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गुजरात चुनाव 2022: पाकिस्तान से आकर गुजरात में बसी औरतें पीएम नरेंद्र मोदी से क्या कहना चाहती हैं?

गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए मतदान दो चरणों में होंगे. पहला चरण 1 दिसंबर को और दूसरा चरण 5 दिसंबर को होगा. मतों की गिनती 8 दिसंबर को होगी.

By BBC News हिन्दी
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गुजरात विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र बीजेपी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ज़ोर-शोर से चुनाव प्रचार में लगी हुई हैं. हर पार्टी के उम्मीदवार अपने निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते.

गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए मतदान दो चरणों में होंगे. पहला चरण 1 दिसंबर को होगा. वहीं दूसरा चरण 5 दिसंबर को होगा.

चुनाव के नतीजे 8 दिसंबर को आएंगे. इस बीच बीबीसी के कई पत्रकारों ने गुजरात के अलग-अलग शहरों और इलाक़ों का दौरा किया और जनता के मुद्दे समझने की कोशिश की.

https://www.youtube.com/watch?v=SVYtAlnPZ80

बीबीसा संवाददाता हरिता कांडपाल ने गुजरात के बनासकांठा का दौरा किया और उन परिवारों से मुलाक़ात की जो सालों पहले पाकिस्तान से आकर यहां बस गए थे. पाकिस्तान से आकर शरण लेने वाले हिंदू बनासकांठा में रहते हैं. वहां के शिव नगर इलाक़े में एक हज़ार से ज़्यादा मकान हैं. यहां के लोगों ने अभी भी पाकिस्तान की मूल कला से अपना रिश्ता बनाए रखा है.

यहां रहने वाले लोग आगामी चुनाव के प्रति जागरुक हैं और अपने मताधिकार से वाक़िफ़ भी हैं, लेकिन पिछली सरकारों से और ख़ासतौर पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी कुछ मांगें हैं.

क्या हैं पाकिस्तान से आकर गुजरात में बसे लोगों की मांगें

नैनाबेन
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नैनाबेन

नैनाबेन

शिव नगर में रहने वाली नैनाबेन बताती हैं कि वो साल 1971 में आकर यहां बसी थीं.

वो पाकिस्तान से गुजरात आने के रास्ते में पेश आई मुश्किलों के बारे में बताती हैं, "हमें यहां आने के रास्ते में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. मेरे सिर पर मेरा बच्चा था और कंधे पर ज़रूरी सामान. जब कभी हमें लोग या भीड़ दिखती, हम झाड़ियों में छिप जाया करते थे. भीड़ के जाने के बाद हम बाहर निकलते और क़रीब के गांवों में चले जाते. हम वहां कुछ समय के लिए आसरा लेते थे."

वो आगे कहती हैं, "हमें खाने-पीने की काफ़ी दिक़्क़तें थीं. हमारे बच्चों को भी काफ़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा. हमें चिलचिलाती गर्मी में चलना पड़ता था. पैरों में छाले पड़ गए थे. कई बार खुद को ज़िंदा रखने के लिए हमने पैरों में कपड़े बांधे ताकि चलते रह सकें. वही कपड़ा रात में हमारा तकिया बन जाया करता था. इस तरह हम यहां तक पहुंचे."

भारत पहुंचने के बाद उनके साथ क्या हुआ?

इस सवाल का जवाब देते हुए नैनाबेन कहती हैं, "सरकार ने हमारा काफ़ी साथ दिया. हमें खाने का सामान दिया और कंबल भी दिए. इसके अलावा नौकरियों की पेशकश भी की. हमें कुछ काम मिला जिससे हम अपना जीवन चला सके."

सरकार से क्या कहना चाहती हैं?

नैनाबेन कहती हैं, "भारत में आए हुए हमें कई दशक बीत गए हैं. मैंने हमेशा नरेंद्र मोदी के लिए वोट किया है. सभी लोगों को मकान बनाने के लिए वित्तीय मदद मिली है. मैंने काफ़ी मेहनत की और एक छोटा प्लॉट खरीदा. मैंने फ़ॉर्म भी भरा. नरेंद्र मोदी ने सभी को वित्तीय मदद दी, लेकिन मुझे उनसे कोई मदद नहीं मिली."

वो कहती हैं, "मैंने मकान के लिए तीन बार फ़ॉर्म भरा है ताकि वित्तीय सहायता मिले, लेकिन कोई मदद नहीं मिली. मेरे पति का भी निधन हो चुका है. अधिकारी मेरी कुछ नहीं सुनते."

सुबोबेन
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सुबोबेन

सुबोबेन

सुबोबेन भी शिव नगर में रहती हैं और अपने मताधिकार से पूरी तरह वाकिफ़ हैं. वो बताती हैं, "मैं बीते कई साल से वोट डाल रही हूं. मेरा परिवार भी वोटिंग में हिस्सा लेता है."

हालांकि उन्हें राज्य सरकार से शिकायत भी है. वो कहती हैं कि उन्हें राज्य सरकार से कोई मदद नहीं मिल रही है.

