गुजरात विधानसभा चुनाव: मुसलमानों पर बोलना क्या चुनाव में हारना है?

गुजरात दंगे
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गुजरात दंगे

अहमदाबाद के एनजीओ ह्यूमन डेवेलपमेंट एंड रिसर्च सेंटर (एटडीआरसी) ने छह अप्रैल 2016 को कुछ सफ़ाईकर्मियों की भर्ती के लिए एक विज्ञापन निकाला था.

इस विज्ञापन में लिखा था कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, बनिया, पटेल और जैन समुदाय से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी. विज्ञापन के नीचे एनजीओ के निदेशक प्रसाद चाको का हस्ताक्षर था.

सफ़ाईकर्मियों की नौकरी का यह विज्ञापन वायरल हो गया था. इस विज्ञापन में ऊँची जातियों को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी.

इसे लेकर काफ़ी विवाद हुआ और एनजीओ के ऑफिस पर लोगों ने हमला बोल दिया था. हमला करने वालों में कई दक्षिणपंथी संगठनों के साथ कांग्रेस पार्टी के स्टूडेंट विंग एनएसयूआई के लोग भी शामिल थे. प्रसाद चाको को अंडरग्राउंड होना पड़ा था.

प्रसाद चाको से पूछा कि उन्होंने ऐसा विज्ञापन क्यों निकाला था? चाको कहते हैं, ''मैंने पूरी ईमानदारी से विज्ञापन निकाला था. अपर कास्ट में आरक्षण को लेकर विरोध है. ऐसे में यह देखना चाह रहा था कि जो काम दलित सदियों से करते आए हैं, उस काम के लिए ऊँची जातियों को नियुक्त करने की बात की जाए तो कैसा रिएक्शन होगा. रिएक्शन तो पता चला गया.''

राजीव शाह अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वह कहते हैं कि पीसी चाको का प्रयोग बहुत ही दिलचस्प था. उनके विज्ञापन ने सवर्णों की पोल खोल दी.

राजीव शाह कहते हैं, ''एनएसयूआई के लोगों का एचडीआरसी के दफ़्तर पर हमला करना बताता है कि गुजरात कांग्रेस में जातिवादी और सांप्रदायिक सवर्ण भरे हुए हैं. गुजरात चुनाव में 2002 के दंगे के बाद से साफ़ दिख रहा है कि कांग्रेस बीजेपी से डरकर चुनाव लड़ती है. कांग्रेस बीजेपी के हिन्दुत्व और बहुसंख्यकवाद की राजनीति को खुलकर चुनौती देने से कतराती है. उसे लगता है कि अगर वह चुनाव में 2002 के दंगों पर बात करेगी तो उसका नुक़सान हो जाएगा.''

क्या हिन्दू 2002 की बात करने पर बिदक जाते हैं?

क्या वाक़ई ऐसा है कि 2002 के दंगों पर कांग्रेस बात करेगी, तो गुजरात के हिन्दू बिदक जाएँगे और बीजेपी के पक्ष में लामबंद हो जाएँगे?

राजीव शाह कहते हैं, ''कांग्रेस का यह डर वाजिब हो सकता है. मेरा भी मानना है कि गुजरात का शहरी मध्य वर्ग हिन्दू 2002 के गुजरात दंगे से कन्विंस है. ऐसे में कांग्रेस इसका विरोध करेगी तो यह मध्य वर्ग बीजेपी के पक्ष में और मज़बूती से लामबंद हो सकता है. लेकिन एक बात यह भी सच है कि बीजेपी को कांग्रेस इस रणनीति से नहीं हरा सकती है. बीजेपी को हराना है, तो उससे सीधे टकराना होगा. उसी तरह कमोबेश बन जाने से वह हार जाएगी.''

साल 2002 के 27-28 फ़रवरी से गुजरात में दंगा शुरू हुआ था और कई दिनों तक चला.

गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के कोच एस 6 पर हुए हमले के बाद ही पूरे गुजरात में दंगे शुरू हुए थे. गोधरा में ट्रेन के कोच एस 6 में आग लगा दी गई थी, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई थी. मरने वालों में ज़्यादातर अयोध्या से अहमदाबाद लौट रहे कारसेवक थे.

इसके बाद ही गुजरात में दंगे भड़क उठे थे. सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ इन दंगों में कुल 1044 लोग मारे गए, जिनमें 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे.

दिसंबर 2002 में गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए और बीजेपी को उन इलाक़ों में बड़ी जीत मिली जहाँ ज़्यादा दंगे हुए थे.

दंगों से सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़ों की 65 सीटों में से 53 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी.

2002 में बीजेपी को गुजरात विधानसभा की कुल 182 सीटों में से 126 पर जीत मिली थी. इनमें से बीजेपी को 73 सीटें उत्तरी और मध्य गुजरात में मिली थीं.

बीजेपी को सबसे ज़्यादा नुक़सान सौराष्ट्र-कच्छ में हुआ था. इस इलाक़े में बीजेपी के 11 मंत्रियों में से ज़्यादातर अपनी सीट नहीं बचा पाए थे.

दिलचस्प है कि बीजेपी को 2002 में यह बड़ी जीत 50 फ़ीसदी वोट के साथ मिली थी लेकिन कांग्रेस को यह बड़ी हार क़रीब 40 फ़ीसदी वोट के साथ मिली थी.

बीजेपी अब भी इस मुद्दे को लेकर आक्रामक रहती है.

किसी के साथ भेदभाव नहीं

गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन पटेल कहते हैं, "बीजेपी सरकार में किसी के साथ भेदभाव नहीं किया गया है. जहाँ तक बिलकिस बानो की बात है, तो सब कुछ क़ानून के हिसाब से हुआ है. गुजरात में 2002 के दंगे की जो बात करते हैं, वो गोधरा को भूल जाते हैं. कांग्रेस राज में सबसे ज़्यादा दंगे हुए हैं और बीजेपी की सरकार ने दंगों को नियंत्रित किया है. अब हमने तुष्टीकरण की राजनीति पर लगाम लगा दी है. कोई पार्टी तुष्टीकरण की राजनीति की हिम्मत नहीं करती."

बीजेपी का इस मामले पर रुख़ तो समझ में आता है, लेकिन कांग्रेस ऐसा क्यों कर रही है?

अहमदाबाद में सेंटर फ़ॉर सोशल नॉलेज एंड एक्शन के निदेशक और जाने-माने समाज विज्ञानी अच्युत याग्निक कहते हैं- कांग्रेस कैंप को लगा कि कुछ ना भी किया जाए तो लोग बड़ी संख्या में लोग पार्टी को वोट करते हैं. कांग्रेस इस नीति पर चलने लगी कि दंगों के बारे में बात नहीं करनी है.

अच्युत याग्निक कहते हैं, ''इस हार के बाद तत्कालीन कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के सामने पहला विश्लेषण पेश किया गया कि पार्टी को आमतौर पर उन इलाक़ों में हार मिली है, जहाँ मुसलमानों की आबादी 25,000 से ज़्यादा है. कांग्रेस के उम्मीदवार मुसलमानों के इलाक़े में वोट मांगने तक नहीं गए थे. पार्टी ने सॉफ्ट हिन्दुत्व का राह अपनाई लेकिन कांग्रेस को इससे प्रदेश में मज़बूती नहीं मिली. गुजरात में हिन्दुत्व की राजनीति का जवाब हिन्दुत्व विरोधी राजनीति होनी चाहिए थी, लेकिन पार्टी ने सॉफ्ट हिन्दुत्व को अख़्तियार किया और यह आज तक नाकाम है. इस बार तो आलम यह है कि कांग्रेस दूसरे नंबर की लड़ाई लड़ रही है.''

कांग्रेस ने गुजरात चुनाव में राजस्थान के पूर्व मंत्री रघु शर्मा को प्रभारी बनाया है. उनसे पूछा कि 2002 के दंगों के बाद गुजरात में कांग्रेस की राजनीति पर क्या फ़र्क़ पड़ा?

