया पार्टी टूटी?

दूसरी तरफ़, पार्टी के कई दूसरे नेता ये समझते हैं कि गाँधी परिवार के नेतृत्व के बग़ैर पार्टी टूट जाएगी, ठीक उसी तरह जब सीताराम केसरी के नेतृत्व के दौर में कई कांग्रेसी नेता पार्टी छोड़ गए थे और जो पार्टी में थे वो सोनिया गाँधी से अधिक क़रीब थे. उनकी पसंद और वफ़ादारी गाँधी परिवार से जुड़ी है.

पार्टी के सूत्रों का कहना है कि राहुल गाँधी अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद भी पार्टी के बड़े फैसले लेते हैं और बड़े मुद्दों पर वही अधिक बोलते हैं. सोनिया गाँधी की मुहर एक औपचारिकता है. एक सूत्र ने कहा "वो बेताज बादशाह हैं."

लेकिन ज़मीन पर आम कार्यकर्ताओं में राहुल गाँधी की लोकप्रियता और वफ़ादारी अब भी सुरक्षित दिखती है.

मैंने नवंबर-दिसंबर 2018 में कांग्रेस पार्टी पर रिपोर्टिंग के लिए कई राज्यों का दौरा किया था. उस दौरे में आम कार्यकर्ताओं से बात करके मुझे एहसास हुआ था कि राहुल गाँधी कार्यकर्ताओं के हीरो हैं.

मुंबई स्थित ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की सेक्रेटरी भावना जैन ज़मीनी सतह पर आम कार्यकर्ताओं के बीच काम करती हैं .

मैंने फ़ोन करके उनसे पूछा कि बड़े नेताओं की परिवर्तन की मांग का असर आम कार्यकर्ताओं पर कितना पड़ा है तो उनका कहना था कि राहुल गाँधी की कार्यकर्ताओं में लोकप्रियता वैसी है जैसे चुनाव में हार से पहले थी.

उनका कहना था कि पार्टी का हर कार्यकर्ता उन्हें अध्यक्ष के पद पर देखना चाहता है. "मुझे लगता है कि आम कार्यकर्ता और नेताओं को अलग करके देखना चाहिए, कार्यकर्ता का राहुल गाँधी के प्रति विश्वास और आस्था दृढ़ है. ये आपने भी महसूस किया होगा."

भावना जैन कहती हैं कि उनके इस्तीफ़े पर दो राय है. "अगर उन्होंने इस्तीफ़ा दिया तो बुरे बने और नहीं देते तो और बुरे बनते. अब सारे कार्यकर्ता चाहते हैं कि वो अध्यक्ष पद पर वापस लौटें. आप देखेंगे कि छह महीने में ये परिवर्तन आएगा."

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कार्यकर्ताओं का मनोबल

ग्वालियर में डॉक्टर रश्मि पवार शर्मा पार्टी की नेता हैं. वहां से 2008 में विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुकी हैं और आज मध्य प्रदेश कांग्रेस कमिटी की सेक्रेटरी हैं. वो कहती हैं कि उनके शहर और राज्य का हर कार्यकर्ता चाहता है कि राहुल गाँधी पार्टी के अगले अध्यक्ष बनें.

"राहुल गाँधी को पार्टी का नेतृत्व करना चाहिए, हमारे सब लोग ये चाहते हैं कि राहुल जी आएं और कमान संभालें. मुझे लगता है कि मार्च तक पार्टी में बदलाव हो जाना चाहिए और पार्टी का एक नया अध्यक्ष होगा, हमारी मांग है कि वो राहुल गाँधी जी हों."

उनके अनुसार राहुल गाँधी की क़ाबिलियत पर किसी कार्यकर्ता को संदेह नहीं है. "वो बहुत अच्छा काम कर रहे थे. देखिये कांग्रेस अपने आप में एक बहुत बड़ा समुद्र है. तो मैं आपसे ये नहीं कहूँगी कि उनके आने से एकदम से कोई चमत्कार हो जाएगा, लेकिन धीरे-धीरे परिवर्तन आएगा."

रश्मि पवार का कहना है कि ग्वालियर और चंबल इलाक़े में पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा है. उन्होंने कहा कि पार्टी के प्रति कार्यकर्ताओं की वफ़ादारी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि "ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने के बावजूद आम कार्यकर्ताओं ने उनके साथ जाने से इनकार कर दिया."

तीन नवंबर को हुए उप चुनाव के नतीजों में ज्योतिरादित्य सिंधिया के 'घटते असर' पर टिप्पणी करते हुए वो कहती हैं, "ग्वालियर पूर्व चुनावी क्षेत्र से, जहाँ उनका महल है, उनका गढ़ है और जहाँ की जनता को वो कहते हैं कि ये मेरी जनता है, तो उनकी जनता ने उनके उम्मीदवार मुन्ना लाल गोयल को कांग्रेस के उम्मीदवार से हरवा दिया."

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कांग्रेस और राहुल गाँधी का दामन

रश्मि पवार उत्तेजित हो कर कहती हैं कि पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने के बाद जश्न मनाया और खुद को आज़ाद महसूस किया क्योंकि "पहले वो उनसे डरते थे."

रश्मि पवार, जो एनएसयूआई की प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुकी हैं, कहती हैं कि वो कांग्रेस और राहुल गाँधी का दामन कभी नहीं छोड़ेंगी, चाहे कुछ भी हो जाए. उनके मुताबिक़ पार्टी और राहुल गाँधी के लिए वफ़ादारी की झलक आम कार्यकर्ताओं में भी मिलेगी.

