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ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग: सूचीबद्ध टॉप 300 यूनीवर्सिटी में एक भी इंडियन नहीं?

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बेंगलुरू। तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय के जरिए दुनिया में उच्च शिक्षा का एक प्रतिमान गढ़ने वाले भारत के शिक्षण संस्थानों का स्तर बुरे से बदतर हो गया है। इसकी तस्दीक ग्लोबल यूनिवर्सिटी की नई रैंकिंग करती है, जिसमें टॉप 300 में एक भी भारतीय यूनिवर्सिटी का न होना चौंकता है, जिसके लिए भारत की मौजूदा शिक्षा नीति और भारतीय जीडीपी का महज 5 फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च भी जिम्मेदार हो सकता है।

Indian university

वर्ष 2012 के बाद यह पहला अवसर है जब ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग में एक भी भारतीय शिक्षण संस्थानों को टॉप 300 में जगह नहीं दी गई है। अगर फिर भी फर्क नहीं पड़ता है तो यह आकंड़े थोड़ी खुशी जरूर दे सकते है कि इस वर्ष ग्लोबल रैंकिंग में पूर्व की तुलना में अधिक भारतीय संस्थानों को शामिल किया गया है।

गौरतलब है वर्ष 2018 में ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग में भारत के कुल 49 संस्थान को जगह मिली थी, लेकिन वर्ष 2019 के यह संख्या बढ़कर 56 हो गई है। यानी पिछले वर्ष की तुलना में भारत के 7 और शैक्षणिक संस्थानों को ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग में शामिल किया गया है।

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ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग की लिस्ट के शिखर पर एक बार फिर यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफर्ड का कब्जा बरकरार है और यह लगातार चौथी बार है जब यूनीवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड को टॉप रैंकिंग दी गई है। हालांकि एशिया में चीन की टॉप 2 यूनिवर्सिटीज शुमार हैं। इनमें चीन की Tsinghua यूनिवर्सिटी और पेकिंग यूनीवर्सिटीज को ग्लोबल रैंकिंग में क्रमशः 23वीं और 24वीं पोजिशन हासिल हुई है।

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ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग 2019 में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी, रोपड़ पहली बार में ही टॉप 350 में जगह बनाने में कामयाब हुई है। आईआईटी, रोपड़ इस लिस्ट में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु के साथ है। वहीं, टाइम्स हायर एजुकेशन (टीएचई) की वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 202वें स्थान पर रखा गया है।

भारतीय शैक्षणिक संस्थानों का औकात का पता इससे पता चलता है कि ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग के टॉप 500 में भारतीय यूनिवर्सिटी का वजूद नमूदार हुआ है। टॉप 500 में भारत की छह यूनिवर्सिटियों को जगह मिली है जबकि वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2019 में भारत की कुल पांच यूनिवर्सिटीज को जगह मिली थी।

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उल्लेखनीय है ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैकिंग के लिए 92 देशों की कुल 1,300 यूनिवर्सिटी ने हिस्सा लिया था। रैंकिंग में भारतीय यूनिवर्सिटीज की संख्या बढ़ने से भारत ऐसा पांचवां ऐसा देश बन गया है जिसकी अधिक से अधिक यूनिवर्सिटी को रैंकिंग में जगह दी गई है।

इस बार कुल 10 भारतीय यूनिवर्सिटीज ने पहली बार रैंकिंग में हिस्सा लिया और उन्हें ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग की लिस्ट में दी गई है। हालांकि भारतीय शैक्षिणिक संस्थानों की रैंकिंग में गिरावट के कारणों और रैंकिंग करने वाली संस्थान के मानकों के बारें पड़ताल के बाद ही वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।

सवाल उठता है कि ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग में भारतीय यूनीवर्सिटी की रैंकिंग में गिरावट की असली वजह क्या है। क्योंकि इस वर्ष जारी किए गए रैंकिंग में आईआईएससी, बेंगलुरु की रैंकिंग में गिरावट दर्ज हुई है। आईआईएससी, बेंगलुरू को पहले जहां 251-300 में जगह मिली थी, वहीं इस वर्ष रैंकिंग 301-350 तक पहुंच गई है।

