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मोदी सरकार के दो साल में 42 फीसदी बढ़ गई किसान आत्महत्या, महाराष्ट्र का हाल सबसे बुरा

By Brajesh Mishra
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नई दिल्ली। मोदी सरकार के कार्यकाल में किसान आत्महत्या के मामले 42 फीसदी तक बढ़ गए हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2014-2015 के बीच किसान आत्महत्या आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। साल 2014 में 5650 किसानों ने मौत को गले लगाया था जबकि ताजा आंकड़ों में यह संख्या बढ़कर 8007 हो गई है। दोनों सालों में देश के कई राज्यों में जबरदस्त सूखा रहा, जिससे किसानों को मुश्किलें झेलनी पड़ीं। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में दो सालों से लगातार सूखा पड़ रहा है जिससे किसानों की फसलें चौपट हो गईं और रोजी भी छिन गई।

मोदी सरकार के दो साल में 42 फीसदी बढ़ गई किसान आत्महत्या, महाराष्ट्र का हाल सबसे बुरा

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या के मामले

एक साल में आत्महत्या के 3030 मामलों के साथ महाराष्ट्र देश में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या वाला राज्य बना। पूरे देश के आंकड़ों में से 37.8 फीसदी मामले सिर्फ महाराष्ट्र के हैं। जबकि 1358 मामले तेलंगाना में सामने आए। यह राज्य जूसरे स्थान पर है। 1197 मामलों के साथ कर्नाटक तीसरे स्थान पर है। महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में कुल किसान आत्महत्याओं के 94.1 मामले सामने आए। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 9 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में एक भी सुसाइड केस सामने नहीं आया, इसके बाद यह हाल है। 2015 में जिन राज्यों में किसान आत्महत्या न के बराबर रही उनमें बिहार, पश्चिम बंगाल, गोवा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मिजोरम, नगालैंड और उत्तराखंड शामिल हैं।

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खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के मामलों में कमी

रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते दो-तीन सालों में सूखे की मार झेल रहे किसानों का सब कुछ तबाह हो गया और खेती करने वालों के लिए मानसून बिल्कुल विपरीत था। इस स्थिति का असर किसान आत्महत्या के तौर पर देखा जा सकता है। एक ओर जहां किसान आत्महत्या के मामले तेजी से बढ़े हैं वहीं, यह गौर करने वाली बात है कि खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के मामलों में 31.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2014 में खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या का आंकड़ा 6710 था जो कि साल 2015 में घटकर 4595 हो गया। हालांकि यहां भी पूरे देश में महाराष्ट्र में ही सबसे आगे रहा। राज्य में खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के 1261 मामले सामने आए। जबकि मध्य प्रदेश में 709 और तमिलनाडु में 604 मामले सामने आए। अगर पूरे आंकड़ों पर गौर करें तो खेती के क्षेत्र में आत्महत्या में 2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

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कर्ज बना सबसे बड़ी वजह

आत्महत्या के कारणों की बात करें तो दिवालिया होना और कर्ज में डूब जाने की वजह से ज्यादातर किसानों ने खुद की जिंदगी समाप्त कर ली। 2015 में उस वजह से 8007 किसानों ने इन्हीं वजहों से आत्महत्या की। खेती से जुड़ी अन्य समस्याएं दूसरे स्थान पर रहीं और इस वजह से करीब 19.5 फीसदी मामलों में किसानों ने मौत को गले लगाया। आंकड़े यह भी बताते हैं कि साल 2015 में आत्महत्या करने वाले 72.6 फीसदी किसान छोटे या मध्यम वर्ग के किसान थे और उनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन थी।

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English summary
Farmer suicides cases up by 42 percent between 2014 and 2015 says ncrb.
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