बिहार के बाढ़ पीड़ितों की फिक्र 'लगता है खाना-पानी के बिना मर जाएंगे'
बिहार में बाढ़ से मरने वालों का सरकारी आंकड़ा 78 तक पहुंच गया है. करीब 66 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हैं. 130 राहत शिविरों में एक लाख से अधिक लोगों ने शरण ली हुई है.
ये अपडेट बिहार आपदा प्रबंधन विभाग ने जारी किया है.
बीते तीन दिन में बाढ़ का दायरा तेज़ी से फैला है और जान-माल का नुकसान हो रहा है. बाढ़ की चपेट में रोज़ाना नए-नए इलाक़े आ रहे हैं. बाढ़ में घर छोड़ चुके कई लोग अब सामान्य जिंदगी दोबारा जीने की चिंता में घुल रहे हैं.
17 जुलाई को मरने वालों की संख्या 67 थी, जबकि प्रभावित लोगों की संख्या करीब 47 लाख थी. वहीं 16 जुलाई को प्रभावितों की संख्या लगभग 26 लाख और मौतों की संख्या 33 थी और 18 जुलाई को प्रभावित लोगों की संख्या करीब 55 लाख हो गई.
हैरान करने वाला तथ्य ये है कि 16 जुलाई को राहत और बचाव के लिए 125 मोटरबोटों के साथ एनडीआरएफ़/एसडीआरएफ के 796 कर्मचारियों को लगाया गया था और जब प्रभावितों की संख्या 55 लाख पहुंच गई तब भी उतने ही राहतकर्मी हैं.
16 जुलाई को 185 शिविरों में करीब एक लाख तेरह हज़ार लोग रह रहे थे, लेकिन गुरुवार तक विस्थापितों की संख्या लगभग दोगुनी बढ़ गई है और शिविरों की संख्या घटकर 130 हो गई है.
ऐसा क्यों हुआ? क्या प्रभावित लोग अब राहत शिविरों से जा रहे हैं? या फिर आ ही नहीं रहे.
बिहार सरकार के आपदा विभाग की ओर से लगाए गए राहत शिविरों की हक़ीक़त जानने के लिए हम गुरुवार को झंझारपुर से गुजरने वाले नेशनल हाईवे-27 पर पहुंचे.
हाईवे पर ज़िंदगी
एक तरफ का रास्ता ब्लॉक था. डिवाइडर पर लाइन से तंबू लगे थे. इनमें आसपास के गांवों के लोगों ने शरण ली हुई थी. दूसरी तरफ के रास्ते से ही वाहनों की आवाजाही हो रही थी.
शरणार्थियों में अधिकतर झंझारपुर के कन्हौली और बिदेसरस्थान गांव के लोग थे. यह इलाक़ा नरुआर पंचायत में पड़ता है. यहीं कमला बलान के पास पिछले शनिवार को चार जगहों पर तटबंध टूटे जिसके बाद तबाही मच गई.
पिछले शनिवार की रात इलाक़े में सैलाब आ गया आया. लोगों के घरों में मिनट भर के अंदर डूबने तक पानी पहुंच गया. कितने बह गए इसका अंदाजा नहीं. जो बच गए हैं वे हाइवे पर शरण लिए हुए हैं.
उनके पास बची रह गई हैं कुछ बांस-बल्लियां, थोड़े से बर्तन, धूप और बारिश से बचने के लिए प्लास्टिक की पन्नी, मवेशी और एकाध कपड़े.
हाइवे से अपने डूबे घरों को दिखाते हुए लोगों के चेहरों पर छाई उदासी बढ़ जाती है. वे शनिवार की उस काली रात को याद करने लगते हैं जब इतनी तेजी से पानी आया था कि उन्हें संभलने तक का मौका नहीं मिल पाया.
एक तंबू में बिदेसरस्थान के बुजुर्ग सुंदर यादव अपने नाती और पत्नी के साथ सड़क पर बैठे थे.
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पीने के पानी के लिए तरस रहे लोग
वो कहते हैं, "पानी तो हमारे यहां हर साल आता है, लेकिन जैसे इस बार आया, पहले कभी नहीं आया था. हम लोग कुछ बचा नहीं सके सिवाय उसके जो आपको यहां दिख रहा है."
प्रभावित लोगों के लिए सबसे बड़ी समस्या भोजन और पीने के पानी की है. राहत शिविरों में सरकार की ओर सामुदायिक रसोई के मार्फत इंतजाम किया गया है.
