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अयोध्या में राम मंदिर ज़मीन ख़रीद विवाद के उलझे सवाल- ग्राउंड रिपोर्ट

By BBC News हिन्दी
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अयोध्या में श्रीराम मंदिर परिसर के विस्तार के लिए ख़रीदी गई ज़मीन में कथित घोटाले को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है.

मंदिर निर्माण के लिए अधिकृत श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने इस मामले में जहां अपनी सफ़ाई दी है, और विश्व हिन्दू परिषद ने आरोप लगाने वालों के ख़िलाफ़ मानहानि का दावा करने की बात कही है.

दूसरी ओर, आरोप लगाने वाले और मुखर हो गए हैं, वहीं इन सबके बीच अभी भी कई सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब नहीं मिल सके हैं.

राम मंदिर
Getty Images
राम मंदिर

दो करोड़ रुपये की ज़मीन का सौदा 18.5 करोड़ में

इस पूरे मामले में विवाद का सबसे अहम पहलू यही है. जिन लोगों से श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने 12 हज़ार वर्ग मीटर ज़मीन का सौदा 18.5 करोड़ रुपये में किया, उन्हीं लोगों ने उसी दिन महज़ कुछ देर पहले दो करोड़ रुपये में वही ज़मीन ख़रीदी थी.

श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सचिव और विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता चंपत राय ने इस मामले में कई बार स्पष्टीकरण दिया और साफ़ तौर पर कहा कि ज़मीन ख़रीद में क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया और ज़मीन ख़रीदने से पहले उसकी हर पहलू से जांच की गई, और ज़मीन बाज़ार भाव से कम कीमत पर ख़रीदी गई.

चंपत राय का कहना था, "श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने जितनी भूमि ख़रीदी है, उसे बाज़ार भाव से बहुत कम मूल्य पर खरीदा है. इस भूमि को ख़रीदने के लिए वर्तमान विक्रेतागणों ने वर्षों पूर्व जिस मूल्य पर अनुबंध किया था, उस भूमि को उन्होंने 18 मार्च 2021 को बैनामा (नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया) कराया और उसके बाद ट्रस्ट के साथ अनुबंध किया गया है. ऐसे में किसी तरह का कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है."

https://twitter.com/ChampatRaiVHP/status/1404150206892023809

अयोध्‍या के बाग बजेसी इलाक़े में गाटा संख्‍या 243, 244, 246 की ज़मीन का सर्कल रेट 4800 रुपये प्रति वर्ग मीटर है और उस हिसाब से ख़रीदी गई ज़मीन की क़ीमत क़रीब 5 करोड़ 80 लाख बैठती है.

सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी ने उसे 2 करोड़ रुपये में कुसुम पाठक और हरीश पाठक से 18 मार्च 2021 को ख़रीदा और फिर उसी दिन रामजन्‍मभूमि ट्रस्‍ट को 18.5 करोड़ रुपये में बेच दिया. बताया जा रहा है कि इसके लिए 17 करोड़ रुपये बैंक ट्रांसफ़र के ज़रिए दिए गए हैं लेकिन ये रुपए किनके खातों में गए हैं, यह स्पष्ट नहीं है.

चंपत राय कहते हैं कि यह सौदा पिछले कई साल से चल रहा था और यह सही भी है. सुल्तान अंसारी ने इस ज़मीन का एग्रीमेंट साल 2011 में कुसुम पाठक और हरीश पाठक से दो करोड़ रुपये में किया था लेकिन बैनामा 18 मार्च 2021 को कराया था.

ज़मीन की ख़रीद बिक्री की प्रक्रिया के वाकिफ़ लोग जानते हैं कि पहले एक करार या एग्रीमेंट होता है कि ज़मीन का सौदा अमुक लोगों के बीच तय रकम के लिए होगा, उसके बाद एग्रीमेंट के आधार पर सौदा होता है, अगर सौदा न हो तो एग्रीमेंट तय समय में एक्सपायर हो जाता है, अगर सौदा करने का इरादा फिर भी हो तो उसे रिन्यू करना होता है. ज़मीन की कीमत के भुगतान के बाद जब सौदा पुख्ता हो जाता है यानी मालिक का नाम बदल जाता है तो उस प्रक्रिया को बैनामा कहते हैं.

