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भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म होने की वजह से बदला बारिश का पैटर्न

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बेंगलुरु। साल 2019 में मॉनसून खत्म होने के कई महीनों बाद भी भारत के कई हिस्सों में बारिश हुई। अक्टूबर-नवम्बर के महीने में भी देश के कई शहरों में भारी बारिश हुई। साथ ही बुलबुल और महा जैसे चक्रवातों ने भी भारत पर चौतरफा वार किया। ऐसा केवल इस साल नहीं बल्कि पिछले कई सालों से देखने को मिल रहा है। चेन्नई, कोडगु और केरल की बाढ़ अनियमित बारिश का ही नतीजा थीं। ऐसा क्यों हो रहा है? अगर वैज्ञानिकों की मानों तो भारत व कई अन्य देशों में अनियमित बारिश का कारण भारतीय एवं प्रशांत महासागर हैं, जिसका एक बड़ा हिस्सा दिन पर दिन गर्म होता जा रहा है।

Indian Ocean

इंडो-पैसिफिक ओशियन यानी भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म होने के कारण सम्पूर्ण विश्‍व में बारिश के पैटर्न में बदलाव हो रहे हैं। यह रिसर्च इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी (आईआईटीएम) पुणे के रॉक्सी मैथ्‍यू कोल के नेतृत्व में की गई है।

विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित इस अध्‍ययन में, शोधकर्ताओं ने पाया है कि भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म हिस्से का आकार दुगना हो गया है - पृथ्‍वी पर महासागर के तापमान में यह सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी है। उन्होंने पाया कि महासागर के गर्म हिस्से में हो रही बढ़ोत्तरी ने उस मौसम के उतार-चढ़ाव को बदल दिया है, जिसका स्रोत भूमध्‍य रेखा के ऊपर है। इसे मड्डेन जूलियन ऑस्‍सीलेशन (एमजेओ) कहते हैं। एमजेओ के व्यवहार में बदलाव के कारण उत्तरी ऑस्‍ट्रेलिया, पश्चिम पैसिफिक, अमेजॉन बेसिन, दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण-पूर्वी एशिया (इंडोनेशिया, फिलीपींस और पापुआ न्यू गीनिया) में बारिश बढ़ गई है। उसी दौरान इन्हीं परिवर्तनों के कारण सेंट्रल पैसिफिक, यूनाइटेड स्टेट्स के पश्चिम और पूर्वी हिस्से में (उदाहरण के लिये कैलीफोर्निया), उत्तर भारत, पूर्वी अफ्रीका और चीन के यांगज़े बेसिन में बारिश में गिरावट दर्ज हुई है।

यह अध्‍ययन भारत-अमेरिका के सहयोग से, पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय भारत और यूएस नेश्‍नल ओश्यिानिक एंड एटमॉसफियरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया है, जिसे यूएस नेशनल एकाडमी आफ साइंसेस ने आगे बढ़ाया है। कोल ने अन्य वैज्ञानिकों- पानिनी दासगुप्ता (आईआईटीएम), माइकल मैकफाडेन और चिडोंग ज़ांग (एनओएए), डीह्यून किम (यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन) और तामाकी सुमत्सु (यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो) के साथ मिलकर यह शोध किया।

Cyclone

समुद्र के एक बड़े हिस्से का तापमान औसत से अधिक

भूमध्‍य रेखा के ऊपर पश्चिम की ओर चलने वाले वर्षा बादलों के समूहों के द्वारा एमजेओ का वर्गीकरण होता है। एमजेओ भूमध्‍यरेखा के ऊपर चक्रवात, मॉनसून, और एल नीनो साइकल को नियंत्रित करता है- और कभी-कभी एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका में मौसम की विनाशकारी घटनाओं को अंजाम देता है। भूमध्‍य रेखा के ऊपर महासागर में एमजेओ 12,000 से 20,000 किलोमीटर तक की दूरी तय करता है, खास तौर से भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म हिस्से के ऊपर से, जिसका तापमान आमतौर पर समुद्री तापमान 28°C से अधिक रहता है।

