Farmers protest:कब-कब ऐसा हुआ कि संसद से पास कानून लागू नहीं हो सका?

Farmers protest:तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों के सामने केंद्र सरकार ने डेढ़ से दो साल तक इन्हें स्थगित करने तक का प्रस्ताव रखा है, लेकिन किसान संगठन (Farmers union) उसे खत्म करने से कम पर मानने को राजी नहीं हैं। किसान संगठनों ने तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त कमिटी पर भी सवाल उठाने में देर नहीं की है। लेकिन, अगर हम भारतीय संसदीय इतिहास में झांककर देखें तो ऐसे कई कई मौके आए हैं, जब संसद ने कानूनों को निरस्त भी किया है और ऐसे भी उदाहरण हैं, जब सरकार ने दशकों तक संसद से पास कानून को लागू ही नहीं किया और उसे लटकाए रही है।

कैसे लागू होता है संसद से पास कानून ?

कैसे लागू होता है संसद से पास कानून ?

देश में कानून बनाने और उसे निरस्त करने का अधिकार संविधान ने देश की संसद को दिया हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के पास भी यह अधिकार है कि वह संसद से पारित कानून को असंवैधानिक करार देकर निरस्त कर सकता है। लेकिन, संसद से पास विधेयक अगले दिन से कानून नहीं बन जाता, बल्कि उसे तीन प्रक्रियाओं से गुजरने होते हैं, तभी वह कानून लागू होता है। पहली प्रक्रिया तो यह है कि संसद से पास विधेयक तभी कानून का शक्ल अख्तियार करता है, जब राष्ट्रपति उसपर हस्ताक्षर करते हैं। इसके बाद वह कानून एक निश्चित तारीख से लागू होता है। आखिर में जब सरकार उस कानून से जुड़े नियम और विनियम तैयार कर लेती है, तभी जमीन पर वह कानून प्रभावी हो पाता है।

संसद से पास होने के बाद विधेयक का क्या होता है?

संसद से पास होने के बाद विधेयक का क्या होता है?

पहला तरीका बहुत ही आसान है। संविधान के आर्टिकल 111 में राष्ट्रपति के पास यह अधिकार है कि वह संसद से पास विधेयक को अपनी मंजूरी दे सकता है या उसे अपने पास रोक सकता है । आमतौर पर राष्ट्रपति संसद से मुहर लगने के कुछ दिनों के अंदर उसपर मंजूरी दे देते हैं। पिछली बार 2006 में ऐसा हुआ था कि तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक विधेयक को मंजूरी देने से रोक लिया था। यह विधेयक ऑफिस ऑफ प्रॉफिट में फंसे सांसदों को उनकी सदस्यता खत्म किए जाने से रोकने के लिए था। राष्ट्रपति किसी विधेयक को अपने पास कितने दिनों तक रोक सकता है, इसका जिक्र संविधान में नहीं है और वह अनिश्चितकाल के लिए भी रोक सकते हैं। मसलन, 1986 में ज्ञानी जैल सिंह ने एक विवादित विधेयक को अपने बाकी बचे हुए कार्यकाल तक के लिए लटकाए रखा था। जब, राष्ट्रपति किसी विधेयक को मंजूरी देने से मना कर देते हैं या अपने पास रोक लेते हैं तो उसे संसद के पास पुनर्विचार के लिए लाया जा सकता है। लेकिन, अगर संसद ने उसे राष्ट्रपति के पास दोबारा से भेज दिया तो राष्ट्रपति उसे मंजूरी देने के लिए बाध्य हो जाते हैं।

कृषि कानूनों पर राष्ट्रपति ने कब लगाई मुहर?

कृषि कानूनों पर राष्ट्रपति ने कब लगाई मुहर?