चंपत राय
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चंपत राय

कई हैं अनुत्तरित सवाल

सवाल उठता है कि इतने लंबे समय बाद भी कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने यह ज़मीन सुल्तान अंसारी और रवि तिवारी को दो करोड़ रुपये में ही क्यों बेची, जबकि इस दौरान एग्रीमेंट का नवीनीकरण भी कराया गया?

दूसरे, ट्रस्ट ने ज़मीन सीधे हरीश पाठक और कुसुम पाठक से ही क्यों नहीं ख़रीदी, बीच में सुल्तान अंसारी और रवि तिवारी को क्यों आना पड़ा?

इस मामले को उठाने वाले सपा नेता तेज नारायण पांडेय उर्फ़ पवन पांडेय कहते हैं कि यदि ट्रस्ट ने ज़मीन सीधे पाठक दंपति से ही ख़रीदी होती तो यह उन्हें काफ़ी कम दाम पर मिल जाती. लेकिन ज़मीन ख़रीद में सुल्तान अंसारी और रवि तिवारी के बीच में आने से ट्रस्ट को इतनी ज़्यादा रकम देनी पड़ी और ये दोनों ख़रीददार कुछ ही मिनटों में 16.5 करोड़ रुपये का मुनाफ़ा कमा गए.

इस सवाल का जवाब भी किसी के पास नहीं है कि सुल्तान अंसारी और रवि तिवारी ने सर्कल रेट से भी आधे मूल्य पर पाठक दंपति से यह ज़मीन कैसे ले ली?

संजय सिंह
BBC
संजय सिंह

ज़मीन ख़रीद में शामिल आठ लोग कहां गए?

18 मार्च 2021 से पहले भी इस ज़मीन का सौदा काफ़ी पेचीदा रहा है जब यह पाठक दंपति के पास आई है. साल 2011 में इस ज़मीन के एंग्रीमेंट में विक्रेता के तौर पर महबूब आलम, जावेद आलम, नूर आलम और फ़िरोज़ आलम के नाम दर्ज हैं और ख़रीदने वालों के तौर पर कुसुम पाठक और हरीश पाठक का नाम लिखा है. यह समझौता एक करोड़ रुपये में हुआ था. साल 2014 में इस एग्रीमेंट को इन्हीं लोगों के बीच नवीनीकरण कराया गया था.

इस दौरान यह मामला कोर्ट में था इसलिए इसकी रजिस्ट्री नहीं हो पाई थी लेकिन साल 2017 में इसकी रजिस्ट्री हो गई. साल 2019 में कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने इस ज़मीन को बेचने के लिए सुल्तान अंसारी समेत आठ लोगों के साथ एग्रीमेंट किया और ज़मीन की कीमत दो करोड़ रुपये लगाई गई.

यह एग्रीमेंट अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से कुछ पहले ही हुआ और बतौर चंपत राय, फ़ैसले के बाद अयोध्या में ज़मीन के दाम आसमान छूने लगे क्योंकि बहुत सारे मंदिर बनने की आश्वस्ति में उसके आसपास ज़मीन ख़रीदने लगे.

इस एग्रीमेंट के दस्तावेजों में दर्ज आठ लोगों के नाम उस वक़्त ग़ायब हो जाते हैं जब इस एग्रीमेंट की रजिस्ट्री होती है और इसी समय उसमें एक नया नाम रवि मोहन तिवारी का जुड़ जाता है.

राम मंदिर
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राम मंदिर

दिलचस्प बात यह है कि रवि मोहन तिवारी पहले इस एग्रीमेंट में बतौर गवाह होते हैं लेकिन रजिस्ट्री के वक़्त वो ज़मीन के मालिक के तौर पर विक्रेता बन जाते हैं.