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कार्बन उत्सर्जन के कारण हाल ही के दशकों में भारतीय-प्रशांत महासागर का गर्म हिस्सा और अधिक गर्म हो रहा है और तेज़ी से इसका विस्तार हुआ है। 1900-1980 तक महासागर के गर्म हिस्से का क्षेत्रफल 2.2 × 107 वर्ग किलोमीटर था। 1981-2018 में इसका आकार बढ़ कर 4 × 105 वर्ग किलोमीटर हो गया, जोकि कैलिफोर्निया के क्षेत्रफल के बराबर है।

समुद्र के ऊपर ज्यादा दिन टिक नहीं पा रहे बादल

सम्पूर्ण भारतीय-प्रशांत महासागर गर्म हो गया है, इसमें सबसे गर्म पानी पश्चिमी प्रशांत महासागर में है, जिससे तापमान में अंतर पैदा होता है, जो भारतीय महासागर से नमी को साथ लेकर वेस्‍ट पैसिफिक मैरीटाइम कॉन्टीनेंट तक ले आता है, और यहां पर बादल बनते हैं। इसके परिणामस्वरूप एमजेओ का जीवनचक्र बदल गया है। भारतीय महासागर पर एमजेओ के बादलों के बने रहने का समय औसतन 19 दिन से करीब 4 दिन घट कर औसतन 15 दिन हो गया है।

पश्चिमी प्रशांत पर यह 5 दिन बढ़ गया है (औसतन 16 दिन से बढ़कर 21 दिन हो गया है)। एमजेओ बादलों के भारतीय महासागर और पश्चिमी प्रशांत सागर पर बने रहने के समय में बदलाव ही है जिसके कारण पूरी दुनिया के मौसम में परिवर्तन हुआ है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

इस अध्‍ययन का हिस्सा रहे यूएस नेश्‍नल ओश्यिानिक एंड एटमॉसफियरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के वरिष्‍ठ वैज्ञानिक माइकल मैकफाडेन ने लिखा, है कि मौसम के सटीक अनुमान को लगाने के लिये समन्यवयक अंतर्राष्‍ट्रीय प्रयास चल रहे हैं, जो दो से चार हफ्ते में आगे आयेंगे और इस संस्‍था की सफलता के लिये एमजेओ एक महत्वपूर्ण कुंजी है। उन्होंने आगे लिखा, "हमारे द्वारा निकाले गये निष्‍कर्ष यह पता लगाने के लिये एक वेचनात्मक मानदंड हैं कि मौसम के विस्तारित भाग के अनुमान के लिये किस कंप्यूटर मॉडल पर भरोसा करें। यह उनकी क्षमता और एमजेओ के बनावटी व्यवहार और बदलते हुए पर्यावरण पर निर्भर करता है।"

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वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्‍यू कोल ने कहा कि क्लाइमेट मॉडल के इस बनावटी रूप से यह पता चलता है कि यह सब भारतीय-प्रशांत महासागर में निरंतर बढ़ती गर्मी है, जो भविष्‍य में पूरी दुनिया में बारिश के पैटर्न में बदलाव करेगा," कोल ने कहा। "इसका मतलब हमें हमारे महासागर पर नज़र रखने वाले निरीक्षण यंत्रों को अत्याधुनिक बनाने की जरूरत है, ताकि मौसम में होने वाले परिवर्तन का सटीक अनुमान लगाया जा सके, और गर्म होती दुनिया के कारण भविष्‍य में आने वाली चुनौतियों का भी कुशलतापूर्वक अनुमान लगाया जा सके।

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English summary
A new paper led by Dr Roxy Koll Mathew from the Indian Institute of Tropical Meteorology finds that rainfall patterns across the globe are likely to change due to rapid warming of the Indo-Pacific ocean.
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