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रेप और पॉक्सो केस के जल्‍द निपटारे के लिए सरकार उठा रही ये कदम

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बेंगलुरु। देश में महिलाओं और बच्‍चों के प्रति अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं। जिस पर लगाम लगने के बजाय बढ़ोत्‍तरी हो रही है। इसको लेकर केन्‍द्र सरकार काफी चिंतिंत हैं, वह अपराधियों को जल्‍द से जल्‍द सलाखों के पीछे भेजने की तैयारी कर चुकी है। इसके तहत केंद्र सरकार देश भर में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए 1,023 विशेष त्वरित अदालतें स्थापित करनेक का निर्णय लिया है।

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कानून मंत्रालय द्वारा इन विशेष अदालतों की स्‍थापना की प्रक्रिया दो अक्टूबर से शुरु हो जाएगी। गौरतलब है कि देश में ऐसे 1 लाख 66 हजार से अधिक मुकदमें लंबित हैं। जिसमें वर्षों से पीडि़ता और मासूम न्‍याय पाने के लिए इंतजार कर रहे हैं।

महिलाओं और बच्‍चों को न्‍याय दिलाने के लिए कड़े कानून तो हैं लेकिन कार्रवाई में देरी की वजह से महिलाओं और बच्‍चों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले खुलेआम बेखौफ घूम रहे हैं। इसी को ध्‍यान में रखते हुए केन्‍द्र सरकार ने यह फॉस्‍ट ट्रेक कोर्ट स्‍थापित कर इन लंबित मामलों को जल्‍द से जल्‍द निपटाने की पहल की है।

केन्‍द्रीय कानून मंत्रालय के तहत न्‍याय विभाग द्वारा तैयार किए एक प्रस्‍ताव में कहा गया है कि प्रत्‍येक विशेष अदालत द्वारा हर वर्ष कम से कम ऐसे 165 मामलों के निपटारे की उम्मीद है। देश में ऐसे 1 लाख 66 हजार से अधिक मुकदमें लंबित हैं।

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उच्‍चतम न्‍यायालय के निर्देशों के अनुसार इनमें 389 अदालतें खासतौर से पॉक्सो के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई करेंगी। उम्मीद है कि हर अदालत हर तीन महीनों में 41 से 42 मामलों का और साल में कम से कम 165 मामलों का निपटारा करेगी।

विभाग के मुताबिक देश की विभिन्‍न अदालतों में बलात्कार और पॉक्सो कानून के कुल 1 लाख 66 हजार 8 सौ 82 मामले लंबित हैं। 389 जिलों में पॉक्सो कानून के तहत 100 से अधिक मुकद्दमें दर्ज है।

इसलिए उच्‍च न्‍यायालय के निर्देशों के अनुसार इममें से प्रत्‍येक जिले में एक विशेष पॉक्सो अदालत होनी चाहिए, जहां किसी दूसरे मामले की सुनवाई नहीं होगी।

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पाॅक्‍सों एक्ट

गौरतलब हैं कि पिछले कुछ वर्षों से बच्चों के साथ यौन शोषण की घटना गयी है। इस तरह के मामलों की बढ़ती संख्या देखकर सरकार ने वर्ष 2012 में एक विशेष कानून बनाया था। पॉक्सों एक्ट बच्चों को छेड़खानी, बलात्कार और कुकर्म जैसे मामलों से सुरक्षा प्रदान करता है।

पॉक्सो शब्द अंग्रेजी से आता है। इसका पूरा नाम है प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012 यानी लैंगिक उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012। इस एक्ट के तहत नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराध और छेड़छाड़ के मामलों में कार्रवाई की जाती है। यह एक्ट बच्चों को सेक्सुअल हैरेसमेंट, सेक्सुअल असॉल्ट और पोर्नोग्राफी जैसे गंभीर अपराधों से सुरक्षा प्रदान करता है।

18 वर्ष से कम उम्र के बच्‍चे

18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का यौन व्यवहार इस कानून के दायरे में आ जाता है। यह कानून लड़के और लड़की को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करता है। इस कानून के तहत पंजीकृत होने वाले मामलों की सुनवाई विशेष अदालत में होती है।

बच्चों को सुरक्षा

वर्ष 2012 में बनाए गए इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है। जिसका कड़ाई से पालन किया जाना भी सुनिश्चित किया गया है।

इस अधिनियम की धारा 4 के तहत वो मामले शामिल किए जाते हैं जिनमें बच्चे के साथ दुष्कर्म या कुकर्म किया गया हो। इसमें सात साल सजा से लेकर उम्रकैद और अर्थदंड भी लगाया जा सकता है।

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यहां तक कि अप्रैल 2018 में देश में बच्चियों के साथ बढ़ते रेप के मामलों को देखते हुए मोदी सरकार ने रेप के पहले से मौजूद कानूनों को और सख्त बनाने का फैसला किया था। जिसके तहत आज कैबिनेट की बैठक में पॉक्सो एक्ट में संशोधन संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दी गई। इस अध्यादेश के कानून बन जाने पर रेप के मामलों में फांसी की सजा का प्रवाधान की बात कही गयी थी।

पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के अधीन वे मामले लाए जाते हैं जिनमें बच्चों को दुष्कर्म या कुकर्म के बाद गम्भीर चोट पहुंचाई गई हो। इसमें दस साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

इसी प्रकार पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत वो मामले पंजीकृत किए जाते हैं जिनमें बच्चों के गुप्तांग से छेडछाड़ की जाती है. इसके धारा के आरोपियों पर दोष सिद्ध हो जाने पर पांच से सात साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।

बच्चों को बचाने वाला कानून

पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट को भी परिभाषित किया गया है। जिसमें बच्चे के शरीर के साथ किसी भी तरह की हरकत करने वाले शख्स को कड़ी सजा का प्रावधान है।

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English summary
The Central Government is preparing to set up 1,023 Special Accelerated Courts to expedite the hearing of crime cases against women and children across the country.
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