भारत के जेलों में ऐसा क्या हो रहा है जिसने गृह मंत्रालय को चिंता में डाला, राज्यों को दी ऐसी चेतावनी
Home Ministry On Radicalisation In Jail: आज दुनिया भर में जेलों के भीतर कट्टरपंथ फैलना एक गंभीर चुनौती बन चुका है। भारत में भी इसकी बढ़ती घटनाओं को देखते हुए गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) ने इसे लेकर सख्त रुख अपनाया है। मंत्रालय का मानना है कि समय रहते जेलों में कट्टरपंथ के फैलाव पर लगाम लगाना और उग्र सोच रखने वाले कैदियों का सुधार (De-Radicalisation) जरूरी है, ताकि आंतरिक सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनी रहे।
गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एक विस्तृत गाइडलाइन जारी की है। इसका उद्देश्य जेलों में बंद ऐसे कैदियों की पहचान करना, निगरानी रखना और उन्हें सुधारना है जो कट्टर विचारधारा की ओर झुक रहे हैं या पहले से उग्रपंथी मानसिकता के शिकार हैं।

🔴 क्या कहा गृह मंत्रालय ने?
गृह मंत्रालय ने अपने पत्र में कहा,
"जेलों में कट्टरपंथ एक गंभीर और तेजी से उभरती चुनौती है, जिसे वैश्विक संदर्भ में भी खतरनाक माना गया है। कई बार यह आगे चलकर आपराधिक गतिविधियों की भूमिका बन जाता है।"
गृह मंत्रालय का कहना है कि जेलों में कट्टरपंथ आज दुनियाभर में एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। यह अक्सर आतंकी या आपराधिक गतिविधियों की पहली कड़ी बनता है।

🔴 क्यों पड़ी जरूरत?
गृह मंत्रालय ने पाया कि जेलों में सामाजिक अलगाव (isolation), मानसिक तनाव और अपर्याप्त निगरानी के कारण कुछ कैदी कट्टरपंथी विचारों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। कुछ मामलों में ऐसे उग्र कैदियों ने जेल कर्मचारियों और दूसरे कैदियों पर हमले की साजिशें भी रची थीं।
ऐसे में यह महसूस किया गया है कि जेलों में जो लोग संवेदनशील या प्रभावित होने की स्थिति में हैं, उनके कट्टरपंथी बनने की प्रक्रिया को रोकना और पहले से कट्टरपंथी हो चुके कैदियों को 'डि-रेडिकलाइज' करना (यानि सुधारना) बहुत जरूरी है। यह आंतरिक सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए अहम कदम है।
🔴 जेलों में क्यों खतरनाक होता है कट्टरपंथ?
- बंद और सीमित माहौल -जेलें ऐसी जगह होती हैं जहां कैदी सामाजिक रूप से अलग-थलग रहते हैं।
- समूह में सोच का प्रभाव -कुछ कट्टर विचारधारा वाले कैदी अपने आस-पास के लोगों को प्रभावित कर सकते हैं।
- निगरानी की कमी -जेलों में हर गतिविधि पर नजर रखना हमेशा संभव नहीं होता।
इन हालातों में जो कैदी पहले से अलग-थलग महसूस करते हैं, हिंसक प्रवृत्ति या समाज विरोधी सोच रखते हैं, वे उग्र विचारों की तरफ आकर्षित हो सकते हैं। कई मामलों में ऐसे कैदी जेल कर्मचारियों या दूसरे कैदियों पर हमले की योजना बनाते हैं, या फिर जेल से बाहर आतंकी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं।
🔴 अब क्या होंगे नए कदम?
गृह मंत्रालय ने सात प्वाइंट वाली रणनीति के जरिए राज्यों को जेलों में कट्टरपंथ पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं
- 1. पहचान और जोखिम का आकलन: संदिग्ध गतिविधियों में शामिल कैदियों की पहचान और उनका मूल्यांकन किया जाएगा।
- 2. अलगाव और निगरानी: कट्टरपंथी प्रवृत्ति के कैदियों को बाकी कैदियों से अलग रखकर विशेष निगरानी में रखा जाएगा।
- 3. पुनर्वास कार्यक्रम (Rehabilitation Programmes): काउंसलिंग, शिक्षा और सुधारात्मक कार्यक्रमों के ज़रिए उन्हें सामान्य जीवन की ओर लाने की कोशिश की जाएगी।
- 4. स्टाफ को प्रशिक्षण: जेल कर्मियों को कट्टरपंथ के लक्षणों को पहचानने और सही तरीके से प्रतिक्रिया देने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।
- 5. परिवार से जुड़ाव: परिवार को भी सुधार प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा ताकि कैदी को सामाजिक समर्थन मिले।
- 6. डेटा संग्रहण और शोध: उग्र विचारधारा से जुड़े मामलों पर डेटा इकट्ठा कर रिसर्च के जरिए रणनीतियों को और बेहतर बनाया जाएगा।
- 7. रिहाई के बाद निगरानी: जेल से बाहर आने के बाद भी इन व्यक्तियों की निगरानी और समाज में पुनर्स्थापन सुनिश्चित किया जाएगा।
गृह मंत्रालय का मानना है कि सही मार्गदर्शन और पुनर्वास से उग्र विचारधारा को बदला जा सकता है। इन उपायों से राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को संस्थानिक रूप से मजबूत बनाने में मदद मिलेगी और जेलों के अंदर कट्टरपंथी विचारों का असर कम होगा।
🔴 भारत सरकार का प्रयास -मॉडल जेल मैनुअल और नया कानून
भारत सरकार का हमेशा से यह प्रयास रहा है कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को प्रभावी जेल प्रबंधन और सुधार व्यवस्था के लिए मार्गदर्शन और अच्छे उदाहरण दिए जाएं।
इसी क्रम में 2016 में 'मॉडल प्रिजन मैनुअल' और हाल ही में 'मॉडल प्रिजन एंड करेक्शनल सर्विसेज एक्ट, 2023' सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ साझा किए गए हैं।
इन दस्तावेजों में जेलों में कैदियों के वर्गीकरण, सुधारात्मक उपाय, मनोवैज्ञानिक सहायता, शिक्षा और परामर्श जैसी व्यवस्थाओं पर दिशा-निर्देश दिए गए हैं।
इनका उद्देश्य न केवल कानून का पालन कराना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि जेलें केवल सजा की जगह न होकर सुधार और समाज में दोबारा वापसी की तैयारी का जरिया बनें।
जेलों में कट्टरपंथ का मुद्दा सिर्फ जेल प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक शांति और कैदियों के भविष्य से भी जुड़ा है।
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