कैसे तालिबान की कट्टर विचारधारा का भारत से है सीधा नाता ? जानिए

नई दिल्ली, 26 अगस्त: अफगानिस्तान में 20 साल पहले तालिबान की कूर सत्ता की गवाह दुनिया बन चुकी है। तालिबान शासन का एक ही फंडा है, धार्मिक अल्पसंख्यक और वे मुसलमान जो उसकी कट्टर विचारधारा को अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं, उनके लिए धरती पर कोई जगह नहीं है। तालिबान के शासन में महिलाओं और लड़कियों के अधिकारियों की हक की बात करना गुनाह समझा जाता है। दोहा समझौते में तालिबान अपना दूसरा रूप दिखाने की कोशिश की थी। लेकिन, महज 10-11 दिनों में ही उसका असली चेहरा बेनकाब होने लगा है। आप जानकर हैरान हो रहे होंगे कि इस्लाम की इतनी कट्टर सोच क्या शांति के प्रतीक समझे जाने वाले भारत की पैदाइश हो सकती है ?

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    देवबंदी इस्लाम है तालिबान का आधार-रिपोर्ट

    देवबंदी इस्लाम है तालिबान का आधार-रिपोर्ट

    कुछ शोधकर्ताओं ने दक्षिण एशिया में जातीय-धार्मिक संघर्षों पर जो रिसर्च किया है, उसके आधार पर न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस ने तालिबान के धार्मिक विश्वास की पैदाइश पर एक रिपोर्ट छापी है। इसके मुताबिक तालिबान की जड़ें देवबंदी इस्लाम की विचारधारा में है, जो कि 19वीं शताब्दी में भारत में ही पैदा हुई थी। भारत में देवबंदी इस्लाम की शुरुआत 1867 में हुई। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के ठीक 10 साल बाद। देवबंदी विचारधारा को स्थापित करने के पीछे दो मौलवियों का हाथ माना जाता है- मौलाना मोहम्मद कासिम नानौतवी और मौलाना राशिद मोहम्मद गंगोही। इनका लक्ष्य मुस्लिम युवाओं को आडंबरहीन, सख्त और इस्लाम के प्राचीन नजरिए को अपनाने और उसपर चलने के लिए राजी करना था। कुल मिलाकर इसका उद्देश्य इस्लाम को पुनर्जीवित करना था।

    पहला देवबंदी मदरसा यूपी में खुला

    पहला देवबंदी मदरसा यूपी में खुला

    देवबंदी विचारधारा इस्लाम की रूढ़ीवादी सोच पर जोर देता है, जिसके मुताबिक सुन्नी मुस्लिम कानून या शरिया ही पापों से मुक्ति का रास्ता है। इसके तहत इस्लाम की उन प्रथाओं को फिर से जिंदा करने पर जोर दिया जाता है, जो कि सातवीं शताब्दी में थे, यानी पैगंबर मुहम्मद के वक्त में। यह वैश्विक जिहाद की धारणा पर आधारित है, जिसके तहत दुनियाभर में मुसलमानों की रक्षा करना और गैर-मुस्लिम विचारों का प्रतिरोध करना पवित्र कर्तव्य माना जाता है। देवबंदी परंपरा के तहत मुस्लिम युवाओं को शिक्षित करने के लिए 19वीं सदी के अंत में पहला मदरसा आज के उत्तर प्रदेश (देवबंद) में खोला गया था।

    पश्तूनों के बीच लोकप्रिय हुआ देवबंदी इस्लाम

    पश्तूनों के बीच लोकप्रिय हुआ देवबंदी इस्लाम

    अगले कई दशकों में देवबंदी मदरसे भारतीय उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में खुल गए, जिसमें मुस्लिम युवाओं को तालीम दी जाने लगी। इसी कड़ी में पश्तूनों (पठानों) के बीच भी इस्लाम की यह विचारधारा काफी लोकप्रिय हुई, जो कि मौजूदा वक्त में अफगानिस्तान-पाकिस्तान की सीमा के दोनों ओर रहते हैं। पश्तून नेताओं ने देवबंदी पाठ्यक्रमों और परंपरा को पूरे पश्तून बेल्ट यानी डुरंड लाइन की दोनों ओर स्थापित करने और फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई, जो कि भारत और अफगानिस्तान को अलग करता था।