लेकिन जो लोग अभी तक गांव के अंदर हैं उनके लिए पीने के पानी की समस्या सबसे अधिक है क्योंकि सारे जल स्त्रोत बाढ़ के पानी के अंदर डूबे हुए हैं.
एनडीआरएफ़ की नावों से पानी और खाना पहुंचाया जा रहा है, मगर खुद एनडीआरएफ़ के अधिकारी मानते हैं कि ये पर्याप्त नहीं है.
बिदेसरस्थान के पास चल रहे राहत शिविर में दोपहर दो बजे तक खाना नहीं बना था. सामुदायिक रसोई में पंचायत के स्कूलों के शिक्षक और रसोइए खाना बनाने में जुटे हुए थे.
रसोई में केवल चावल और दाल का ही स्टॉक था. वो भी स्कूल से आया था. दोपहर के भोजन में भी यही परोसा जाता है.
बाढ़ में सब तबाह
रसोई के प्रभारी प्रताप नारायण झा कहते हैं, "सभी सामुदायिक रसोई शिक्षक और रसोइये ही मिलकर चला रहे हैं. अनुमडंल और जिला प्रशासन की ओर से इसकी व्यवस्था की गई है. हमारे पास स्कूल में जितना मध्याह्न भोजन के लिए स्टॉक था वो लेकर आए हैं."
रसोई से 10 कदम की दूरी पर ही लीला देवी तंबू में अपने बच्चों के साथ बैठीं खाने का इंतजार कर रही थीं.
वो कहती हैं, "देह ढीला पड़ रहा है अब. रात में भी करीब डेढ़ बजे खाना मिला था. पानी सुबह 10 बजे के बाद आया है. सबकुछ बह चुका है. मैं अपना घर देखने गई थी."
वो कहती हैं,"अब लगता है खाना-पानी के बिना मर जाएंगे. जब तक यह (रसोई) चल रहा है तब तक मिल भी जा रहा है. जब अपने घरों में जाएंगे को कुछ नहीं रहेगा."
थोड़ी ही दूर पर एक और तंबू था जिसमें रह रहे परिवार के एक सदस्य की बाढ़ से मौत हो गई.
20 साल के लालू यादव घर में कमाने वाले अकेले थे. सोमवार को घर से सामान लाने के लिए जा रहे थे. उसी दौरान बाढ़ के पानी में बह गए.
लालू के पिता कहते हैं, "घर में क्या बचा, नहीं बचा, कुछ भी नहीं पता. जब से बेटा डूबा तब से किसी की हिम्मत नहीं हुई दोबारा घर जाने की."
वो बताते हैं "सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिली. बस यही एक पन्नी मिली है, जिससे तंबू बनाए हैं. घर से कुछ ला नहीं सके. कल जब लालू की लाश मिली थी तो उसको भी ऐसे ही किनारे रखकर जलाना पड़ा."
करीब तीन बजे सामुदायिक रसोई में खाना बनकर तैयार हुआ. लेकिन मुसीबत ये थी कि इतने सारे लोगों को एक साथ खिलाया कैसे जाए. चिलचिलाती धूप और टेंट में भी जगह कम थी.
अब तक नहीं मिला मुआवज़ा
बुधवार को बिहार विधानमंडल में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि "सभी बाढ़ प्रभावितों को मुआवज़े के तौर पर छह-छह हजार रुपए दिए जाएंगे." ये पैसे उन्होंने 24 घंटे के अंदर देने के बात कही थी.
लेकिन ये रकम गुरुवार तक नहीं मिली थी. राहत शिविर का मुआयना करने आए झंझारपुर के एसडीओ अंशुल अग्रवाल ने कहा, "अभी तो प्रभावितों को चिह्नित करने का काम ही चल रहा है. आधार कार्ड से लिंक कराकर एक डाटाबेस तैयार किया जाएगा. उसके बाद ही मुआवजा दे पाएंगे. चिह्नित करने में कम से कम तीन-चार दिन लगेंगे."
लेकिन क्या इन छह हजार रुपयों में राहत शिविरों में रहने वाले लोगों का जीवन आगे बढ़ पाएगा?
चुनर देवी कहती हैं, "घर ही डूब गया, बह गया, तो बचा क्या. सबकुछ ही खत्म हो गया. यह छह हजार भी कब मिलेगा, नहीं मिलेगा, कोई पता नहीं. और छह हजार में क्या ही कर लेंगे हम, क्या इतने में फिर से घर बन सकता है?"
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