क्या है बॉम्बे ब्लड ग्रुप? जिसकी एक हफ्ते में बढ़ गई मुंबई के अस्पतालों में मांग
नई दिल्ली। मुंबई के अस्पतालों में अचानक बेहद दुर्लभ 'बॉम्बे ब्लड ग्रुप' की डिमांड बढ़ गई है। पिछले सप्ताह, मुंबई के नायर अस्पताल में 5 मरीजों के लिए इस ब्लड ग्रुप की डिमांड सामने आई है। हिंदुजा, जे.जे. और टाटा अस्पताल में उपरोक्त ब्लड ग्रुप की जरूरत है। पूरे देश में इस दुर्लभ ब्लड ग्रुप के केवल 292 मेंबर हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर ब्लड डोनेट करते हैं।

अब तक, मुंबई में इस दुर्लभ रक्त समूह की मांग टाटा मेमोरियल अस्पताल में एक कैंसर रोगी और नायर अस्पताल में भर्ती एक महिला के लिए है। अधिकारी सांगली से मुंबई तक एक ब्लड यूनिट लाने की व्यवस्था कर रहे हैं। नायर अस्पताल में एक महिला मरीज की हालत बिगड़ गई और उसका हिमोग्लोबिन काउंट 2 तक जा पहुंचा था। सामान्यतया, हिमोग्लोबिन काउंट 12 या इससे अधिक होता है।
इसके बाद दो डोनर्स से संपर्क किया गया था, लेकिन मरीज की हालत में सुधार नहीं हुआ, जिसके बाद तीसरे डोनर की तलाश की जाने लगी। विनय शेट्टी ने बताया कि महिला की हालत गंभीर बनी हुई है, हमें और अधिक ब्लड डोनर्स की जरूरत पड़ने वाली है। जेजे महानगर ब्लड बैंक में एक अधिकारी ने बताया कि इस ब्लड ग्रुप का रक्त उपलब्ध नहीं था और इसे इकट्ठा करने में भी वक्त लगता है। हम डोनर्स ने तभी संपर्क करते हैं, जब इसकी आवश्यकता होती है।
क्या है बॉम्बे ब्लड ग्रुप?
बॉम्बे ब्लड ग्रुप एक ऐसा दुर्लभ ब्लड ग्रुप है जो 7,600 से अधिक लोगों में ही पाया जाता है। 1952 में सबसे पहले एक डॉक्टर वाई एम भेंडे ने मुंबई (तब बॉम्बे) में इसकी पहचान की थी, जिसके बाद इसका बॉम्बे ब्लड ग्रुप रखा गया। थिंक फाउंडेशन एनजीओ के विनय शेट्टी के अनुसार, पूरे देश में इस ब्लड ग्रुप के 350 मरीज हैं लेकिन आपात स्थिति में ब्लड डोनेट करने के लिए केवल 30 सक्रिय डोनर ही उपलब्ध हैं, बॉम्बे ब्लड ग्रुप नेगेटिव और भी कम लोगों में पाया जाता है।












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