    1947 के बाद पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर खुले मदरसे

    1947 के बाद पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर खुले मदरसे

    1947 में जब भारत का बंटवारा हो गया तो कई प्रमुख देवबंदी पाकिस्तान चले गए और वहां विशाल मदरसे स्थापित किए। बंटवारे के बाद रूढ़ीवादी मुस्लिम परंपरा के तहत छात्रों को ट्रेनिंग देने में उन्हें और मदद मिली। पाकिस्तानी देवबंदी मदरसों में जम्मू और कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी राजनीति को हवा देने का भी काम शुरू हो गया। एक अनुमान के मुताबिक 1967 तक दुनियाभर में 8,000 देवबंदी मदरसे खुल चुके थे, जिनमें से हजारों देवबंदी ग्रैजुएट सिर्फ भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और मलेशिया में तैयार हुए। शुरू में इन मदरसों को फंड की किल्लत थी। लेकिन, जैसे ही 1979 में सोवियत यूनियन ने अफगानिस्तान में कदम रखा, देवबंदी मदरसों की बहार आ गई।

    पाकिस्तान ने अमेरिकी पैसों से दी सक्रिय मदद

    पाकिस्तान ने अमेरिकी पैसों से दी सक्रिय मदद

    आज की तारीख में बड़ी संख्या में अफगानी लड़ाके देवबंदी मदरसों से ही निकले हुए हैं, खासकर पश्तून जो कि इस आतंकी आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं। थॉमस हेघाम्मर ने लिखा है कि इन्हें उन अमिरेकी डॉलरों से भी आगे बढ़ने में मदद मिली है, जो उसने पाकिस्तान को दिए हैं और सऊदी अरब से भी पैसे मिले हैं। हालांकि, इस समय देवबंदी मदरसे अपने मूल धार्मिक जड़ों से काफी दूर हट चुके हैं। इससे पहले 1979 में जब सोवियत यूनियन अफगानिस्तान में घुसा था तो लाखों अफगान शरणार्थी पाकिस्तान में खासकर पश्तून इलाके में चले गए। पाकिस्तान, अफगानिस्तान में अपनी दखलंदाजी चाहता था, इसलिए उसने सोवियत के खिलाफ शरणार्थी कैंपों के युवाओं में धार्मिक जहर घोलना शुरू कर दिया। इस दौरान पाकिस्तान को लगातार अमेरिकी मदद भी पहुंचती रही। इनमें से ही ज्यादातर लड़ाके बाद में तालिबान के सदस्य बन गए।

    तालिबान का संस्थापक मुल्ला उमर भी देवबंदी मदरसे का छात्र था

    तालिबान का संस्थापक मुल्ला उमर भी देवबंदी मदरसे का छात्र था

    आज की तारीख में तालिबान के कई नेता ओर आतंकी देवबंदी शिक्षण संस्थानों से ही तालीम लिए हुए हैं। तालिबान का संस्थापक मुल्ला उमर भी देवबंदी स्कूल की ही पैदाइश था और उसने अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों जगह तालीम ली थी। 1989 में जब सोवियत संघ को अफगानिस्तान से निकलना पड़ा तो भी अफगान लड़ाकों को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का समर्थन और आर्थिक मदद मिलना जारी रहा। लैरी पी गूडसन ने लिखा है कि 1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया तो उसमें पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों का बहुत बड़ा हाथ था। जैसे ही सत्ता मिली उसने इस्लाम का एक अलग ही रूप दिखाना शुरू कर दिया, जो कि औपनिवेशिक भारत की उसकी जड़ों से काफी दूर था।

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