भावना जैन कहती हैं कि दिल्ली में नेताओं के बयानों से आम कार्यकर्ताओं में ग़लत पैग़ाम तो जाता है लेकिन उनके मनोबल पर इसका असर नहीं होता, लेकिन राहुल गाँधी के बारे में कहा ये जाता है कि अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद भी पार्टी में उन्हीं की चलती है, जैसे कि वो एक बेताज बादशाह हैं.

इस पर भावना जैन कहती हैं, "आप कहते हैं कि राहुल जी सारे बड़े फैसले अब भी लेते हैं तो बिलकुल, क्यों नहीं. वो आज भी पार्टी के एक अहम नेता हैं, उनके विचारों और उनकी भूमिकाओं का महत्त्व है. अगर सोनिया जी उनसे सलाह लेती हैं वो पार्टी के भले के लिए सलाह लेती हैं. आखिर में फैसला सोनिया जी ही लेती हैं, बीमार रहने के बावजूद."

जम्मू में पार्टी के एक युवा कार्यकर्ता राज रैना कहते हैं कि वो राहुल गाँधी के पक्ष में ज़रूर हैं लेकिन वो चाहते हैं कि इस पद का खुलेपन के साथ चुनाव हो.

कांग्रेस कार्यसमिति और अध्यक्ष के पदों का चुनाव हो और इसी तरह के चुनाव नीचे से ऊपर तक कराए जाएँ.

वो पार्टी के बड़े नेताओं से नाराज़ हैं, "हम जब दिल्ली जाते हैं तो बड़े नेताओं से मिलना असंभव होता है. इनमें से कोई जम्मू नहीं आता. और भूले-भटके आया भी तो ज़रूरी नहीं है कि हमारी पहुँच उन तक हो."

पार्टी का कोई नेता नहीं

संजय झा भी इस मुद्दे को उठा चुके हैं. वो कहते हैं, "अगर आप किसी को उत्तरदायी नहीं ठहराते तो पार्टी इसी तरह से हारती रहेगी. पार्टी में ज़िम्मेदारी इस समय किसी के पास नहीं है. अब लगभग दो साल हो जाएंगे लेकिन पार्टी के पास कोई अध्यक्ष नहीं है. ये पार्टी के साथ मज़ाक़ हो रहा है."

संजय झा आगे कहते हैं, "परिवार का पार्टी या देश के लिए जो योगदान है उस पर कोई विवाद नहीं है. परिवार ने जो बलिदान दिया है वो इतिहास में लिखा जा चुका है. परन्तु ये भी सच है कि अभी कांग्रेस पार्टी से लोग उम्मीद कर रहे हैं कि अब आप एक नए नेता को मौक़ा दीजिए."

संजय झा कहते हैं, "राहुल गाँधी जी से जो ग़लती हुई है वो ये कि उन्होंने इस्तीफ़ा दिया,लेकिन उन्होंने ये नहीं कहा कि एक महीने के अंदर नए नेता को आना चाहिए.

उन्होंने ये प्रक्रिया नहीं शुरू की. अंत में सोनिया जी को वापस आना पड़ा. अब दुनिया बोलती है कि कांग्रेस पार्टी के पास कोई नेता नहीं है. उन्होंने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी है".

संजय झा के अनुसार पार्टी के दूसरे नेता भी इसकी गिरती साख के ज़िम्मेदार हैं. उनके अनुसार पार्टी में सुधार न लाने के पीछे बड़े नेताओं का घमंड और सुस्ती है.

वो कहते हैं कि इन नेताओं को ये ग़लतफ़हमी है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सियासत को लोग जल्द रद्द करेंगे और वो उनके पास वापस आ जाएँगे.

संजय झा कहते हैं, "पार्टी किसी एक शख़्स या एक परिवार की तो है नहीं है. पार्टी को जब इस समय फ्रंट फुट पर खेलना था हम अपने ही अंदरूनी मसलों में फंसे हुए हैं. नेतृत्व कुछ बोलता नहीं है, मुंह खोलता नहीं है. G23 के नेताओं ने सुझाव दिए हैं. किसी ने पार्टी छोड़ी नहीं है. पार्टी ने हमें निलंबित किया है, हमने पार्टी छोड़ी नहीं है."

बिहार में कांग्रेस के नए चुने विधायक शकील अहमद खान को ये बात कुछ साल पहले समझ में आई थी कि उनके नेता आरामतलब हो गए हैं और दिल्ली छोड़कर नहीं जाना चाहते. उनके अनुसार वो दिल्ली में कई साल रहे और जब खुद को आम जनता और आम कार्यकर्ता से कटा हुआ महसूस किया तो वापस बिहार लौट गए.

वे कहते हैं, "मैंने कुछ साल पहले बिहार वापस लौटने का फैसला किया ताकि मैं आम लोगों से जुड़ सकूं और उनके लिए काम करूँ".

दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार पंकज वोहरा पिछले 40 से कांग्रेस पर रिपोर्टिंग करते आए हैं. पार्टी के उतार-चढ़ाव पर उनकी गहरी नज़र है. उनकी राय है कि राहुल गाँधी को अपने परिवार से बाहर किसी को अध्यक्ष बनाने में मदद करके पार्टी को मज़बूत बनाना चाहिए.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं " बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी शिकस्त के बाद राहुल गाँधी को 135 साल पुरानी पार्टी के निर्विवाद नेता के रूप में स्वीकार करना कठिन होगा इसलिए उन्हें अध्यक्ष के पद की दौड़ में शामिल होने की जगह किसी और को अध्यक्ष बनाने में मदद करनी चाहिए."

लेकिन भावना जैन और रश्मि पवार शर्मा को अटल विश्वास है कि अगर अध्यक्ष के पद के लिए पारदर्शी चुनाव हुआ तो आम कार्यकर्ता राहुल गाँधी के अलावा किसी और को नहीं चुनेंगे.

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