अपनी मांगों का ज़िक्र करते हुए वह कहती हैं, "हमारे पास कोई ज़मीन नहीं है. बच्चे खेतों में मज़दूरी करते हैं. यहां मुश्किल से ही कोई काम मिलता है. मैंने हमेशा नरेंद्र मोदी के लिए वोट किया है. मैं उन्हें वोट देना कभी नहीं भूलती."

बनासकांठा
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बनासकांठा

एक अन्य महिला अपनी परेशानी बताती हैं, "हम बुज़ुर्ग लोग हैं और हमें पेंशन की ज़रूरत है. मुझे कोई मासिक पेंशन नहीं मिल रही. जब मैंने ऑफ़िस में पता किया तो कहा गया कि मेरा नाम लिस्ट में नहीं है. मेरा नाम वोटर लिस्ट में है, लेकिन मुझे ज़रूरी सामान खरीदने के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है."

क्या आपको लगता है कि जब आप पाकिस्तान में थीं तो हालात बेहतर थे?

इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं कि 'वहां हमारी खेती थी और अच्छी कमाई थी.'

वो कहती हैं, "वहां महिलाओं को कमाने के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता था. लेकिन जंग हुई और लोग मारे गए. हम डर गए और अपने घरों से भाग गए. ऐसा इसलिए क्योंकि जैसे ही सेना उस इलाके से हटती, मुस्लिम समुदाय के लोग हम पर हमला कर देते.

इस हमले के डर से हमने अपने घर छोड़ दिए. हमारे गांव में नहर हुआ करती थी. जंग हुई तो स्थानीय मुसलमान आबादी पर हमले किए गए. जंग खत्म होने के बाद स्थानीय मुसलमान हम पर हमला कर देते. इससे बचने के लिए हम भागकर भारत में आ गए."

गुजरात विधानसभा चुनाव
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गुजरात विधानसभा चुनाव

गुजरात विधानसभा चुनाव

गुजरात विधानसभा में कुल 182 सीटें हैं. 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी 99 और कांग्रेस 77 सीटें जीतने में कामयाब रही थी.

एनसीपी को एक, बीटीपी को दो और अन्य को एक सीट पर जीत मिली थी. जबकि राज्य की तीन सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिली थी.

इस बार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी, कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी भी सक्रिय दिख रही है. गुजरात सरकार का कार्यकाल 23 फ़रवरी, 2023 को पूरा हो रहा है.

https://www.youtube.com/watch?v=XsF_TWROqk8

गुजरात में इस बार क्या-क्या मुद्दे हैं?

परंपरागत रूप से, गुजरात में दो मुख्य दलों भाजपा और कांग्रेस के बीच प्रतियोगिता रही है, लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी चुनावी लड़ाई में प्रवेश कर रही है, जो दो मुख्य दलों का गणितीय समीकरण को गड़बड़ा सकती हैं.

हालांकि कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि गुजरात में मुख्य लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही होगी.

वैसे दिलचस्प यह भी है कि इन दिनों 'भारत जोड़ो यात्रा' कर रहे राहुल गांधी की इस यात्रा में ना तो गुजरात शामिल है और ना ही हिमाचल प्रदेश.

वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार में 'नंबर दो' माने जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य गुजरात ही है. गुजरात विधानसभा चुनाव में उनकी प्रतिष्ठा भी दांव पर होगी.

यह चुनाव मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के आधे साल के कार्यकाल के लिए भी जनादेश होगा. कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होकर उपचुनाव में हारने वाले अल्पेश ठाकोर का राजनीतिक भविष्य और हार्दिक पटेल के भविष्य का फैसला भी इसी चुनाव में होगा.

वडगाम से निर्दलीय विधायक और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी भूमिका की भी परीक्षा होगी. देखना होगा कि उनका आरक्षित सीटों पर क्या असर पड़ता है. साथ ही वडगाम सीट पर ओवैसी और केजरीवाल, मेवाणी के लिए क्या परेशानी खड़ी करते हैं.

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क्या कुछ है नया?

गुजरात विधानसभा की 182 सीटों में से 13 सीटें अनुसूचित जाति के लिए और 27 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं.

सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे के मुताबिक, गुजरात की 55 फीसदी आबादी 30 साल से कम उम्र की है, जिसमें 57 फीसदी ग्रामीण इलाकों में और 53 फीसदी शहरी इलाकों में रहती है. इस आबादी ने जीवन के अधिकांश समय में भाजपा को राज्य पर शासन करते देखा है.

इस चुनाव में यदि 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के मतदाता किसी कारणवश मतदान केंद्र पर नहीं पहुंच पाते हैं तो उन्हें घर बैठे मतदान करने की सुविधा दी जा रही है.

मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने मीडिया से कहा कि इस साल गुजरात में 4.83 करोड़ मतदाता पंजीकृत हुए हैं. उन्होंने कहा, "राज्य में 182 सीटों के लिए 51,782 मतदान केंद्र और प्रति मतदान केंद्र 934 मतदाता होंगे."

कुल मतदान केंद्रों में से सर्वाधिक 34,276 मतदान केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों में होंगे. जबकि शहरी क्षेत्रों में 17,506 मतदान केंद्र होंगे.

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