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सेना में कमांडो बनने जा रही असम की करिश्मा कैसे बनी चरमपंथी?: ग्राउंड रिपोर्ट

सांकेतिक तस्वीर
Getty Images
सांकेतिक तस्वीर

"करिश्मा एक लड़के से प्यार करती थी. वो लड़का अक़सर उनके घर मिलने आया करता था. वो शादी भी करना चाहती थी लेकिन पता नहीं बाद में दोनों के बीच क्या विवाद हुआ."

प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन 'यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम' (उल्फ़ा-आई) में कथित तौर पर शामिल हुईं करिश्मा मेच की सहेली रीना बसुमतारी इतना कहने के बाद कुछ देर के लिए चुप्पी साध लेती हैं.

सरकार से बातचीत का विरोध कर रहे उल्फ़ा के इस धड़े से जुड़ने से कई दिन पहले तक करिश्मा रीना के घर में एक साथ रहा करती थीं.

दसवीं की फ़ाइनल परीक्षा की तैयारी कर रहीं रीना बताती हैं, "करिश्मा मुझसे उम्र में दो साल बड़ी थी. लेकिन 10वीं में फेल होने के कारण हम एक ही क्लास में साथ पढ़ने लगे थे."

"वैसे तो वो मुझसे काफी बातें करती थीं. लेकिन बड़ी होने के लिहाज से मैं चाहकर भी उसके प्यार के बारे में बात नहीं कर पाती थी."

रीना ने बताया, "वो लड़का शिवसागर शहर से यहां आता था और दोनों की शादी की बात चल रही थी. करिश्मा कुंग फू कराटे भी सीख रही थी. शायद उसके दिमाग़ में कुछ और चल रहा था."

"एक बार पूछने पर उसने सिर्फ़ इतना कहा था कि वो कुंग फू में बेल्ट हासिल करने की परीक्षा देने गुवाहाटी जाएगी. लेकिन इस बात के महज दो-तीन दिन बाद ही वो उल्फ़ा में शामिल हो गई."

"वो अक़सर कहती थी कि उसे सेना में कमांडो बनना है. लेकिन वो चरमपंथी संगठन में क्यों चली गई, मुझे भी नहीं पता."



संवेदनशील इलाका

रीना वही लड़की है जिनके पिता हेमकांत बसुमतारी पर करिश्मा को चरमपंथी बनाने के आरोप हैं.

फिलहाल हेमकांत इन आरोपों के कारण जेल में बंद हैं.

तिनसुकिया से नेशनल हाइवे नंबर 153 पर करीब 75 किलोमीटर ड्राइव कर छोटे से शहर जागुन पहुंचना तो आसान था पर वहां से महज पांच किलोमीटर दूरी पर बसे फानेंग गांव तक पहुंचना उतना ही मुश्किल.

राजमार्ग से अंदर की तरफ एक टूटी-फूटी कच्ची सड़क से मैं तिराप नदी के किनारे तक तो गाड़ी से पहुंच गया था लेकिन इस नदी पर बने लकड़ी के कमजोर पुल के कारण आगे पैदल ही जाना पड़ा.

दक्षिण पूर्वी अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों और घने जंगल से निकली तिराप नदी के किनारे बसे फानेंग गांव का नाम सुनने पर एक बार तो इलाके की पुलिस भी अलर्ट हो जाती है.

सुरक्षा के नज़रिए से ये एक ऐसा संवेदनशील इलाका है जहां सरकार ने आज भी सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम, 1958 यानी 'अफ़्स्पा' लगा रखा है.



अलगाववादी संगठन

असम के लेखापानी इलाके से लेकर अरुणाचल प्रदेश के जयरामपुर के घने जंगलों तक सेना और असम राइफल्स के जवान तैनात हैं.

क्योंकि इस क्षेत्र में उल्फ़ा के अलावा नागालैंड के वार्ता विरोधी अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड के कैडर भी सक्रिय हैं.

तिराप नदी के किनारे बसे इस बेहद पिछड़े गांव में जंगल के जिस रास्ते से मैं करिश्मा के घर पहुंचा था, उस रास्ते से अक़सर बंदूकधारी चरमपंथी आना-जाना करते हैं.

जवानों की गश्त
Reuters
जवानों की गश्त

गांव में मुलाकात के दौरान कुछ लोगों ने दबी जुबान में इस बारे में आगाह भी किया था और अंधेरा होने से पहले मुझे वहां से चले जाने की हिदायत भी दी.

दरअसल, फानेंग गांव से करिश्मा के चरमपंथी बनने के बाद 22 साल के एक और युवक के उल्फ़ा में शामिल होने की बात सामने आई है.

