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गांधी@150: टॉयलेट-एक वायलेंट स्टोरी पर कितने शर्मिंदा होते गांधी?

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नई दिल्ली। अक्षय कुमार अभिनीत टॉयलेट- ए लव स्टोरी फिल्म बनी तो 2017 में थी लेकिन इस कथानक के असल हीरो महात्मा गांधी थे। 1934 में ही गांधी जी ने लोगों को शौचालय का महत्व समझा दिया था। वे खुले में शौच को ठीक नहीं मानते थे लेकिन कभी किसी पर जोर- जबर्दस्ती नहीं की। उन्होंने जीवन में स्वच्छता को जरूरी माना लेकिन कभी इसके नाम पर आडम्बर नहीं किया। आज स्वच्छता मिशन के नाम पर काम कम और दिखावा अधिक है। खुले में शौच से मुक्त गांव दिखाने की होड़ मची हुई है। आंकड़े जुटाने के लिए अच्छे-बुरे की परवाह नहीं। इसके नाम पर अत्याचार भी शुरू हो गया है। गांधी जयंती के एक हफ्ता पहले मध्यप्रदेश के शिवपुरी में दो दलित किशारों को इस लिए पीट-पीट कर मार दिया गया क्यों कि वे खुले में शौच कर रहे थे। बापू की 150 वीं जयंती तो जरूर मनेगी लेकिन क्या हम इसके लायक हैं?

गांधी जी का शौचालय

गांधी जी का शौचालय

वर्धा के सेवाग्राम आश्रम में बापू जिस कुटिया में रहते थे उसमें पांच कमरे थे। कच्ची दीवारों और बांस - फूस से बनी इस कुटिया में एक शौचालय भी। शौचालय के एक कोने में रैक बना था जिस पर अखबार ऱखे जाते थे। समय का सदुपयोग करने के लिए गांधी जी अक्सर शौचालय में अखबार पढ़ते थे। वे वक्त के बहुत पाबंद थे। शौचालय में कुछ उंचाई पर एक खिड़की थी। बहुत जरूरी होने पर वे इस खिड़की से बात भी करते थे। गांधी जी ने 85 साल पहले ही खुले में शौच से मुक्ति का अलख जगाया था। वे अपना शौचालय खुद साफ करते थे। खुले में शौच से वे खुद दूर रहे, दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित किया लेकिन कभी किसी पर जोर-जबर्दस्ती नहीं की।

खुले में शौच का गांधी विरोध

खुले में शौच का गांधी विरोध

1915 में हरिद्वार में कुंभ मेला का आयोजन हुआ था। महात्मा गांधी इस मेला में सफाई संगठन के एक स्वयंसेवक के रूप में पहुंचे थे। वे भक्तों की पवित्रता से तो बहुत खुश हुए लेकिन दूसरी तरफ उनकी गंदी आदतों से बहुत आहत हुए। पवित्र नदियों के तट पर असंख्य लोगों के मल-मूत्र त्याग को देख कर उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने 1916 के मिशनरी सम्मेलन में पहली बार गांवों की स्वच्छता पर अपने विचार रखे थे। 1917 में महात्मा गांधी जब नील की खेती करने वाले किसानों की समस्या सुलझाने बिहार के चम्पारण गये थे तो सबसे पहले उन्होंने स्वच्छता और शिक्षा पर जोर दिया था। 1920 में गांधी जी ने गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की थी। यहां शिक्षक, छात्र और स्वयंसेवक खुद की साफ -सफाई करते थे। 1925 में उन्होंने अपनी पत्रिका ‘यंग इंडिया' के एक अंक में लिखा था, देश में भ्रमण के दौरान मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ गंदगी को देख कर हुई। कई लोग गांधी जी से उनके आश्रम में रहने की इच्छा जाहिर करते थे। उनकी एक ही शर्त होती थी कि वे खुद आश्रम की सफाई करेंगे और अपने शौच का वैज्ञानिक ठंग से निस्तारण भी करेंगे। उनको अपनी बात मनवाने के लिए कभी बल प्रयोग की जरूरत ही नहीं पड़ी।

    Gandhi Jayanti : सबको बराबर मानते थे Mahatma Gandhi, Communalism पर ये सोच थी उनकी | वनइंडिया हिंदी
    अब तो आफत में जान

    अब तो आफत में जान

    गांधी जी के राजनीति दर्शन में सफाई भी एक अहम विचार है। उन्होंने गंदगी और गरीबी से लड़ने का नारा दिया था। लेकिन आज क्या हो रहा है। मध्य प्रदेश की घटना तो हाल की है। दो साल पहले इस मसले पर राजस्थान में भी एक व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी थी। पिछले साल दिसम्बर में हरिय़ाणा के जिंद में एक व्यक्ति की इसलिए हत्या कर दी गयी क्यों कि वह खुले में लघुशंका का विरोध कर रहा था। झारखंड के पलामू में भी इसी साल मार्च में एक व्यक्ति की गला दबा कर हत्या कर दी गयी थी। अहिंसा के पुजारी गांधी ने सपने भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनके विचारों को रक्तरंजित कर दिया जाएगा।

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    English summary
    Gandhi 150: How Mahatma Gandhi will react on Murder of 2 Dalit kids for defecating in open?
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