परशुराम उत्तर प्रदेश की राजनीति में अचानक इतने अहम कैसे हो गए?

परशुराम पर राजनीति
BBC
परशुराम पर राजनीति

हिन्दू धर्म में परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है और मान्यता है कि उनका जन्म उत्तर प्रदेश में ही हुआ था, बावजूद इसके उत्तर भारत में परशुराम का शायद ही कोई मंदिर दिखे और किसी मंदिर में शायद ही उनकी कोई मूर्ति दिखे.

सियासी पार्टियों को यह बात शायद अखर गई और उनके बीच अचानक भगवान परशुराम की ऊंची-ऊंची मूर्तियां लगवाने की घोषणा की होड़ सी लग गई.

हालांकि इसके पीछे परशुराम के प्रति आस्था कम, ब्राह्मण समुदाय को ख़ुश करने की राजनीतिक आकांक्षा ज़्यादा दिख रही है लेकिन सवाल यह भी है कि परशुराम की मूर्तियां क्या वास्तव में ब्राह्मणों को ख़ुश करने का ज़रिया बन सकती हैं?

परशुराम की मूर्ति लगवाने की इच्छा सबसे पहले समाजवादी पार्टी ने जताई. पार्टी ने घोषणा की कि लखनऊ में भगवान परशुराम की 108 फ़ीट ऊंची मूर्ति लगाई जाएगी और कुछ अन्य जगहों पर भी मूर्तियां स्थापित की जाएंगी. पार्टी नेता और पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्र कहते हैं कि यह योजना आज नहीं बनी है बल्कि वो और उनकी एक संस्था इसके लिए पिछले कई महीनोंसे काम कर रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत में अभिषेक मिश्र बताते हैं, "हम लोग अपनी एक संस्था परशुराम चेतना पीठ की ओर से यह प्रतिमा लगा रहे हैं और इसकी योजना उसी दिन बनी थी जब पिछले साल 25 दिसंबर को अटल जी की 21 फ़ीट की मूर्ति लगी थी. हमें लगा कि दक्षिण भारत में तो कई जगह भगवान परशुराम के मंदिर हैं और मूर्तियां हैं, लेकिन उत्तर भारत में ऐसा नहीं है."

परशुराम पर राजनीति
BBC
परशुराम पर राजनीति

'ब्राह्मण ख़ुद को पीड़ित महसूस कर रहा'

अभिषेक मिश्र कहते हैं, "आज यह चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि ब्राह्मण ख़ुद को पीड़ित महसूस कर रहे हैं. पिछले कुछ दिनों में न जाने कितने ब्राह्मणों की हत्याएं हो चुकी हैं पर उनकी कोई सुनवाई नहीं है. सरकार बनने के कुछ दिन बाद ही गोरखपुर में हरिशंकर तिवारी के यहां जिस तरह से अनावश्यक छापेमारी की कार्रवाई की गई और इस तरह का निशाना बनाने का सिलसिला जारी है, उससे ब्राह्मण समुदाय बुरी तरह से ख़फ़ा है."

हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने अभिषेक मिश्र के इस दावे को ग़लत बताते हुए पूछा है कि ख़ुद समाजवादी पार्टी की सरकार में ब्राह्मण कितने उपेक्षित थे.

पार्टी नेता और राज्य के उप-मुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा कहते हैं, "जिस समाजवादी पार्टी के शासनकाल में भगवान परशुराम की मूर्तियां सबसे ज़्यादा तोड़ी गईं वो पार्टी अब मूर्ति लगाने की बात कर रही है. एसपी और बीएसपी दोनों ही पार्टियों ने हमेशा जाति की राजनीति की है. इनका काम एक जाति को दूसरे से और दूसरे को तीसरे से लड़ाने का रहा है."

वहीं, समाजवादी पार्टी की इस घोषणा के तत्काल बाद बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने भी घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी सत्ता में आने पर इससे भी बड़ी, यानी 108 फ़ीट से भी ऊंची मूर्ति लगवाएगी.

इस घोषणा के साथ ही मायावती ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा कि यदि समाजवादी पार्टी को परशुराम की इतनी ही चिंता थी तो मूर्तियां तब लगवानी चाहिए थीं, जब वह सत्ता में थी.

हालांकि यह सवाल बहुजन समाज पार्टी के सामने भी उतना ही अहम है जितना समाजवादी पार्टी के लिए, लेकिन बहुजन समाज पार्टी में इसका जवाब देने को कोई नेता तैयार नहीं है.

ये भी पढ़ें: विकास दुबे प्रकरण से तेज़ हुई एनकाउंटर, जाति और राजनीति की बहस

विकास दुबे
Samiratmaj Mishra/BBC
विकास दुबे

'दूसरी सरकारों में इससे ज़्यादा हो रहा था'

दरअसल, पिछले महीने कानपुर में विकास दुबे और उनके साथियों की कथित एनकाउंटर में मौत, उसके बाद तीन दिन पहले ग़ाज़ीपुर के राकेश पांडेय की कथित मुठभेड़ में मौत और पिछले कुछ समय से ब्राह्मण समुदाय के लोगों की हो रही हत्याओं ने आम लोगों में सरकार के प्रति रोष उत्पन्न कर दिया है.

