पश्चिम बंगाल में कैसे पांव 'पसार' रहा है आरएसएस

पश्चिम बंगाल भाजपा के आदर्श पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी का राज्य है लेकिन संघ को यहां अपनी ज़मीन तलाशने में काफी वक्त लगा.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
EPA
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

सुबह के छह बजे हैं और कोलकाता के दमदम इलाक़े में एक हनुमान मंदिर के घंटे बज उठते हैं.

श्रद्धालुओं के घंटे बजाने के बीच में कहीं आस-पास से ही 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' गाए जाने की आवाज़ भी सुनाई दी.

हनुमान मंदिर के पीछे पानी और कीचड़ से भरे एक बड़े मैदान में क़रीब 25 पुरुष ये गान गाकर व्यायाम में लग जाते हैं.

ये है पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दमदम शाखा, जिसमें छात्र, नौकरी पेशा से लेकर रिटायर्ड लोग शामिल हैं.

भीड़ की सियासत की शिकार होतीं ममता बनर्जी?

'पश्चिम बंगाल में हिंदू मुस्लिम टकराव की वजहें'

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
AFP
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

आरएसएस की शाखा

जाड़ा हो, गर्मी हो या फिर बरसात, अकेले दमदम इलाक़े में ऐसी 10 शाखाएं रोज़ सुबह एक घंटे के लिए लगती हैं.

इस इलाक़े में अब 14 बार साप्ताहिक मिलन होता है और इकाइयों की संख्या 'बढ़ कर 24 हो चुकी है.'

प्रणब दत्ता एक सरकारी कर्मचारी हैं और कहते हैं कि रोज़ सुबह चार बजे उठ कर घर के काम निपटा के यहाँ साढ़े पांच बजे पहुँच जाते हैं और पहले झाड़ू से सफ़ाई करते हैं.

उन्होंने कहा, "सब लोग परिवार के बारे में सोचते हैं, देश के बारे में नहीं. हम सबको दिन में पांच-छह घंटे देश के बारे में सोचना चाहिए. ऐसी शाखा मैदान में रोज़ आना चाहिए और हमारे परिवार भी हमें इसके लिए प्रोत्साहन देने लगे हैं."

बंगाल दंगों पर 'ख़ामोश' मीडिया ने अब क्यों खोली ज़ुबान

शाखाओं का विस्तार

भारत में आरएसएस की 56,000 से भी ज़्यादा शाखाएं लगती हैं और खुद संघ ने 2016 में कहा था, "2015-16 में शाखाओं का विस्तार 1925 हुई स्थापना के बाद सबसे ज़्यादा हुआ."

पश्चिम बंगाल में आरएसएस की शाखाओं की संख्या जहाँ 2011 में मात्र 530 थी वो आंकड़ा अब 1500 पार कर चुका है.

मार्च 2017 में कोयंबटूर में हुए अपने अधिवेशन में संघ ने 'पश्चिम बंगाल में हिंदुओं की घटती संख्या और कट्टरवादी तत्वों का बढ़ना एक बड़ा ख़तरा' घोषित किया था.

दशकों तक कांग्रेस और उसके बाद वाम दलों और अब तृणमूल शासित इस राज्य में आरएसएस और भाजपा की मौजूदगी लगभग हाशिए पर ही रही थी.

ग्राउंड रिपोर्ट: 'हमला करने वाले कहां से आए पता नहीं'

'पश्चिम बंगाल को गुजरात न समझे बीजेपी'

पश्चिम बंगाल में संघ

राज्य के दक्षिणी आरएसएस सचिव जिष्णु बसु कहते हैं कि इस बात पर हैरानी होनी ही नहीं चाहिए कि संघ यहाँ पर बढ़ रहा है.

उन्होंने कहा, "शुरू से बंगाल हिंदू राष्ट्रवाद का केंद्र रहा है. स्वामी विवेकानंद से लेकर भारतीय राष्ट्रीयता का आंदोलन यहीं से शुरू हुआ. स्वतंत्रता के बाद भी देश के बारे में सोचने वाली बात श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ही बंगाल से देश भर ले कर गए."

