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पश्चिम यूपी का चुनाव: किसान आंदोलन की तपिश क्या फिर हो रही तेज़?

By BBC News हिन्दी
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समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सोमवार को लखनऊ स्थित पार्टी कार्यालय में 'अन्न संकल्प' लिया. यह 'अन्न संकल्प' उन्हें किसान नेता और लखीमपुर खीरी की हिंसा में घायल हुए तेजिंदर विर्क ने दिलाया.

इस मौक़े पर अखिलेश यादव ने किसानों के संघर्ष को मुद्दा बनाते हुए कहा, "लखीमपुर में कोशिश थी कि इन्हें कुचल दिया जाये. इन्होंने किसानों की लड़ाई लड़ी, और मैं तमाम किसानों और किसान नेताओं का धन्यवाद करना चाहता हूँ, जिन्होंने संघर्ष किया. आख़िरकार किसानों ने सरकार को झुका ही दिया. वोट के लिए भाजपा ने तीनों कृषि क़ानून वापस लिए. सपा 'अन्न संकल्प' लेती है कि जिन्होंने किसान पर अत्याचार और अन्याय किया है उनको हराएंगे और हटाएंगे. इसके लिए तेजिंदर विर्क हमे संकल्प दिलाएं."

चुनावी माहौल में इस अन्न संकल्प में चुनावी अपील भी जोड़ दी गयी कि "मतदाता भाजपा को हराने के लिए 'अन्न संकल्प' लें."

https://twitter.com/yadavakhilesh/status/1483003549076230144

क्यों जुड़े सपा से तेजिंदर विर्क?

तेजिंदर विर्क उत्तराखंड के रुद्रपुर के रहने वाले हैं और तराई किसान संगठन के अध्यक्ष हैं. वो लखीमपुर खीरी में पिछले साल अक्टूबर में चल रहे किसान आंदोलन में काफ़ी सक्रिय थे.

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे आशीष मिश्र और 12 अन्य लोगों पर आरोप है कि उन्होंने लखीमपुर खीरी में चार किसानों और एक पत्रकार को गाड़ियों से रौंध कर मार डाला. उसी घटना में तेजिंदर विर्क भी गंभीर रूप से घायल हो गए थे और बाद में उनका इलाज दिल्ली में हुआ.

तेजिंदर विर्क ने अखिलेश यादव की प्रेस कांफ्रेंस में कुछ नहीं कहा लेकिन बाद में बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने सपा को समर्थन देने की बात कही. उनका कहना था, "हमारा भाजपा को हराने का मिशन है, इसलिए हमने यह संकल्प लिया है. क्योंकि उत्तर प्रदेश में विपक्ष के रूप में समाजवादी पार्टी है जो मज़बूती के साथ भाजपा को हरा सकती है, इसलिए हमने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर भाजपा को हराने का संकल्प लिया है."

इस 'अन्न संकल्प' का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट किया, "दंगाइयों, अपराधियों और आतंकवादियों का हाथ थामने वाले लोग आज 'अन्न' को हाथ में लेकर अन्नदाता के हित चिंतक होने का स्वांग कर रहे हैं. प्रदेश जानता है कि प्रतिकूल मौसम से अधिक इनके शासनकाल में हुए दंगों ने ही किसानों को हानि पहुंचाई है. ये तो सिर्फ़ 'जिन्ना प्रेमी' हैं."

https://twitter.com/myogiadityanath/status/1483018013414952962

चुनाव 2022: क्या है किसान संगठनों की भूमिका?

हर बार की तरह इस बार भी उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की शुरुआत पश्चिम से होने जा रही है जहाँ मतदान 10 और 14 फ़रवरी को होगा. भले ही तीन कृषि क़ानून वापस हो गए हों लेकिन समाजवादी पार्टी ने किसान संगठन के सहयोग से भाजपा को हराने का प्रण लिया है. तो क्या इसका मतलब यह है कि अधिकतर किसान संगठनों में पूरी तरह से भाजपा के ख़िलाफ़ माहौल है?

