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Lok Sabha Speaker Removal Process: लोकसभा स्पीकर को कैसे हटाया जा सकता है? समझिए अविश्वास प्रस्ताव के नियम

Lok Sabha Speaker Removal Process: लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की चर्चा एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में तेज हो गई है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल मौजूदा लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव (Motion of Removal of Speaker) लाने की तैयारी में बताए जा रहे हैं।

विपक्ष का आरोप है कि सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्षी नेताओं को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा और स्पीकर का रवैया निष्पक्ष नहीं है।

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ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि आखिर लोकसभा स्पीकर को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है और यह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव से कैसे अलग है।

Lok Sabha Speaker के लिए अविश्वास प्रस्ताव या हटाने का प्रस्ताव?

अक्सर आम लोगों के बीच यह भ्रम रहता है कि लोकसभा स्पीकर के खिलाफ भी सरकार की तरह अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। लोकसभा स्पीकर के खिलाफ "नो कॉन्फिडेंस मोशन" नहीं, बल्कि "हटाने का प्रस्ताव" लाया जाता है। यह प्रक्रिया भारतीय संविधान में विशेष रूप से तय की गई है और सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव से बिल्कुल अलग है।

Whhat is Article 94: संविधान का अनुच्छेद 94 क्या कहता है?

लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाने से संबंधित प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) में दिए गए हैं। इस अनुच्छेद के तहत लोकसभा स्पीकर को तीन तरीकों से पद से हटाया जा सकता है-

यदि वे लोकसभा के सदस्य नहीं रहते, तो उनका पद स्वत रिक्त हो जाता है।

वे स्वयं त्यागपत्र दे सकते हैं।

लोकसभा के तत्कालीन सभी सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव के जरिए उन्हें हटाया जा सकता है।

Lok Sabha Speaker Removal Process: हटाने का प्रस्ताव लाने की शर्तें

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाना आसान नहीं है। इसके लिए कुछ सख्त शर्तें तय हैं-प्रस्ताव लाने से कम से कम 14 दिन पहले लिखित नोटिस देना अनिवार्य है। इस नोटिस पर कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए। कोई भी सांसद अचानक सदन में खड़े होकर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव नहीं ला सकता।

Lok Sabha Speaker Removal Voting Majority: नोटिस के बाद क्या होता है? कितने बहुमत की जरूरत होती है

जब स्पीकर के खिलाफ हटाने का नोटिस स्वीकार हो जाता है, तो उस दिन सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता स्पीकर स्वयं नहीं करते। उनकी जगह डिप्टी स्पीकर या किसी वरिष्ठ सदस्य को पीठासीन अधिकारी बनाया जाता है। इसके बाद प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान की प्रक्रिया होती है।

स्पीकर को हटाने के लिए विशेष बहुमत (दो-तिहाई) की जरूरत नहीं होती। केवल साधारण बहुमत ही पर्याप्त होता है। यानी सदन में मौजूद और मतदान कर रहे सांसदों में से 50 प्रतिशत + 1 सांसद का समर्थन मिल जाए तो प्रस्ताव पास हो सकता है।

अगर प्रस्ताव पास हो जाए तो?

यदि हटाने का प्रस्ताव पारित हो जाता है-

लोकसभा स्पीकर तुरंत पद से हट जाते हैं।

वे सांसद बने रहते हैं, लेकिन अध्यक्ष नहीं रहते।

इसके बाद लोकसभा नया स्पीकर चुनती है।

क्या कभी लोकसभा स्पीकर को हटाया गया है?

अब तक स्वतंत्र भारत के इतिहास में कभी भी लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पारित नहीं हुआ है। हालांकि कई बार नोटिस दिए गए और बहस भी हुई, लेकिन मामला मतदान तक नहीं पहुंच पाया।

1967: चौथी लोकसभा में डॉ. नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ नोटिस दिया गया। बाद में वे भारत के राष्ट्रपति बने।

1987-88: आठवीं लोकसभा में बलराम जाखड़ के खिलाफ बोफोर्स मामले के दौरान नोटिस दिया गया, लेकिन समर्थन नहीं जुटा।

2001: 13वीं लोकसभा में जी.एम.सी. बालयोगी के खिलाफ नोटिस दिया गया, लेकिन वोटिंग नहीं हुई।

2011: 15वीं लोकसभा में मीरा कुमार के खिलाफ 2G और CWG घोटालों को लेकर नोटिस दिया गया, लेकिन बहुमत नहीं मिला।

2020: 17वीं लोकसभा में ओम बिरला के खिलाफ कृषि कानूनों के दौरान नोटिस की चर्चा हुई, लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं जुट पाया।

लोकतांत्रिक असहमति का प्रतीक

विशेषज्ञों का मानना है कि लोकसभा स्पीकर के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव भारतीय लोकतंत्र में जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक संवैधानिक औजार है। हालांकि अब तक यह ज्यादा तर प्रतीकात्मक हथियार ही साबित हुआ है, क्योंकि कभी भी इसे वास्तविक रूप से पारित नहीं किया जा सका।

वर्तमान हालात में विपक्ष की यह कोशिश संसद में टकराव को और तेज कर सकती है, लेकिन इतिहास गवाह है कि स्पीकर को हटाने का रास्ता बेहद कठिन और राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण रहा है।

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