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देश का पहला दृष्टिहीन IAS अधिकारी जिसने 3 बार खेला क्रिकेट विश्वकप, अब इस जिले में लड़ेगा कोरोना से जंग

By अशोक कुमार शर्मा
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नई दिल्ली। बिहार के रहने वाले एक IAS अधिकारी ने शायद ठान रखी है कि उसे रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड तोड़ना है। वह कामयाबियों की उस बुलंदी पर हैं जिसकी देश में शायद ही कोई IAS बराबरी कर सके। वे देश के पहले ऐसे IAS अधिकारी हैं जिसने तीन बार विश्वकप क्रिकेट प्रतियोगिता खेली है। वे भारत के पहले दृष्टिबाधित IAS अधिकारी हैं। अब जब कोरोना की महामारी चरम पर है तो उन्हें इस महाविपदा से निबटने के लिए एक जिले की कमान सौंपी गयी है। इससे उनकी प्रतिभा, क्षमता और योग्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इनकी राह में कदम-कदम पर मुश्किलों के पहाड़ खड़े होते रहे, लेकिन हर बार वे नये इरादों के साथ इसे लांघते रहे। उन्हें झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने औद्योगिक शहर बोकारो का नया उपायुक्त (डीसी) बनाया है। झारखंड में कोरोना का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। इस विकट परिस्थिति में एक नेत्रहीन IAS अधिकारी के जिले की कमान सौंपना एक अभूतपूर्व फैसला है। सुप्रीम कोर्ट ने इस IAS अधिकारी के लिए कहा था, जीवनपथ पर आगे बढ़ने के लिए दृष्टि नहीं दृष्टिकोण जरूरी है, जो कि इनमें विशिष्ट रूप से विद्यमान है।

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    Rajesh Kumar: India's first blind IAS officer who had played 3 Cricket World Cup's | वनइंडिया हिंदी
    विलक्षण प्रतिभा के धनी राजेश

    विलक्षण प्रतिभा के धनी राजेश

    विलक्षण प्रतिभा के धनी इस IAS अधिकारी का नाम है राजेश कुमार सिंह। वे 2007 बैच के आइएएस अधिकारी हैं। वे पटना के रहने वाले हैं। उनके पिता रवीन्द्र कुमार सिंह पटना सिविल कोर्ट में अधिकारी हैं। राजेश का पैतृक गांव पटना जिले के धनरुआ प्रखंड में है। उनके IAS बनने की कहानी उसी तरह है जैसे कोई हथेली पर सरसो उगा ले। राजेश को बचपन से पढ़ने और खेलने में समान रूप से दिलचस्पी थी। 1990 में जब वे छह साल के थे तब क्रिकेट खेलने के दौरान एक तेज गेंद उनकी आंखों पर लग गयी थी। इस हादसे ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली। उनकी पढ़ाई और खेल, दोनों के सामने सवाल खड़ा हो गया। शुरू में तकलीफ तो हुई लेकिन धीरे -धीरे वे मंजिल की तरफ बढ़ते रहे। ब्रेल लिपि से पढ़ाई शुरू की। जिस क्रिकेट ने उनकी आंखें छीनी थी उससे भी मोहब्बत कायम रखी। वे दृष्टबाधित क्रिकेट खेलने लगे। उन्होंने पढ़ने में भी मुकाम बनाया और क्रिकेट में भी।

    हादसे के बाद यूं बदली जिंदगी

    हादसे के बाद यूं बदली जिंदगी

    राजेश सिंह के पिता चूंकि एक अधिकारी थे इसलिए उनकी पढ़ाई-लिखाई कायदे से शुरू हुई। उन्हें देहरादून के मॉडल स्कूल में भेजा गया। कॉलेज की पढ़ाई के लिए वे दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंचे। डीयू से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने जेएनयू में प्रवेश के लिए इंट्रेस टेस्ट दिया। सफल रहे। यहां उन्होंने इतिहास विषय में एमए की डिग्री ली। फिर वहीं से जेआरएफ करन लगे। जेएनयू ही वह टर्निंग प्वाइंट है जिसने राजेश की जिंदगी को एक बारगी से बदल दिया। उनका आत्मविश्वास पहले से और बढ़ गया। जेएनयू की उच्चस्तरीय शोध प्रवृति, वहां का वातावरण और सिविल सर्विसेज को लेकर छात्रों के बीच होड़ ने राजेश को एक और बाजी जीतने के लिए प्रेरित किया। वे 2006 की यूपीएससी की परीक्षा में बैठे। सफल भी हुए। वे दिव्यांग श्रेणी (डिसएबल कैटेगरी) में तीसरे स्थान पर रहे। उन्हें रैंक के हिसाब से आइएएस मिलना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसके बाद उन्हें अपना हक लेने के लिए एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।