इस सवाल के जवाब में भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, "तेजिंदर विर्क का तो अपना संगठन है और उन्होंने सपा को समर्थन किया है. संयुक्त किसान मोर्चा ने 23 लोगों को राजनीतिक सिस्टम से जुड़ने के लिए बाहर भी किया है. वोट तो कोई कहीं भी देने के लिए स्वतंत्र है. भारतीय किसान यूनियन सीधे किसी का समर्थन नहीं करती है. लेकिन जो 13 महीने सड़कों पर बैठे हैं, जो 700 लोग खोए हैं लोग उनको याद रखते हुए वोट देंगे."

रविवार को भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष और राकेश टिकैत के बड़े भाई नरेश टिकैत का एक बयान वायरल हुआ जिसमे वो मंच से सपा-रालोद गठबंधन के उम्मीदवार को सफल बनाने की बात कर रहे हैं. वायरल वीडियो में नरेश टिकैत कहते नज़र आ रहे हैं, "इस चुनाव को अच्छी तरह से लड़ो. गठबंधन के दूसरे उम्मीदवार मीरपुर से चन्दन चौहान हैं, इस गठबंधन को सफल बनाओ."

किसान
Reuters
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बाद में भाजपा के सांसद संजीव बालियान नरेश टिकैत से मिलने उनके घर पहुँचे और उस मुलाक़ात के तुरंत बाद नरेश टिकैत ने सफ़ाई दी कि, "वहां किसान भवन में लोग इकठ्ठा हुए थे तो कह दिया कि आप लोग इनका ख्याल रखो. जो किसान मोर्चे का बंधन है उससे हम थोड़ा बोल पड़े फालतू. किसान संयुक्त मोर्चा सर्वोपरि है. वोट मांगने की बात यहाँ से कोई ना करे. सभी पार्टी वाले वोट मांगने के अलावा यहाँ पर आशीर्वाद लें."

नरेश टिकैत के इस बयान के क्या मायने हैं?

इस चुनावी माहौल में नरेश टिकैत के बयान और उसकी वापसी का सन्दर्भ समझने की भी ज़रूरत है. कुछ दिन पहले ही रालोद प्रमुख जयंत चौधरी नरेश टिकैत का हालचाल लेने हस्पताल पहुँचे थे और उस मुलाक़ात की तस्वीर ट्वीट करते हुए कहा, "बाबा नरेश टिकैत जी के स्वास्थ्य का हॉस्पिटल में हालचाल लिया. वो ठीक हैं और जल्द घर लौट आएँगे."

https://twitter.com/jayantrld/status/1478974883140812802

भले ही यह शिष्टाचार भेंट हो लेकिन इससे जुड़े घटनाक्रम को पश्चिम उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिज़वी समझाते हुए कहते हैं, "हम केंद्रीय मंत्री और मुज़फ़्फ़रनगर से भाजपा सांसद संजीव बालियान की मुज़फ्फ़रनगर में नरेश टिकैत से मुलाक़ात को आकस्मिक नहीं समझते हैं. नरेश टिकैत, राकेश टिकैत और संजीव बालियान यह सब एक खाप के लोग हैं. जब यह सामाजिक रीति रिवाजों की बात करते हैं तो यह सब लोग एक ही साथ उठते-बैठते खाते-पीते बात करते हैं. लेकिन इसे अगर सियासत के तौर पर देखा जाये, तो जहाँ किसानी और राजनीति की बात आती है तो वहां यह अलग-अलग हो जाते हैं."

शादाब रिज़वी का मानना है कि किसान आंदोलन समाप्त होने के बाद भी राकेश टिकैत का रुख़ सरकार के ख़िलाफ़ चला आ रहा है. उनके मुताबिक़, "राकेश टिकैत का तर्क यह है कि हमारी एक दो मांगे ही मानी गयी हैं. एमएसपी अभी लागू नहीं हुआ, मुक़दमे वापस नहीं हुए, सिर्फ़ हरियाणा को छोड़ के मुआवज़े की बात नहीं हुई. तो इन सब मुद्दों को लेकर अभी भी वो आक्रामक हैं और सकरार और भाजपा के ख़िलाफ़ वो सख़्त तेवर दिखा रहे हैं."

