पर कलाम साहब से भी नहीं सुधरी विज्ञान- वैज्ञानिकों की हालत
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) क्या एपीजे अब्दुल कलाम साहब के देश के राष्ट्रपति बनने के बाद देश में साइंस को लेकर सरकारों के रुख में सकारात्मक बदलाव आया?
क्या कलाम साहब के राष्ट्रपति बनने के बाद देश में विज्ञान की शिक्षा, लेबोरेट्रीज की हालत और प्योर साइंस के स्टूडेन्टों की स्थिति में क्या कोई सुधार आया था? उत्तर सकारात्मक मिलना मुश्किल है।
नवभारत टाइम्स के पूर्व ब्यूरो प्रमुख शकील अख्तर कहते हैं कि उनके कार्यकाल में दो प्रधानमंत्री रहे और दोनों का साइंस की ताकत से देश की हालत बदलने का कोई इरादा कभी नहीं दिखा।
नैतिक हस्तक्षेप
राष्ट्रपति के तौर पर कलाम दोनों के लिए बड़ी नैतिक हस्तक्षेप वाली स्थिति में रहे मगर उन्होंने ऐसी किसी नीति के लिए कभी कोई गंभीर पहल नहीं की। शकील अख्तर कहते हैं कि सिर्फ़ वैज्ञानिक होने के कारण अन्य क्षेत्र में सर्वोच्च पद पाने से यह नहीं होता कि आप उस (अपने) क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं को ठीक से समझ रहे हैं और वह आपकी प्राथमिकता में हैं।
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वे कहते हैं कि देश के टाप साइंस इंस्टीट्यूटों में रिसर्च स्कालरों के पास बेसिक सुविधाएं भी नहीं हैं। यंग साइंसटिस्ट करियर के बड़े प्रलोभनों को छोड़कर लैब में रात दिन नए प्रयोगों में लगे रहते हैं। अधिकांश आदर्शवादी होते हैं। राष्ट्रपति कलाम और अन्य बड़े वैज्ञानिक उनके आदर्श हैं। मगर स्कूलों से लेकर उच्च वैज्ञानिक संस्थानों तक हालत खराब है।
खराब साइंस महकमा
पिछले कई सालों से केन्द्र सरकारों में सबसे खराब मंत्रालय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय माना जा रहा है। किसी मंत्री को डम्प करने के लिए! कलाम साहब का आकलन इस आधार पर भी होगा कि अगर वैज्ञानिक होने के कारण उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया तो उन्होंने इस ताकतवर पद का इस्तेमाल विज्ञान की वास्तविक ताकत को बढ़ाने में कितना किया।













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