यही नहीं, दस्तावेज़ में सुल्तान अंसारी के अलावा एग्रीमेंट में शामिल आठ अन्य लोगों में से कुछ लोगों के पते और मोबाइल नंबर भी दर्ज हैं लेकिन सुल्तान अंसारी के अलावा किसी अन्य के मोबाइल नंबर पर उनसे संपर्क नहीं हो सका.

कुछ नंबरों पर फ़ोन करने पर ग़लत नंबर बताया गया तो कुछ नंबर काम नहीं कर रहे थे. यही नहीं, एग्रीमेंट में विश्वविजय उपाध्याय नाम के एक व्यक्ति ज़मीन के 15 फ़ीसद के हक़दार बताए गए हैं.

दस्तावेज़ में उनका मोबाइल नंबर वही है जो कि रवि मोहन तिवारी का है. मोबाइल पर घंटी बजती ज़रूर है लेकिन उसे उठाता कोई नहीं है.

इसके अलावा, कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने सुल्तान अंसारी समेत नौ लोगों के साथ कुल 2.34 हेक्टेयर ज़मीन का एग्रीमेंट किया था लेकिन सुल्तान अंसारी और रवि तिवारी को सिर्फ़ 1.208 हेक्टेयर ज़मीन ही बैनामा की गई है.

यह भी पढ़ें: अयोध्या और राम मंदिर की दक्षिण भारत में कितनी धमक

हरीश पाठक और कुसुम पाठक कौन हैं?

इस पूरे प्रकरण में हरीश पाठक और उनकी पत्नी कुसुम पाठक का नाम काफ़ी प्रमुखता से आ रहा है. एग्रीमेंट और रजिस्ट्री के दस्तावेजों के मुताबिक हरीश पाठक बस्ती ज़िले के रहने वाले हैं.

दस्तावेजों में हरीश पाठक के नाम के साथ हरिदास पाठक भी दर्ज है. इसके अलावा अयोध्या में लोग उन्हें बबलू पाठक और बकरी वाले बाबा के तौर पर भी जानते हैं. लेकिन इस वक़्त अयोध्या से लेकर बस्ती ज़िले में स्थित अपने मूल आवास तक वो कहीं नहीं मिल रहे हैं.

अयोध्या से क़रीब 35 किमी दूर बस्ती ज़िले की हरैया तहसील के पाठकपुर गांव के वो रहने वाले हैं लेकिन कई प्रयासों के बावजूद उनसे न तो मिलना संभव हो सका और न ही कोई बात हो पाई.

अयोध्या प्रेस क्लब के अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र त्रिपाठी कहते हैं कि हरीश पाठक कई साल से ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त का काम करते हैं. महेंद्र त्रिपाठी के मुताबिक, वो अयोध्या में काम-धंधे के सिलसिले में रहते ज़रूर हैं लेकिन मुख्य रूप से अपने गांव में ही रहते हैं.

अयोध्या के कैंट थाने में उनके ख़िलाफ़ धोखाधड़ी और जालसाज़ी के कई मुक़दमे भी दर्ज हैं. एक स्थानीय पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि गिरफ़्तारी से भागने के कारण साल 2018 में उनके घर की कुर्की भी हो चुकी है लेकिन वो पकड़ में नहीं आए.

18 मार्च 2021 को बाग बिजेसी स्थित इस ज़मीन में जो दो सौदे हुए उन दोनों में अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय और श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्ट क्षेत्र के ट्रस्टी डॉक्टर अनिल मिश्र गवाह हैं.

बावजूद इसके मेयर ऋषिकेश उपाध्याय कहते हैं कि हरीश पाठक के बारे में उन्हें ज़्यादा जानकारी नहीं है.

यह भी पढ़ें: अयोध्या में राम मंदिर से आरएसएस को क्या मिला?

वक़्फ़ बोर्ड की ज़मीन हरीश पाठक को कैसे मिली?

अयोध्या में रामजन्मभूमि परिसर से क़रीब चार किमी दूर स्थित बाग बिजेसी की इस ज़मीन का मालिकाना हक़ हरीश पाठक और उनकी पत्नी को कैसे मिला, यह मामला भी विवादों के साये में है.