जिष्णु बसु से मेरा अगला सवाल यही था कि फिर क्या वजह रही कि पश्चिम बंगाल में आरएसएस जैसे संगठन दशकों तक पिछड़े रहे.

जवाब मिला, "बंगाल में हिंदुत्व और देश के बारे में सोचना तो है ही. बीच के वर्षों में डॉक्टर मुखर्जी की मृत्यु और उसके बाद उन्हें भुलाने की साज़िश भी पश्चिम बंगाल में हुई. लेकिन अब लोगों के मन में पुराना जज़्बा लौट आया है."

पैग़ंबर मोहम्मद पर कैफ़ का ट्वीट हुआ वायरल

बंगाल में फिर हिंसा, ममता से विपक्ष नाराज़

बौद्धिक विकास

हालांकि कुछ राजनीतिक पार्टियां इस ट्रेंड को 'घातक' मान रहीं हैं और 'चाहती हैं कि लोग आरएसएस के बहकावे में न आएं.'

पश्चिम बंगाल से राज्य सभा में कांग्रेस सांसद प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा, "अकेले कोलकाता में अब 3032 सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल चल रहे हैं. बंगाल में ऐसा कभी नहीं था. सभी जानते हैं ये राज्य बहुत प्रगतिशील था. लेकिन अब यहाँ हिंदुओं के मन में हिंदू होने की भावना बढ़ रही है. मेरे स्कूल के दोस्त अब मुझसे बताते हैं कि पहले वो हिंदू हैं या मुसलमान."

जो आरएसएस शाखाओं में पहुँच रहे हैं उनका चीज़ों को देखने का नज़रिया बिल्कुल अलग है.

राजर्षि क़ानून की पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन सुबह छह बजे शाखा पहुंचना नहीं छोड़ते. उन्होंने कहा, "मैं यहाँ रोज़ सुबह व्यायाम करता हूँ. मेरा बौद्धिक विकास होता है और मन को शांति मिलती है."

'बंगाल में बीजेपी और ममता का अपना-अपना खेल'

'...तो फिर ख़ुदा ही मुसलमानों की ख़ैर करे!'

धर्म के नाम पर...

शाखा में राजनीति पर तो कोई बात करता नहीं मिला लेकिन शाखा ख़त्म होने पर जो पुस्तकें बँट रहीं थी उनमें से एक के कवर पेज पर मौजूदा मुख्यमंत्री की तस्वीर के नीचे एक क्रॉस ज़रूर बना था.

शाखाओं से जुड़ने वाले तमाम लोग ये कहते मिले कि, "संघ को बदनाम ज़्यादा किया जाता रहा है."

हालांकि पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट फ्रंट सरकार में मंत्री रह चुके सीपीएम नेता अब्दुल सत्तार मानते हैं कि 'सब दिखावा है असल में कोई लोकप्रियता नहीं बढ़ी है.'

उन्होंने कहा, "धर्म के नाम पर बंगाल में राजनीति करना बहुत मुश्किल है. ये रबींद्र नाथ टैगोर का राज्य है जहाँ धर्म के नाम पर विभाजन नहीं होता."

संस्कृत से आई है मुसलमानों की 'नमाज़'

भाजपा के 'कोविंद व्यूह' से कैसे निकलेगा विपक्ष?

आरएसएस या भाजपा

कोलकाता में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुवोजीत बागची को भी लगता है कि अभी सीधा फ़ायदा किसी को नहीं हुआ है लेकिन आगे आने वाले दिनों में हो सकता है.

उन्होंने कहा, "बांग्लादेश से अपना घर-ज़मीन छोड़ कर आई करीब 40 प्रतिशत हिंदू आबादी का भी रोल हो सकता है. हालांकि वे लोग पूरी तरह आरएसएस या भाजपा के हो गए हैं ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगी क्योंकि पहले ये लेफ़्ट को सपोर्ट करते थे, अब काफी ममता की तृणमूल कांग्रेस की तरफ़ झुक चुके हैं लेकिन आगे हालात बदल सकते हैं."

बदले-बदले से दिखते हैं बीजेपी के 'शाह'

ममता के राज में 'रामधनु' बदलकर हुआ 'रंगधनु'

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+