इसलिए इस गांव के युवकों पर सुरक्षा बलों की पैनी नज़र है.



'ऑपरेशन ऑल क्लीयर'

गांव में प्रवेश करते ही मेरी मुलाकात 47 साल के पुना सोनोवाल से हुई.

करिश्मा के घर का रास्ता बताते हुए उन्होंने कहा, "हमारे गांव से आज तक उल्फ़ा में एक भी लड़की नहीं गई है. ये पहली लड़की है जिसने हथियार उठाया है."

वो गांव के बारे में जानकारी देते हुए कहते हैं, "साल 1991 में हमारे गांव से कई लड़के उल्फ़ा में शामिल हुए थे. लेकिन बाद में उनमें से अधिकतर लड़कों ने समर्पण कर दिया था."

"उस समय उल्फ़ा में शामिल हुए दो लड़के तो आज भी लापता हैं. हमारे गांव से उल्फ़ा में जाने वाले ज्यादातर लड़के आहोम समुदाय के थे."

"साल 2003 में उल्फ़ा के ख़िलाफ़ भूटान में चलाए गए सेना के ऑपरेशन ऑल क्लीयर में हमारे गांव के प्रकाश दिहिंगिया लापता हुए थे जो आजतक नहीं मिले हैं."

हथियार उठाने की वजह

पुना सोनोवाल करिश्मा को बेहद करीब से जानते थे.

वो कहते हैं, "करिश्मा 18 साल की हो गई थी. चुकी वो जागुन हाई स्कूल में 10वीं में पढ़ाई कर रही थी तो कई लोग उनकी उम्र को कम बताते हैं."

"वो गांव में सबसे बातचीत करती थी. कोई सोच भी नहीं सकता कि वो इस तरह हथियार उठा लेगी."

हथियार उठाने की कोई ख़ास वजह?

इस सवाल पर सोनोवाल कहते हैं, "गांव में विकास और बेरोज़गारी ज़रूर एक मुद्दा है लेकिन करिश्मा के चरमपंथी बनने का कारण ये नहीं हो सकता."

"हमारे गांव से और भी कई लड़के-लड़कियां नदी के उस पार पैदल चलकर स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई करने जाते हैं. इसका मतलब ये तो नहीं कि वे सभी चरमपंथी बन जाएंगे."



चरमपंथी बनने के बाद

बांस और टीन से बने करिश्मा के कच्चे मकान में अब कोई नहीं रहता.

डेढ़ साल पहले करिश्मा के पिता के देहांत के बाद उसकी मां अरुणाचल प्रदेश में किसी के घर पर काम करने चली गई और बड़ा भाई किसी अन्य राज्य में काम करता है.

अभी कुछ दिन पहले तक करिश्मा और उसका आठवीं में पढ़ने वाला छोटा भाई प्रांजल इस मकान में रह रहे थे लेकिन करिश्मा के चरमपंथी बनने के बाद अब यहां कोई भी नही रहता.

करिश्मा की मां जरूर बीच-बीच में घर संभालने यहां आती-जाती रहती हैं. करिश्मा की मां मंजू मेच को अब भी उम्मीद है कि उनकी बेटी वापस लौट आएगी.

वो मीडिया के जरिए कई बार उल्फ़ा के कैडरों से अपनी बेटी को लौटाने की अपील कर चुकी हैं. पुलिस और सुरक्षा बलों के लोग मंजू पर भी नजर रखे हुए हैं.

लापता होने की रिपोर्ट

अपनी बेटी के चरमपंथी बनने के सवाल पर वो कहती हैं, "करिश्मा कराटे सीखने के लिए काफी जिद करती थी. पहले तो मैने उसे मना कर दिया था."

"लेकिन वो कहती थी अगर कराटे सीख लेगी तो उसे सेना या फिर पुलिस में भर्ती होने में मदद मिलेगी. इसके बाद मैं उसको कराटे सीखने के लिए भेजने लगी."

"वो नेपाल में एक कराटे प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए जाने की बात भी कह रही थी. फिर वो अचानक बीते एक मई से लापता हो गई."

"मैंने उसे हर जगह तलाशा और बाद में पुलिस में लापता होने की रिपोर्ट लिखवाई. पुलिस से मुझे पता चला कि करिश्मा चरमपंथी संगठन उल्फ़ा में चली गई है."

"लेकिन मेरा मन आज भी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है. मैंने उसे बहुत प्यार से बड़ा किया है. वो लौट आएगी तो मैं फिर उसे आगे पढ़ाउंगी."