मौजूदा कृषि कानून संसद के दोनों सदनों से पिछले मानसून सत्र में सितंबर, 2020 में पारित हुआ था और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कुछ ही दिनों में उसे हरी झंडी दिखा दी थी। इसके बाद इसे लागू करने की तारीख पर फैसला होता है। कई मामलों में संसद सरकार को ही इसका अधिकार दे देती है। मसलन, दिसंबर 2019 में संसद ने रिसाइकलिंग ऑफ शिप्स ऐक्ट पास किया। लेकिन, सरकार ने 2020 के अक्टूबर में इसका सिर्फ सेक्शन 3 लागू किया। इस सेक्शन के तहत सरकार को यह अधिकार है कि वह देश में शिप रिसाइकलिंग की निगरानी के लिए एक अधिकारी को जिम्मेदारी सौंप सकता है। लेकिन, मौजूदा कृषि कानून पहले से ही लागू अध्यादेश के बदले में था इसलिए उसने उसका स्थान ले लिया है।

कई कानून वर्षों तक लागू ही नहीं हुए

कई कानून वर्षों तक लागू ही नहीं हुए

देश में ऐसे भी कई मिसाल हैं जब सरकार ने संसद से पास कानून को वर्षों तक अमल में नहीं लाया। इसके दो बेहतरीन उदाहरण हैं। राष्ट्रीय पर्यावरण न्यायाधिकरण अधिनियम (National Environment Tribunal Act) और दिल्ली किराया नियंत्रण कानून (Delhi Rent Control Act)जो पीवी नरसिम्हाराव सरकार ने ही पास करवाए थे। ये कानून 1995 में ही संसद से पास हो गए थे और राष्ट्रपति की भी मुहर लग गई थी,लेकिन सरकार ने इन्हें कभी लागू ही नहीं किया। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ऐक्ट ने आखिरकार 2010 में एनवॉयरमेंट ट्रिब्यूनल लॉ की जगह ले ली। दिल्ली किराया नियंत्रण कानून को भी निरस्त करने का विधेयक 2010 में पेश किया गया और यह अभी भी राज्यसभा में लटका हुआ है। कई विधेयक ऐसे होते हैं, जिसमें उसे लागू करने की मियाद पहले से ही तय होती है। जैसे 2013 में भूमि अधिग्रहण कानून को लागू करने के लिए सरकार को तीन महीने का वक्त दिया गया था। कुछ बिल में उसे लागू होने की निश्चित तारीख भी पहले ही तय की गई रहती है। मसलन, ई-सिगरेट को पहले अध्यादेश के जरिए 18 सितंबर, 2019 से बैन किया गया, फिर उसे 2 दिसंबर,2019 को संसद से पास कानून से बदल दिया गया। इसी तरह मौजूदा तीनों कृषि कानून (three farm Bills) भी अध्यादेश के तौर पर पिछले 5 जून, 2020 से ही लागू हो चुके थे, जिसे संसद से पास कानून से बदल दिया गया है।

कानून बनने के बाद नियम बनने क्यों जरूरी हैं?

कानून बनने के बाद नियम बनने क्यों जरूरी हैं?

संसद से जो विधेयक पास होता है, उसमें कानून की बारीकियां नहीं होतीं, बल्कि वह उसका एक खाका होता है। बाकी सरकार उसे जमीन पर लागू करने के लिए नियम बनाती है और उसके लिए जरूरी मशीनरी तैयार करती है। कानून के अमल के लिए ये नियम और अधिनियम (Rules & regulations) बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। अगर सरकार ये नियम नहीं बनाएगी तो कानून को लागू करना नामुमकिन होगा। उदाहरण के लिए बेनामी ट्रांजैक्शन ऐक्ट, 1988 (The Benami Transactions Act of 1988) नियमों के अभाव में कभी लागू ही नहीं हो सका। इस कानून से सरकार को बेनामी संपत्तियों पर कब्जे की शक्ति मिलनी थी। लेकिन, 25 वर्ष तक कानून लागू होने के बावजूद ऐसी बेनामी संपत्तियां जब्ती से बची रह गईं। आखिरकार 2016 में इस कानून को संसद ने निरस्त करके एक नया कानून पारित किया। केंद्र सरकार ने मौजूदा कृषि कानूनों से जुड़े कुछ नियम बीते साल अक्टूबर में बनाए हैं और इसे पूरी तरह से अमल में लाने के लिए संभवत: और नियम बनाए जाने होंगे। लेकिन, 2019 के दिसंबर में पास नागरिकता संशोधन कानून (CAA) अभी भी नियम बनने की बाट जोह रहे हैं और गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में कोरोना महामारी को इसमें हुई देरी को वजह बताया है।

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