लेकिन सपा-रालोद के उम्मीदवारों के लिए मंच से नरेश टिकैत की चुनावी सिफारिश कोई भूल-चूक नहीं है.

शादाब रिज़वी इसका विश्लेषण करते हुए कहते हैं, "कल नरेश टिकैत ने यह संकेत दिए थे कि हम गठबंधन के कुछ उम्मीदवारों का साथ इसलिए दे सकते हैं कि वो हमारे से लगाव रखते हैं. जिनमें से एक बहुत महत्वपूर्ण सीट थी बुढ़ाना जहां से राजपाल मालिक को प्रत्याशी बनाया गया है. हालांकि अखिलेश यह चाहते थे कि उम्मीदवार टिकैत के और भी क़रीब हो, जैसे नरेश टिकैत के बेटे गौरव टिकैत या उनके प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक चुनाव लड़ लें ताकि यह सन्देश चला जाये कि सपा-रालोद गठबंधन सीधे-सीधे किसानों के साथ है. तो कल इसीलिए नरेश टिकैत ने यह बात कह दी थी कि हम कुछ सीटों पर, जैसे बुढ़ाना, मीरापुर जहाँ-जहाँ किसान हितैषी उमीदवार हैं, उनका हम साथ दे सकते हैं."

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Reuters
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इस बयान से भाजपा में मची खलबली को शादाब रिज़वी आंकते हुए कहते हैं, "शायद उसी का असर था कि रविवार को यह बात कही गयी और बालियान खाप के सदस्य, सांसद और मंत्री संजीव बालियान सुबह-सुबह पहुँच गए. मिलने का बहाना था नरेश टिकैत का ऑपरेशन के बाद हालचाल पूछना लेकिन वहां से जैसे बालियान जी निकले तो नरेश टिकैत ने फ़ौरन यूटर्न लिया और सफ़ाई दे दी."

शादाब रिज़वी के अनुसार भाजपा थोड़ी राहत मानेगी कि जो बीकेयू का इतना सख़्त रवैया था उसमें शायद थोड़ी नरमी आ रही है.

बयानों से अलग क्या किसानों के मुद्दे अभी भी गर्म हैं?

किसान नेता तेजिंदर विर्क के समाजवादी पार्टी के समर्थन को तराई इलाक़े में लखीमपुर-खीरी काण्ड को ज़िंदा रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. लखीमपुर खीरी में हिंदुस्तान अख़बार के ब्यूरो चीफ़ मयंक बाजपेयी का कहना है, "चुनाव में यह मुद्दा उठेगा ही, मामला कोर्ट में भी विचाराधीन है, लेकिन मुद्दा तो विपक्षी पार्टी उठाएगी ही. तेजिंदर विर्क ख़ुद ज़ख़्मी थे, बाद में उन्होंने गवाह के रूप में अपना बयान भी दर्ज कराया. लखीमपुर मामले की लगातार रिपोर्टिंग हो रही है और सभी की उस पर नज़र बनी हुई है. विपक्षी पार्टियों के लिए तो यह एक बड़ा मुद्दा अभी भी बना हुआ है."

गौरतलब है कि लखीमपुर कांड में 14 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ जनवरी की शुरुआत में आरोपपत्र दाख़िल हो चुका है और मंत्री अजय मिश्र के बेटे आशीष मिश्र पर हत्या का मामला चल रहा है.

कांग्रेस भी लखीमपुर काण्ड और किसानों के मुद्दे को ज़िंदा रखने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है. सोमवार को पार्टी की प्रदेश इकाई ने लखीमपुर काण्ड में मारे गए पत्रकार रमन कश्यप के भाई पवन कश्यप को पार्टी की सदस्यता दिलाई.

https://twitter.com/incuttarpradesh/status/1482687225616035844

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने अक्टूबर में हुई घटना के बाद अपनी और पार्टी की पूरी राजनीतिक ताक़त लखीमपुर में किसानों को इन्साफ़ दिलाने के लिए दबाव बनाने में झोंक दी थी.

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English summary
farmers protest sign again before the UP elections 2022
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