कथित 'लव स्टोरी'

हालांकि असम पुलिस ने काफी छानबीन और अपने सूत्रों से सुनिश्चित करने के बाद हाल ही में करिश्मा के चरमपंथी संगठन उल्फ़ा में भर्ती होने की पुष्टि की है.

फानेंग गांव के लोग भले ही करिश्मा के चरमपंथी बनने के पीछे कोई एक ठोस कारण नहीं बताते लेकिन कई लोग उसकी कथित 'लव स्टोरी' की बात ज़रूर करते हैं.

करिश्मा की पड़ोसी बोहागी दहोटिया कहती हैं, "वैसे करिश्मा काफी शांत और मिलनसार लड़की थीं. उनका हमारे घर भी आना-जाना रहा है."

"किसी लड़के से प्यार करने की बात सुनी ज़रूर थी लेकिन बाद में जब पता चला कि वो उल्फ़ा में चली गईं तो हम कुछ समझ ही नहीं पाए."

भारत के लिए 'वर्ल्‍ड अंडर 20 चैंपियनशिप' में गोल्‍ड जीतने वाली असम की हिमा दास का जिक्र करते हुए बोहागी ने कहा, "हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे हिमा दास की तरह खेल में अपना भविष्य बनाएं. करिश्मा भी कराटे खेल रही थी. हमने सोचा वो भी इस खेल में काफी नाम करेगी. लेकिन उसने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली."

असम की सत्ता

गांव की एक और महिला मामोनी फूकन कहती हैं, "उल्फ़ा में जाने से एक दिन पहले करिश्मा हमारे घर आई थीं."

"जब वो लापता हुईं तो हमने सोचा किसी लड़के से शादी करने के लिए भाग गई हैं. मैने सुना था वो किसी लड़के से प्यार करती थी."

"लेकिन अचानक वो कैसे उल्फ़ा में चली गईं. हम सोचकर हैरान हैं. शायद उनके दिमाग पर किसी बात का गहरा असर हुआ होगा."

अलगाववादी संगठन उल्फ़ा (आई) में अचानक युवाओं के भर्ती होने की बात को कुछ लोग केंद्र सरकार के नागरिकता (संशोधन) विधेयक से जोड़कर भी देख रहें है.

क्योंकि प्रदेश में पिछले कुछ महीनों से इस विधेयक के ख़िलाफ़ लगातार विरोध हो रहा है. विरोध का व्यापक असर ऊपरी असम में सबसे ज्यादा देखने को मिल रहा है.

ये वो क्षेत्र है जहां साल 2016 के विधानसभा चुनाव में अधिकतर सीटें भारतीय जनता पार्टी की झोली में गई थी और उसी के बूते बीजेपी ने पहली बार असम की सत्ता हासिल की है.



नौजवानों की भर्ती

असम पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हैं कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक के मुद्दे पर उल्फ़ा (आई) के लोग सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को भावनात्मक तौर पर अपनी तरफ खींचने की कोशिश में लगे हैं.

असम पुलिस की विशेष शाखा के स्पेशल डीजीपी पल्लब भट्टाचार्य ने हाल ही में कहा था, "सोशल मीडिया पर उल्फ़ा (आई) के समर्थन में टिप्पणियां करने वाले 85 लोगों के ख़िलाफ़ आवश्यक कार्रवाई के लिए विभिन्न जिलों की पुलिस को निर्देश दिया गया है."

वैसे तो राज्य में उल्फ़ा के प्रति लोगों का समर्थन एक तरह से ख़त्म होने की कगार पर है लेकिन तिनसुकिया के कुछ ग्रामीण इलाकों में आज भी इस अलगाववादी संगठन का काफी प्रभाव है.

असम पुलिस की एक रिपोर्ट के अनुसार बीते सितंबर से इस चरमपंथी संगठन में कम से कम 11 युवक भर्ती हुए हैं. इनमें अधिकतर युवक तिनसुकिया ज़िले के हैं.

केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता में शामिल उल्फ़ा नेता प्रबाल नेउग ने बीबीसी से कहा, "उल्फ़ा की 28वीं बटालियन शांति-वार्ता में शामिल होने के बाद बीते आठ साल में उल्फ़ा में भर्ती होने कोई भी लड़का नहीं गया. तिनसुकिया में भी शांति का माहौल कायम हो गया था. लेकिन नागरिकता (संशोधन) विधेयक को लेकर युवाओं में भारी गुस्सा है. आप सोचिए केंद्र में शासन कर रही बीजेपी की सरकार बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के बजाए इस बिल के जरिए निमंत्रण देकर यहां बुला रही है. इससे हमारी भाषा, संस्कृति और पहचान खत्म हो जाएगी."