    लड़ कर ली IAS अफसरी

    लड़ कर ली IAS अफसरी

    2006 में सिविल सर्विसेज एग्जाम पास करने के बाद राजेश को 2007 बैच का आइएएस अफसर होना चाहिए था। लेकिन चयन नहीं किया किया। पहले बताया गया कि शत प्रतिशत नेत्रहीनता पर आइएएस सेवा नहीं दी जा सकती। फिर उन्हें बताया गया कि डिसएबल कैटेगरी में केवल एक पद था जिस पर पहले रैंक वाले की नियुक्ति कर ली गयी। सरकार के इस रवैये से राजेश समेत उन सभी सफल दिव्यांग अभ्यर्थियों में रोष पैदा हो गया। इस परीक्षा में रवि प्रकाश नामक एक दिव्यांग भी सफल हुए थे। उनको छठी रैंक मिली थी। उन्होंने अपनी नियुक्ति के लिए दिल्ली हाईकोर्ट कोर्ट में गुहार लगायी। रवि प्रकाश ने 2008 में केस फाइल की थी। करीब दो साल तक कोर्ट में सुनवाई चली। 2010 में कोर्ट ने रवि के पक्ष में फैसला सुनाया। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2010 में यह फैसला दिया कि सरकार 2007 बैच के सभी छह सफल डिसएबल कैंडिडेट की नियुक्ति सुनिश्चित करे। इस आधार पर रवि प्रकाश को छह सप्ताह में ही नियुक्ति पत्र मिल गया। लेकिन इसके बावजूद राजेश को नियुक्ति के लिए बुलावा नहीं आया। जब कि उन्होंने 2009 में इसके लिए कोर्ट में केस कर रखा था। तब राजेश ने सितम्बर 2010 में सुप्रीम कोर्ट में न्याय के लिए गुहार लगायी। लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद दिसम्बर 2010 में राजेश को भी नियुक्ति पत्र मिल गया। राजेश के पक्ष में फैसला देते समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, आइएएस अधिकारी होने के लिए दृष्टि से अधिक दृष्टिकोण की जरूरत है।

    देश के पहले दृष्टिबाधित IAS

    देश के पहले दृष्टिबाधित IAS

    राजेश ने 2006 में यूपीएससी कम्पीट की थी। सरकारी अफसरों की हठधर्मिता के कारण उन्हें 2010 में नियुक्ति पत्र मिला। नियमानुसार राजेश ही देश के पहले दृष्टिबाधित IAS अधिकारी हैं। पहले उन्हें मेघालय कैडर मिला था। लेकिन जब उन्होंने भाषा संबंधी समस्या का हवाला देकर कैडर बदलने के लिए आवेदन दिया तो उन्हें झारखंड कैडर में स्थानांतरित कर दिया गया। अब वे बोकारो के नये उपायुक्त हैं। उत्तर प्रदेश के दृष्टिबाधित कृष्ण बिहारी तिवारी 2008 में आइएएस बने थे। ने मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारी हैं। एक अन्य दृष्टिबाधित अजीत कुमार यादव भी 2008 में ही सफल हुए थे। उन्हें रैंक से कम का जॉब ऑफर किया था। एक जटिल कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद आखिरकार उन्हें भी 2012 बैच के आइएएस की मान्यता दी गयी। महाराष्ट्र की प्रांजल पाटिल देश की पहली दृष्टिबाधित महिला आइएएस हैं। वे 2017 बैच की अधिकारी हैं। इनको भी कोर्ट में जाने के बाद ही हक मिला था।

    तीन विश्व कप क्रिकेट खेले राजेश

    तीन विश्व कप क्रिकेट खेले राजेश

    राजेश ने नेत्रहीन क्रिकेट में भी बड़ा मुकाम बनाया। बिहार के एक छोटे से गांव धनरुआ से निकल कर उन्होंने राष्ट्रीय क्रिकेट में अपना सिक्का जमाया। वे अच्छे गेंदबाज थे। नेत्रहीन भारतीय क्रिकेट टीम के वे नियमित सदस्य रहे। उन्होंने 1998, 2002 और 2006 के नेत्रहीन विश्वकप क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया। नेत्रहीन विश्वकप क्रिकेट की शुरुआत 1998 में हुई थी। यह प्रतियोगिता दिल्ली में खेली गयी थी। भारतीय टीम सेमीफाइनल तक पहुंची थी जहां से उसे दक्षिण अफ्रीका के हाथों पराजित होना पड़ा था। इस मैच में राजेश सिंह 1 रन पर नाबाद रहे। आठ ओवर की बॉलिंग में 69 रन खर्च किये और कोई विकेट नहीं मिला था। लेकिन इस प्रतियोगिता के लीग मुकाबले में भारत ने दक्षिण अफ्रीका को हरा दिया था। इस मैच में राजेश ने शानदार गेंदबाजी की थी। उन्होंने 8 ओवरों में 38 रन देकर एक विकेट लिया था। इसके बाद उन्होंने 2002 और 2006 का भी विश्व कप खेला। यानी जिस साल राजेश ने अपना अंतिम विश्व कप खेला उसी साल वे IAS की परीक्षा में सफल हुए। भारत में विश्व कप क्रिकेट खेलने वाला ऐसा कोई क्रिकेटर नहीं हुआ जो IAS अफसर बना हो। राजेश का यह रिकॉर्ड शायद ही कोई तोड़ पाए।

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    English summary
    first blind IAS officer of the country Rajesh Kumar Singh will now fight Corona in this district
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