कितनी असरदार होगी प्रदर्शनकारी किसानों का 'भ्रम' दूर करने की BJP-RSS की नई रणनीति
नई दिल्ली- बुधवार को केंद्र सरकार के लिखित प्रस्तावों को ठुकराने के बाद तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर किसान संगठनों ने अपना आंदोलन तेज करने का ऐलान कर दिया है। फिलहाल ऐसे कोई रास्ते नहीं दिखाई पड़ रहे हैं, जिसमें किसान सरकार के प्रस्तावों पर विचार करने के लिए तैयार हो जाएं। दूसरी तरफ भारत बंद के असर का आंकलन करने के बाद केंद्र सरकार भी अपने उस स्टैंड पर पूरी तरह से डटी हुई है कि वह किसानों की बातों पर दिल खोलकर विचार कर रही है, लेकिन कानून वापस लेने का कोई सवाल नहीं है। ऐसे में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के किसान संगठनों ने पूरे देश में किसानों के बीच जाकर उन्हें इन कानूनों के फायदे बताने और उनकी चिंताओं-आशंकाओं को दूर करने का फैसला किया है।

किसान चौपालों के जरिए किसानों तक पहुंचेंगे भाजपा-संघ
आरएसएस और भाजपा के किसान संगठनों ने किसानों के आंदोलन के तेज होने की आशंकाओं के बीच देशभर में किसान चौपालों के जरिए किसानों तक पहुंचने के लिए बहुत बड़ी योजना तैयार की है। इन चौपालों के जरिए सत्ताधारी दल से जुड़े किसान संगठन किसानों तक कृषि कानूनों के फायदे की जानकारी पहुंचाएंगे और किसानों के मन में नए कानूनों को लेकर जो भी दुविधाएं हैं, उन्हें दूर करने की कोशिश करेंगे। इसके तहत बीजेपी का किसान मोर्चा गांवों में जाकर किसानों के साथ बैठकें आयोजित करेगा। जबकि, आरएसएस से जुड़ा भारतीय किसान संघ ने अपने सभी इकाइयों से कहा है कि वह किसानों को उनके उत्पादों की खरीद और भुगतान से जुड़े मुद्दों में उनकी मदद करें। क्योंकि, केंद्र सरकार साफ कर चुकी है कि वह कानूनों में संशोधन के लिए तो तैयार है, लेकिन उसे एकसाथ वापस नहीं लेगी।
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मंडी से 60 वर्षों में किसानों की हालत क्यों खराब हुई?
भाजपा सांसद और पार्टी के किसान मोर्चा के अध्यक्ष राजकुमार चाहर ने ईटी को बताया है कि अगले हफ्ते की शुरुआत से किसान चौपाल शुरू किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि, 'हम सरकार और किसानों के बीच बातचीत के अच्छे नतीजे निकलने का इंतजार कर रहे हैं। अब हम सभी गांवों में बैठकें करेंगे, जहां हमारे पार्टी के सदस्य और स्थानीय इलाके के दूसरे प्रतिनिधि कानूनों को लेकर किसानों की चिंताओं को दूर करने के लिए उनसे बात करेंगे। हम यह बताना चाहते हैं कि यह एक राजनीतिक विरोध है और इसका किसानों के कल्याण से कोई लेना-देना नहीं है।' किसान चौपालों में किसानों को भाजपा बताएगी कि कौन उनका दुश्मन है और मित्र कौन है। चाहर के मुताबिक जब ये बिल पास हुए थे, तब भी उन्होंने महीने भर की मुहिम चलाई थी। पार्टी ने किसानों से कहा है कि वह हमें अपनी बात बताएं, प्रधानमंत्री को बताएं। पार्टी किसानों तक यह बात पहुंचाएगी नए कानून किसानों को मंडी लॉबी के दबदबे से छुटकारा दिलाएगा। उन्होंने कहा कि, 'अगर पिछले 60 वर्षों से मंडी किसानों को फायदा पहुंचा रहे थे तो किसानों की हालत खराब नहीं हुई होती।'

पंजाब की स्थिति अलग- भारतीय किसान संघ
उधर भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय सचिव मोहिनी मोहन मिश्रा ने कहा है कि उनका संगठन किसानों तक पहुंचने की कोशिश पहले ही शुरू कर चुका है और उसकी सभी इकाइयों से कहा गया है कि नए कानूनों के लागू होने के बाद किसानों की सहायता करें। इस किसान संघ ने भारत बंद का समर्थन नहीं किया था, लेकिन कानूनों में संशोधन की वकालत की थी। उन्होंने कहा, 'भुगतान और खरीद पर हमारा मुख्य फोकस होगा और हम चाहते हैं कि राज्य सरकारों और एजेंसियों के द्वारा इन कानूनों का ठीक से अमल सुनिश्चित हो। असल में राज्य सरकार को चाहिए कि वह केंद्र से बात करे।' उन्होंने कहा कि उन्हें जो फीडबैक मिला है, उसके मुताबिक पंजाब की स्थिति दूसरे राज्यों से अलग है। यहां के किसानों के पास गेहूं की बहुत बड़ी मात्रा है। वे अपने पूरे उत्पाद को मंडियों में बेचते हैं। दूसरे राज्यों से इसकी तुलना नहीं की जा सकती।

कितनी असरदार होगी भाजपा-संघ की कोशिश?
गौरतलब है कि जहां भारतीय जनता पार्टी ठेके पर खेती को लेकर कई अच्छी कहानियां बताती है, वहीं भारतीय किसान संघ को इसको लेकर कुछ आशंकाएं थीं, जिसे वह दूर करना चाहता था। बहरहाल, सरकार ने इन सबके मद्देनजर अपना लिखित प्रस्ताव किसानों को भेजा था, जिसे प्रदर्शनकारी किसान संगठनों ने पूरी तरह से ठुकरा दिया है। अब वो तीनों कानूनों की वापसी से कम किसी बात पर राजी नहीं हो रहे। यह बात भी सही है कि प्रदर्शनकारियों में पंजाब के किसानों का प्रभाव सबसे ज्यादा है। दिल्ली-चंडीगढ़ से कनाडा तक उन्हीं की वजह से आंदोलन को जोश मिल रहा है। ऐसे में भाजपा या संघ के किसान संगठन जब तक पंजाब के किसानों को नहीं मना पाएंगे, उनकी कवायद कितनी असरदार होगी यह बहुत बड़ा सवाल है।












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