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आईआईएससी बेंगलुरू की रैंकिंग में गिरावट के लिए विभिन्न मानकों को शामिल किया गया है। मसलन, शोध माहौल, पढ़ाई के माहौल और औद्योगिक आय के लिए पैमानों में सुधार पर जोर नहीं देना शामिल है। वैसे बेंगलुरु स्थित यह संस्थान रैंकिंग के मामले में भारत के अन्य संस्थानों के मुकाबले शीर्ष पर है।

हालांकि आईआईएससी, बेंगलुरू के अलावा इस वर्ष छह और भारतीय यूनिवर्सिटीज की रैंकिंग में गिरावट आई है। बाकी ज्यादातर संस्थान की रैंकिंग या तो स्थिर रही है या रैंकिंग में सुधार हुआ है। वहीं,आईआईटी दिल्ली, आईआईटी खड़गपुर और जामिया मिल्लिया समेत कुछ की रैंकिंग में सुधार हुआ है। सवाल फिर भी बना हुआ है कि कभी विश्वगुरू रहे भारतीय यूनीवर्सिटीज का ग्लोबल रैंकिंग में पीछे रहने का क्या कारण है।

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क्या भारतीय जीडीपी का तकरीबन 5 फीसदी शिक्षा क्षेत्र पर खर्च करने वाले वर्तमान सरकार इसके लिए दोषी हैं अथवा भारत में शिक्षा का स्तर गुणवत्ता खो चुका है, लेकिन यह पूरा सच नहीं हो सकता है, यह इसलिए क्योंकि आज भी अमेरिका समेत अन्य विकसित देशों में भारतीय डाक्टरों, इंजीनियरों और प्रबंधकों की डिमांड सबसे अधिक है।

टीएचई रैंकिंग एडिटर एली बॉथवेल तेजी से बढ़ती भारत की युवा आबादी, अर्थव्यवस्था और अंग्रेजी भाषा माध्यम की ओर बढ़ते रूझान को देखते हुए कहती हैं कि वैश्विक उच्चतर शिक्षा में भारत की काफी संभावनाएं हैं, लेकिन यह देखना निराशाजनक है कि ताजा जारी हुए ग्लोबल यूनीवर्सिटी रैंकिंग के टॉप 300 में भी भारत की एक यूनीवर्सिटी को जगह नहीं दी गई। सिर्फ कुछ ही संस्थानों ने प्रगति दर्ज कराई है।

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हालांकि भारत की टॉप यूनिवर्सिटियों की ग्लोबल रैंकिंग में सुधार को लेकर भारत सरकार अपने ठोस इरादे दिखा जा चुकी है, लेकिन माना जाता है कि बढ़ती हुई वैश्विक प्रतियोगिता के बीच उच्च स्तरीय निवेश भी किया जाए।

आमतौर पर सर्वश्रेष्ठ भारतीय संस्थान को पढ़ाई के माहौल और उद्योग जगत से उसके छात्रों को मिलने वाले ऑफर के मामले में अपेक्षाकृत बेहतरीन स्कोर मिलता है, लेकिन जब इंटरनेशनल आउटलुक की बात आती है तो बहुत घटिया परफॉर्मेंस होता है। इसके लिए भारतीय छात्रों को इंटरनेशनल आउटलुक की तरह तैयार नहीं किया जाना है।

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क्योंकि भारतीय इंजीनियरिंग टेस्ट में टॉप रैंकिंग के जरिए एडमिशन और परीक्षा पास करके विदेशों में नौकरी पाने वाले अधिकतर छात्र रूरल और सेमी रूरल बैकग्राउंड से आते हैं, जिनकी अंग्रेजी भाषा में हाथ तंग होता है। भारतीय छात्र अंग्रेजी माध्यम में ही उपलब्ध इंजीनियरिंग के पाठ्य पुस्तकों को पढ़कर जैसे-तैसे पास तो हो जाते हैं, लेकिन जॉब इम्पलॉयमेंट के बाद उनकी पोल खुल जाती है।

यह भी पढ़ें-देशभर की नंबर 1 यूनिवर्सिटी बनी दिल्ली यूनिवर्सिटी

English summary
Once upon a time India became world masters and now one single universities not in capability to get a position in top300 list of Global university rankings. It shows how Indian education system declined
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