एक खिलौने ने कैसे खोला रज़िया के रेप का राज़?

एक खिलौने ने कैसे खोला रज़िया के रेप का राज़?

13 साल की रज़िया (बदला हुआ नाम) एक शाम जब सो कर उठी तो उसका बिस्तर ख़ून से लथपथ था. पहने हुए कपड़े ख़ून में सने थे.

बेटी को आख़िर हुआ क्या? रज़िया के माता-पिता को ये बात समझ नहीं आई. वो आनन-फ़ानन में उसे अस्पताल लेकर गए.

डॉक्टर ने रज़िया की जाँच की और माता-पिता को ज़ोर से डांट लगाई.

रज़िया की माँ के मुताबिक़, डॉक्टरों का कहना था कि रज़िया को किसी तरह की अंदरुनी चोट नहीं लगी है, बल्कि उसका रेप हुआ है.

ये सुनते ही मानो रज़िया के माता-पिता के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई.

रज़िया मानसिक रूप से विकलांग है. उतराखंड के एक छोटे से गाँव में अपने माता-पिता और बड़े भाई के साथ रहती है. मज़दूरी करके उसके पिता पूरे परिवार का पेट पालते हैं.

रज़िया के माता-पिता बस यही सोच रहे थे, आख़िर कोई मानसिक रूप से विकलांग लड़की के साथ रेप जैसी घिनौनी हरकत क्यों करेगा?


आख़िर वो अपनी बेटी को इंसाफ़ कैसे दिला पाएंगे?

मानवाधिकार के लिए काम करने वाली संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच और हंस फ़ाउंडेशन ने मिलकर देश के आठ शहरों में 17 विकलांग लोगों के साथ हुए यौन हिंसा पर एक रिपोर्ट तैयार की है.

रिपोर्ट लिखने वाली मानवाधिकार कार्यकर्ता निधि गोयल ने कहा, "पुलिस, अस्पताल और कोर्ट. तीनों जगह विकलांग लोग भेदभाव के शिकार होते हैं. क़ानून में जैसी मदद की बात इनके लिए है, वो इन्हें मिलती ही नहीं. 17 में से सिर्फ़ पाँच मामलों में मुआवज़े की घोषणा की गई है. जिसमें से भी मुआवज़े की रक़म हर किसी मामले में पीड़ित के पास नहीं पहुंची है."

रज़िया के मामले पर बात करते हुए निधि ने बताया, "उसका मामला साल 2013 का है. लेकिन 2017 में कोर्ट ने पीड़ित को दो लाख का मुआवज़ा देने का ऐलान किया. लेकिन आज तक रज़िया के हाथ वो रकम नहीं आई."

पूरी प्रक्रिया में यही है सबसे बड़ी विडंबना

निधि के मुताबिक़, "साल 2012 का पोक्सो कानून और 2013 का क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट. दोनों में विकलांग लोगों को यौन हिंसा से बचाने के लिए कई प्रावधान हैं. लेकिन हक़ीकत में न इनके बारे में जागरूकता है और न ही अधिकारियों को इसकी जानकारी.

रज़िया का मामला 4 साल तक कोर्ट में चला. लेकिन सबसे पहले जब रज़िया के माता-पिता पुलिस थाने में रेप की शिकायत दर्ज कराने पहुंचे तो पुलिस ने बात टालने की पूरी कोशिश की.

मानसिक रूप से विकलांग होने की वजह से रज़िया का बयान ही दर्ज नहीं हो पा रहा था.

पुलिस माता-पिता के बयान पर एफ़आईआर दर्ज करने को तैयार नहीं थी.

हालांकि, अस्पताल में रज़िया को काफ़ी मदद मिली. एक स्थानीय एनजीओ लतिका रॉय फ़ाउंडेशन की मदद से रज़िया के रेप की एफ़आईआर दर्ज हुई.

जाँच में पता चला कि रज़िया के बड़े भाई को ट्यूशन पढ़ाने वाले शख़्स ने उसका रेप किया था.

लतिका रॉय फ़ांउडेशन की जो चोपड़ा ने बीबीसी को बताया, "पूरे मामले में सबसे बड़ा चैलेंज था, रज़िया का ख़ुद का बयान. चूंकि रज़िया को बोलने में भी दिक्कत थी, हमने गुड़िया की मदद से उससे सवाल पूछे. इसका जवाब भी उसने गुड़िया के ज़रिए ही दिया. फिर कुछ स्कैच के माध्यम से उसके साथ हुई घटना के छूटे हुए अंश जोड़ने की कोशिश की गई. तब जाकर पूरी कहानी समझ में आई."

पुलिस थाने में अधिकार

यौन हिंसा के मामले में पुलिस के पास जाने पर विकलांग के पास क्या अधिकार होते हैं? इस सवाल पर नामी वकील वृंदा ग्रोवर कहती हैं:

  • विकलांग किसी पुलिस थाने या किसी और जगह पर रिपोर्ट दर्ज करा सकते हैं जो उन्हें सुरक्षित लगती है.
  • किसी ऐसे व्यक्ति को लेकर पुलिस के पास जा सकते हैं जिन पर उन्हें भरोसा हो.
  • अपनी कहानी बताने के लिए किसी प्रशिक्षित व्यक्ति जैसे सांकेतिक भाषा के अनुवादक या विशेष शिक्षक की मदद भी ली जा सकती है.
  • इतना ही नहीं पूरी कहानी कि वीडियो रिकॉर्डिंग कराई जा सकती है.
  • यदि कोई देख नहीं सकता या बहुत कम देख सकता हैं तो आपको चोट पहुंचाने वाले व्यक्ति की पहचान अन्य तरीकों से भी सकते हैं जैसे आवाज़ के जरिए.

थाने के बाद रज़िया के मामले में सबसे ज़्यादा दिक्कत परिवार को कहीं आई तो वो थी अदालत.

रज़िया के परिवार को पता ही नहीं था कि अदालत में मीडिया या अन्य लोगों की उपस्तिथि के बिना, न्यायधीश को वो ये बता सकते हैं कि उनकी बेटी के साथ क्या हुआ था.

परिवार इस बात से भी अंजान था कि किसी दूसरे व्यक्ति, जैसे सांकेतिक भाषा के अनुवादक या विशेष शिक्षक की मदद वो ले सकते थे.

रज़िया के मामले में सबसे बड़ी गलती हुई कि मुआवज़े की माँग न करना.

रज़िया के वकील ने अदालत में मुआवज़े की मांग ही नहीं रखी. जबकि ऐसे मामले में अभियुक्त के बिना पकड़े जाए भी मुआवज़े की रक़म मिल सकती है.

ह्यूमन राइट वॉच और हंस फ़ांउडेशन की रिपोर्ट में यही बात सामने आई है.

छत्तीसगढ़, दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के 17 यौन हिंसा पीड़ित विकलांगो से उनकी आपबीती सुनने का बात वो इस नतीजे पर पहुंचे कि चाहें थाना हो या अस्पताल या कोर्ट या मुआवज़ा, हर जगह उनके लिए एक नई लड़ाई है.

रिपोर्ट में ये बात भी निकल कर सामने आई है कि विकलांगों के साथ यौन हिंसा होने का ख़तरा भी ज्यादा है.


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