उनका जवाब था, ''हम अतीत में उलझकर नहीं रहना चाहते हैं. 2002 के दंगों से लोग बाहर निकल चुके हैं और अब बात विकास के मुद्दे पर होनी चाहिए. आपको यहाँ बेरोज़गारी, ग़रीबी, असुविधाओं और शिक्षा से जुड़े सवाल पूछने चाहिए.''

राहुल गांधी हिन्दुत्व की राजनीति पर सीधा हमला बोलते हैं, लेकिन गुजरात की प्रदेश इकाई इससे परहेज क्यों करती है?

रघु शर्मा इस सवाल से नाराज़ हो गए और उनका जवाब था, ''राहुल गांधी हिन्दुत्व और हिन्दू के ख़िलाफ़ नहीं हैं. आप लोगों को एजेंडे से बाहर आना चाहिए. हम हिन्दू धर्म के ख़िलाफ़ नहीं हैं. आप हमें सवालों से फँसाना चाहते हैं.''

मुसलमानों का प्रतिनिधित्व

अच्युत याग्निक कहते हैं कि कांग्रेस को तो पहले अपने नेताओं को सैद्धांतिक समझ बढ़ानी चाहिए. कांग्रेस के ज़्यादातर नेताओं को पता नहीं है कि हिन्दुत्व का मतलब हिन्दू धर्म नहीं है.

हिन्दुत्व के ख़िलाफ़ बोलना हिन्दू धर्म के ख़िलाफ़ बोलना नहीं है. याग्निक कहते हैं, ''कांग्रेस में ज़्यादातर नेता राइट विंग के भरे हुए हैं.''

बीजेपी गुजरात में मुसलमानों को टिकट नहीं देती है जबकि राज्य में क़रीब 10 फ़ीसदी मुसलमान हैं. इसके जवाब में कांग्रेस ने भी मुसलमानों की उम्मीदवारी में कटौती शुरू कर दी.

कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में केवल छह मुसलमानों के टिकट दिया था, जिनमें से तीन को जीत मिली थी.

दरियापुर से कांग्रेस के विधायक गयासुद्दीन शेख़ ने हाल ही में मांग की थी कि आबादी के लिहाज से मुसलमानों के कम से कम 18 टिकट मिलने चाहिए, लेकिन पार्टी इतना नहीं दे पा रही है तो कम से कम 10-11 तो दे.

रघु शर्मा से पूछा कि कांग्रेस मुसलमानों को आबादी के लिहाज से टिकट क्यों नहीं दे रही है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ''पार्टी टिकट जीतने वाले उम्मीदवारों को देती है.'' मुसलमानों को टिकट नहीं देने के सवाल पर अब तक बीजेपी यही तर्क देती थी.

अक्तूबर महीने में गरबा के दौरान पत्थर फेंकने के मामले में कुछ मुस्लिम युवकों को सार्वजनिक रूप से सड़क पर बाँधकर पीटा गया था.

कांग्रेस की प्रदेश इकाई इस पर ख़ामोश रही, लेकिन जमालपुर खेडिया से कांग्रेस विधायक इमरान खेड़ावाला और दरियापुर से पार्टी विधायक गयासुद्दीन शेख़ ने इसका विरोध किया था.

खेड़ावाला ने कहा था कि इस मामले पर कांग्रेस की चुप्पी से अल्पसख्यंकों के मन में चिंता बढ़ी है.

'एक जैसे थे सन् 84 के सिख और गुजरात दंगे लेकिन...'

मुसलमानों के लिए बात करना गुनाह?

ज़ुबैर गोपलानी बड़ौदा के सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वह कहते हैं कि मुसलमानों पर गुजरात में बात करना मानों गुनाह हो गया है.

ज़ुबैर कहते हैं, ''बीजेपी से कोई उम्मीद नहीं है. बीजेपी को चुनाव जीतने के लिए मुसलमानों से नफ़रत ज़रूरी है. लेकिन हम कांग्रेस को इस रूप में देखते थे कि वह इस नफ़रत का खुलकर विरोध करेगी लेकिन उसे लगता है कि ऐसा करने से वह चुनाव हार जाएगी. कांग्रेस 2002 के दंगों को भुला देना चाहती है या फिर जानबूझकर याद नहीं करना चाहती है.''