इस ग़ुस्से की अभिव्यक्ति न सिर्फ़ सोशल मीडिया पर देखी जा रही है बल्कि भारतीय जनता पार्टी के कई नेता भी इसकी वजह से बैकफुट पर दिख रहे हैं. इस बारे में पूछे गए सवालों का उनके पास कोई जवाब नहीं है. सिवाय इसके कि 'दूसरी सरकारों में इससे भी ज़्यादा हो रहा था.'

जानकारों के मुताबिक़, राजनीतिक दलों ने ब्राह्मणों की इसी कथित नाराज़गी को भुनाने की कोशिश में परशुराम को महत्व देने की पहल की है.

वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि भगवान को जाति विशेष का बताकर या फिर उन्हें जातीय खांचे में बांटकर उसका राजनीतिक लाभ नहीं लिया जा सकता.

योगेश मिश्र कहते हैं, "यह ठीक है कि पिछले कुछ समय से ब्राह्मणों में कुछ नाराज़गी बढ़ी है लेकिन उस दूरी को सपा-बसपा परशुराम की मूर्ति लगाकर पाट देंगे, ऐसा दिखता नहीं है. ख़ासकर राम मंदिर के भूमिपूजन के बाद तो यह बिल्कुल भी नहीं लगता. चुनावी वक़्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब उस उपलब्धि को अपने तरीक़े से बताना शुरू करेंगे तो यह सारी नाराज़गी छूमंतर हो जाएगी."

योगेश मिश्र कहते हैं कि राजनीतिक मूर्तियों में प्रतिद्वंद्विता ठीक है लेकिन भगवान को जाति में बांटना ये कोई स्वीकार नहीं कर पाएगा.उनका मानना है कि विपक्षी दलों की निगाह में ब्राह्मण समुदाय भले ही नाराज़ दिख रहा हो लेकिन बीजेपी के पास यह दलील भी है कि लंबे समय के बाद ऐसा संयोग बना होगा जब राज्य में पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव दोनों ब्राह्मण जाति के ही हों.

हालांकि बीजेपी के कई नेता भी इस बात को मानते हैं कि पार्टी का सबसे बड़ा समर्थक वर्ग ब्राह्मण है और पिछले कुछ समय में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिनसे इस समुदाय में बीजेपी के प्रति नाराज़गी बढ़ी है.

पार्टी के एक बड़े नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "आम ब्राह्मण की बात तो दूर, विधायकों और सांसदों तक की कोई सुनवाई नहीं है. कितने लोग खुलकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं. इन सबको दूर नहीं किया गया तो विधानसभा चुनाव में पार्टी को नुक़सान होना तय है."

ये भी पढ़ें: तिलक ग़ैर-ब्राह्मणों और महिलाओं की शिक्षा के किस हद तक ख़िलाफ़ थे?

परशुराम उत्तर प्रदेश की राजनीति में अचानक इतने अहम कैसे हो गए?

पार्टी लाइन से हटकर ब्राह्मणों की एकजुटता

वहीं कांग्रेस पार्टी भी बीजेपी सरकार से नाराज़ ब्राह्मण समुदाय को अपनी ओर करने की कोशिश में काफ़ी पहले से लगी है और कानपुर में बिकरू कांड के बाद से तो वह और भी मुखर हो गई है.

पार्टी के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद 'ब्राह्मण चेतना मंच' के बैनर तले ब्राह्मणों को एकजुट करने की कोशिश में लगे हैं.

कांग्रेस पार्टी ने परशुराम की मूर्ति लगवाने जैसी घोषणा तो नहीं की है लेकिन जितिन प्रसाद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक पत्र लिखकर परशुराम जयंती पर दी जाने वाली सरकारी छुट्टी फिर से बहाल करने की माँग की है.

समाजवादी पार्टी की सरकार में परशुराम जयंती पर सरकारी छुट्टी की घोषणा की गई थी जिसे भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने ख़त्म कर दिया था.

जितिन प्रसाद कहते हैं, "ब्राह्मण आज न सिर्फ़ उपेक्षित है बल्कि पीड़ित भी है. हम इसे पार्टी के स्तर पर नहीं देख रहे हैं बल्कि पार्टी लाइन से अलग हटकर ब्राह्मणों को जागृत करने की कोशिश कर रहे हैं. जिस तरह से ब्राह्मण वर्ग के लोगों को टार्गेट किया जा रहा है, उससे उनके भीतर एक तरह का डर है. यह नैरेटिव सेट करने की साज़िश की जा रही है कि ब्राह्मण अपराधी है. मैं अब तक 20 से ज़्यादा ज़िलों के लोगों से संवाद कर चुका हूं और यह सिलसिला जारी है. आप यक़ीन मानिए, इस मामले में सभी पार्टी लाइन से अलग हटकर अपनी बात कह रहे हैं और सभी का यही कहना है कि उन्हें टार्गेट किया जा रहा है."

उत्तर प्रदेश में क़रीब 12 फ़ीसदी ब्राह्मण मतदाता हैं और यही वजह है कि हर पार्टी इस वर्ग को अपनी ओर खींचने की कोशिश में है.

ब्राह्मण समुदाय बीजेपी से नाराज़ है या नहीं, इसका पता लगाने का पैमाना भी चुनाव ही हो सकता है लेकिन परशुराम की मूर्तियों के ज़रिए यदि यह समुदाय प्रसन्न हो सकता होगा तो शायद बीजेपी भी यह करने से नहीं चूकेगी.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+