साल 2011 में इस ज़मीन को पाठक दंपति ने महफ़ूज़ आलम, जावेद आलम, नूर आलम और फ़िरोज़ आलम से एक करोड़ रुपये में ख़रीदा लेकिन उससे पहले यह मामला अदालत में विचाराधीन था और आरोप हैं कि इन चार लोगों को यह ज़मीन बेचने का अधिकार नहीं था.

अयोध्या शहर में रामजन्मभूमि परिसर के पास ही रहने वाले वहीद अहमद कहते हैं, "यह संपत्ति हमारे पूर्वजों ने वक़्फ़ की थी जिसके अनुसार इसकी देख-रेख के लिए परिवार में से ही कोई एक मुतवल्ली चुना जाता था. मुतवल्ली को ज़मीन बेचने का अधिकार नहीं है लेकिन मौजूदा मुतवल्ली महफ़ूज़ आलम के पिता महबूब आलम ने इस ज़मीन को धोखे से अपनी ज़मीन के तौर पर दर्ज करा ली."

वहीद बताते हैं, "इसी ज़मीन को उनके बेटे ने कुसुम पाठक और हरीश पाठक को बेच दिया. इसके अलावा भी कई ज़मीनें उन्होंने बेची हैं. इसके ख़िलाफ़ हमने वक़्फ़ बोर्ड में कार्रवाई के लिए 10 अप्रैल 2018 को एक प्रार्थनापत्र भी दिया था और महफ़ूज़ आलम और उनके तीनों भाइयों के ख़िलाफ़ रामजन्मभूमि थाने में एफ़आईआर भी दर्ज कराई थी."

वहीद अहमद बताते हैं कि वक़्फ़ की इस संपत्ति का मुक़दमा अभी भी अदालत में विचाराधीन है. उनके मुताबिक, "यही वजह है कि साल 2017 में जिस संपत्ति का एग्रीमेंट पाठक दंपति ने सुल्तान अंसारी और अन्य लोगों के साथ किया था, उसका दाख़िल ख़ारिज मार्च 2021 तक नहीं हो पाया था."

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क्या ट्रस्ट को ज़मीन ख़रीद मामले में धोखे में रखा गया?

बाग बिजेसी की यह ज़मीन यूं तो प्राइम लोकेशन पर बताई जा रही है और कहा जा रहा है कि इस समय यहां के दाम आसमान छू रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि यह पूरा इलाक़ा जंगल है और यहां की ज़्यादातर ज़मीनें या तो सरकार की हैं या फिर वक़्फ़ बोर्ड की संपत्ति हैं.

जिस मोहम्मद फायक के ख़ानदान की वक़्फ़ संपत्ति का दावा किया जा रहा है कि इसके दूसरी तरफ़ भी उन्हीं की संपत्ति है.

जो ज़मीन ट्रस्ट ने ख़रीदी है वो अमरूद के बाग हैं और इसके ठीक सामने क़ब्रिस्तान है.

वहीद अहमद कहते हैं, "इस पूरे मामले में अयोध्या के बड़े प्रॉपर्टी डीलर्स शामिल हैं. ज़मीन की वास्तविकता ट्रस्ट के लोगों को नहीं बताई गई. हमें ऐसा लगता है कि ट्रस्ट को धोखे में रखा गया और कुछ लोगों ने ट्रस्ट को ज़मीन दिलाकर मोटी कमाई की है."

लेकिन ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय कहते हैं कि ज़मीन ख़रीदने से पहले उसके सभी पहलुओं को भली-भांति जांचा-परखा गया है. राममंदिर परिसर से इस जगह की दूरी क़रीब चार किमी है.

चंपत राय कहते हैं कि इसे इसलिए ख़रीदा गया है ताकि राममंदिर परिसर के आस-पास जिन लोगों के मकान लिए गए हैं, इस जगह पर उनका पुनर्वास किया जा सके.

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English summary
Ground Report of ayodhya ram mandir land scam
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