ज़ुबैर गोपलानी कहते हैं, ''कांग्रेस को लगता है कि अगर उसने 2002 के दंगों को लेकर सवाल उठाया तो हिन्दू उसके ख़िलाफ़ एकजुट हो जाएँगे. कांग्रेस की इस सोच की वजह तो यही हो सकती है कि 2002 के दंगों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो अत्याचार हुआ उससे बहुसंख्यक हिन्दू सहमत थे. कांग्रेस शायद इस सहमति से असहमति नहीं जताना चाहती है. अगर ऐसा नहीं है तो उसे खुलकर बोलना चाहिए. हम आम आदमी पार्टी से उम्मीद कर रहे थे लेकिन वह भी मुसलमानों को लेकर बचती ही दिख रही है.''

ज़ुबैर गोपलानी कहते हैं, ''राहुल गांधी आश्वस्त करते हैं. हिन्दुत्व की राजनीति के ख़िलाफ़ वह खुलकर बोलते हैं लेकिन प्रदेश कांग्रेस यूनिट बिल्कुल उलट है. राहुल गांधी सोनिया गांधी और राजीव गांधी से भी ज़्यादा सेक्युलर हैं. यही कारण है कि मीडिया में उनकी छवि पप्पू की बना दी गई है.''

गुजरात में आम आदमी पार्टी के उपाध्यक्ष अर्जुनभाई रठावा कहते हैं कि उनकी पार्टी बीजेपी को कोई ऐसा मुद्दा नहीं देना चाहती है, जिससे वह चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण कर सके.

क्या मुसलमानों के हक़ और प्रतिनिधित्व की बात करना धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना है? राठवा कहते हैं, "बीजेपी इसका ग़लत इस्तेमाल कर लेती है. इसलिए हम चाहकर भी उन मुद्दों को नहीं उठा पाते हैं. लेकिन आम आदमी पार्टी जिन मुद्दों को उठा रही है, उनमें सभी समुदायों की महत्वकांक्षाएँ शामिल हैं."

गुजरात में जिन युवाओं का जन्म साल 2000 में हुआ है, उन्हें तो दंगों के बारे में कोई जानकारी भी नहीं है.

आप की ख़ामोशी

आम आदमी पार्टी भी बिलकिस बानो मामले में पूरी तरह से ख़ामोश है. बिलकिस बानो के बलात्कारियों को राज्य सरकार की सहमति से रिहा कर दिया गया है.

2002 के दंगे में बिलकिस बानो के साथ गैंग रेप हुआ था. तब वह गर्भवती थीं और उनकी तीन साल की बेटी की दंगाइयों ने उनकी आँखों के सामने हत्या कर दी थी

अहमदाबाद की पलक गुजरात लॉ सोसाइटी से बीबीए की पढ़ाई कर रही हैं. 2002 के दंगों में वह महज़ तीन साल की थीं.

उनसे पूछा कि क्या उन्हें 2002 के दंगों के बारे में कुछ पता है? पलक ने कहा कि नहीं उन्हें कुछ भी पता नहीं है. क्या घरवालों उन्हें कभी बताया नहीं या इसके बारे में कुछ पढ़ा नहीं? पलक कहती हैं, ''कुछ ख़ास तो नहीं पता है.''

पलक से जब यह सवाल पूछ रहा था तो वह शाम के वक़्त अहमदाबाद के साबरमती रिवर फ़्रंट पर बैठी थीं. उनसे पूछा कि उन्हें गुजरात में कौन नेता पसंद हैं?

पलक कहती हैं, ''मोदी. देखिए इस रिवर फ्रंट को भी मोदी ने ही बनाया है. गुजरात में बीजेपी मोदी के कारण ही जीत रही है. इस बार भी मोदी के कारण ही जीतेगी.''

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