क्या कहती है पुलिस

हालांकि प्रबाल नेउग की दलील से तिनसुकिया के पुलिस अधीक्षक मुग्ध ज्योति महंत सहमत नहीं दिखते.

मुग्ध ज्योति महंत ने बीबीसी कहा, "इस साल मेरे क्षेत्र से उल्फ़ा में केवल तीन लोग गए हैं, जिसमें करिश्मा भी शामिल हैं. लेकिन करिश्मा का चरमपंथी संगठन में शामिल होने के पीछे प्रेम संबंधी कहानी है. उनका नागरिकता संशोधन बिल से कोई लेना-देना नहीं है. उल्फा में भर्ती पहले की तुलना में काफी कम हुई है."

"अगर पूरे राज्य की बात करें तो इस साल महज 10 से 12 लड़के ही संगठन में शामिल हुए है. साल 2015 में केवल तिनसुकिया जिले से करीब 30 लड़के उल्फ़ा-आई में शामिल हुए थे."

अगर उल्फा में भर्ती कम हुई है तो तिनसुकिया जिले में चरमपंथी संगठन का इतना प्रभाव क्यों है?

इस सवाल के जवाब में पुलिस अधीक्षक कहते हैं, "दरअसल म्यांमार का जो बॉर्डर है उसमें पिलर नंबर 171 से लेकर 176 तक सीमा पूरी तरह से खुली हुई है. कोई भी आ-जा सकता है. इसी बॉर्डर के पास चरपंथियों का अस्थाई शिविर है. वहां से मेरे यहां की एरियल दूरी महज 37 किलो मीटर है और पूरा इलाका जंगल से भरा है."

"इस जंगल में सात घंटे पैदल चलने से तिनसुकिया पहुंच सकते हैं. जंगल इतना घना है कि दिन के समय भी कोई दिखाई नहीं देता. ऐसे में सुरक्षा बलों को लिए यहां काम करना बड़ी चुनौती है."

'28 वीं बटालियन'

करिश्मा की सहेली रीना का परिवार हेमकांत बसुमतारी को जेल में डालने से परेशान है.

रीना की मां जुनाली बसुमतारी ने कहा, "करिश्मा को चरमपंथी बनाने में मेरे पति का कोई हाथ नहीं है. उस दिन उल्फ़ा के लोग हथियारों के साथ करिश्मा को ले जाने यहां आए थे. मेरे पति को उन लोगों ने धमकाया था. इसलिए वो डर गए थे और जंगल का रास्ता दिखाने उन लोगों के साथ चले गए. मेरे पति ने ये बात पुलिस के समक्ष भी स्वीकार की है. इसकी सजा के तौर पर वे तीन महीने जेल में रहकर भी आए हैं लेकिन फिर उनको गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है."

खुद के चरमपंथी संगठन में भर्ती होने के सवाल पर करिश्मा की सहेली रीना कहती हैं, "मैं उल्फ़ा में भर्ती होने कभी नहीं जाऊंगी. करिश्मा के चरमपंथी बनने के कई कारण हैं. वो मानसिक अशांति से गुजर रही थी."

वैसे तो उल्फ़ा में साल 2010 तक महिला कैडरों की गिरफ्तारी या फिर आत्मसमर्पण की खबरें आती रहती थीं.

लेकिन जब संगठन के सबसे ताक़तवर '28 वीं बटालियन' के शीर्ष कैडर मुख्यधारा से जुड़ने के लिए केंद्र सरकार के साथ वार्ता में आ गए तो ऊपरी असम में उल्फ़ा की एक तरह से कमर टूट गई. उल्फ़ा (आई) के प्रमुख परेश बरुआ फिर से संगठन को मजबूत करने में लगे हैं.

जागुन के उदयपुर जूनियर कॉलेज में पढ़ाई कर रही फानेंग गांव की दीपिका बरुआ चरमपंथी संगठन में शामिल होने के बिलकुल ख़िलाफ़ हैं.

करिश्मा के साथ जागुन हाई स्कूल में पढ़ चुकी दीपिका कहती हैं, "करिश्मा ने उल्फ़ा में जाकर अच्छा काम नहीं किया.

मैं रोज़ाना नदी के उस पार करीब पांच किलो मीटर पैदल चलकर कॉलेज आना-जाना करती हूं. मैंने हाई स्कूल की पढ़ाई इसी तरह पैदल चलकर पूरी की है. बाढ़ के समय नदी पर बना लकड़ी का पुल भी बह जाता है. उस दौरान नाव में बैठकर नदी पार करते है. मैं क्यूं उल्फ़ा में जाऊंगी. मैं अपना भविष्य बनाने के लिए पढ़ाई पूरी करना चाहती हूं."

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